Friday, January 15, 2010

कहानी-३०



वह चुप हैं

रूपसिंह चन्देल

वह चुप हैं ...... बिल्कुल ही चुप .
वैसे कम बोलना उनकी आदत है . यह आदत उन्होंने विकसित की है . कभी वह अधिक बोलते थे जिस पर उन्होंने सप्रयास नियंत्रण पा लिया . वह जानते थे कि कम बोलने के लाख लाभ होते हैं . साथी मुंह ताकते रहते हैं कि वह कुछ बोलें लेकिन वह चुप रहते हैं . दूसरों को सुनते हैं और उनके कहे को अपने अंदर गुनते हैं . अवसरानुकूल कुछ शब्द उच्चरित कर देते हैं...... एक-एक शब्द पर बल देते हुए . वह अपने वाक्यों की असंबध्दता की चिन्ता नहीं करते . चिन्ता करते हैं अधिक न बोलने की . अधिक बोलने को अब वह स्वास्थ्य खराब होने के कारणों में से एक मानते हैं . स्वास्थ्य को वह व्यापक अर्थ में लेते हैं , जो शारीरिक ही नहीं सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक........ व्यापक संदर्भों से जुड़ता है .
वह कम अवश्य बोलते हैं लेकिन बिल्कुल चुप उन्हे पहली बार देखा गया है . मिलने आने वालों को उनकी पत्नी शालिनी दरवाजे से ही टरका देती हैं यह कहकर कि शुशांत जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है .
''शालिनी जी , दो दिन पहले शुशांत जी बिल्कुल स्वस्थ थे.....'' मिलने आए एक युवक के कहने पर वह बोली , '' कल से स्वास्थ्य खराब है . छींक रहे हैं और गला भी खराब है .''
''शालिनी जी ,'' युवक बोला , ''वह स्वयं न बोलें , बस मुझे सुन लें . उनके लिए एक आवश्यक सूचना है .''
शालिनी ने उस अपरिचित युवक को घूरकर देखा ,'' आप मुझे बता दें . मैं उन्हें बता दूंगी .''
युवक ने शालिनी की ओर अखबार बढ़ाते हुए कहा ,'' परसों शाम 'जनाधार लेखक संघ' की ओर से प्रख्यात साहित्यकार कामेश्वर जी की मृत्यु पर शोक सभा आयोजित थी . शुशांत जी भी बोले थे . बोलते हुए उन्होंने कहा था कि कामेश्वर जैसे व्यक्ति इसलिए हमारी श्रध्दांजलि के हकदार हैं क्योंकि उन्होंने थोड़ा-बहुत कुछ लिखा है . वर्ना उनका जीवन इतना अराजक....चरित्र इतना कमजोर ......''
''आप कहना क्या चाहते हैं ?'' शालिनी ने युवक को नजरें तरेरते हुए टोका .
अविचलित युवक ने 'आज भारत' अखबार बढ़ाते हुए कहा , '' इसमें शुशांत जी के कथन की भर्त्सना की गई है . मुझे 'जनाधार लेखक संघ' के सचिव व्याकुल कुमार जी ने यह कहकर भेजा है कि शुशांत जी 'आजाद भारत' को यह कहते हुए अपना खण्डन भेज दें कि उन्होंने वैसा नहीं कहा था . रिपोर्टर ने उनकी बात को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया है .
''जी शुक्रिया . मैं उन्हें बता दूंगी . '' आजाद भारत की प्रति युवक से लेती हुई शालिनी बोली और युवक को दरवाजे पर खड़ा छोड़ दरवाजा बंद कर लिया .
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वह चुप हैं और चुप होने का कारण पूछने पर भी उन्होंने शालनी को नहीं बताया .
एक और समय वह चुप रहने लगे थे , लेकिन बिल्कुल चुप नहीं थे । तब उनके स्कूटर ने उनके अंदर उथल-पुथल मचा रखा था . चार वर्षों से वह उनके गैराज में खड़ा था . बेटे के लिए उसे खरीदा गया था . बेटा उससे कॉलेज जाता ....दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग , जहां से वह इंजीनियरिंग कर रहा था . इंजीनियरिंग कर वह चार साल पहले एम.एस. करने अमेरिका चला गया और एम.एस. कर वहीं नौकरी करने लगा . बेटे के जाने के बाद स्कूटर को गैराज में बंद करने के बाद न उन्हें गैराज खोलने की आवश्यकता अनुभव हुई और न ही स्कूटर का खयाल आया . दरअसल बेटे के लिए उन्होंने नहीं शालिनी ने उसे खरीद दिया था . उनके यहां स्कूटर है यह अनुभूति उन्हें तब होती जब कभी -कभार उसे वह गेट के बाहर खड़ा देखते . वैसे होता यह था कि जब वह सुबह नौ बजे सोकर उठते बेटा कॉलेज के लिए जा चुका होता था . शालिनी विदेश मंत्राालय में सहायक निदेशक राजभाषा थी और वह भी कार्यालय जा चुकी होती थी .

शुशांत , जिनका पूरा नाम शुशांत राय था , उठते , अंगड़ाई लेते , खिड़की से झांककर सड़क की आमद-रफ्त का जायजा लेते हुए दाढ़ी पर हाथ फेरते , जिसकी वह बहुत साज-संवार करते थे , फिर बिस्तर छोड़ किचन में जाते , जहां शालिनी थर्मस में उनके लिए चाय बनाकर रख जाती थी .
चाय पीते हुए वह दिन के अपने कार्यक्रम पर विचार करते . अखबार पर सरसरी दृष्टि डालते और विशेषरूप से दुर्घटनाएं , हत्या , बलात्कार और लूट-पाट की खबरें पढ़ते . ये खबरें उन्हें चिन्ता में डाल देतीं . वह अपने को असुरक्षित अनुभव करते ....और घर , शालिनी और बेटे अखिल को लेकर चिन्तित हो उठते .
बलात्कार शब्द पर उनकी नजरें अधिक देर तक टिकतीं . उस समाचार को वह गौर से पढ़ते और मन में विचलन अनुभव करते रहते . विचलन अनुभव करते हुए उन्हें बरबस सुहासिनी की याद हो आती . याद तब अधिक आती जब उससे मिले उन्हें दो-तीन सप्ताह बीत चुके होते .
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सुहासिनी उनकी छात्रा थी .... उनके निर्देशन में पी-एच.डी कर रही थी . उसके रजिस्ट्रेशन के बाद उन्होंने उसकी इस प्रकार उपेक्षा की कि एक दिन वह रो पड़ी थी . वह काम करके लाती . वह देखते ..... देखते नहीं बल्कि गंभीरतापूर्वक देखने का अभिनय करते और कुछ देर बाद रजिस्टर उसकी ओर सरका देते , ''बात बनी नहीं सुहास ...... दोबारा लिखो ....'' और वह कुछ पुस्तकों के नाम बता देते , ''इन्हें पढ़ो . दिशा मिल जाएगी .''
एक -एक चैप्टर को पांच-छ: बार उन्होंने उससे लिखवाया . दो वर्षों में सुहासिनी केवल तीन चैप्टर ही लिख पायी . समय समाप्ति की ओर तेजी से बढ़ रहा था और यही वह चाहते थे . चौथे चैप्टर को जब पांचवीं बार उन्होंने रिजेक्ट किया सुहासिनी के धैर्य का बांध टूट गया और वह फफक पड़ी ,''सर , मैं पी-एच.डी. नहीं करूंगी .''
''च्च....च्च....ऐसा नहीं सोचते सुहास .''सोफे पर उसकी ओर खिसक गए थे वह और अपनी उंगलियों से सुहासिनी के आंसू पोछते हुए बोले थे ,'' तुम प्रतिभाशाली हो..... समझदार भी .... लेकिन पता नहीं क्यों नासमझी करती जा रही हो..... अब तक कब की थीसिस सबमिट हो चुकी होती . कहीं एडहॉक पढ़ा रही होती .''
सुहासिनी का रोना बंद हो गया था . वह सोचने लगी थी , ''क्या सच ही वह प्रतिभाशाली है ... लेकिन सर ने कहा....अभी कहा ....''
सुहासिनी सोच में डूब गयी ....वह कुछ और परिश्रम करेगी.....उसे प्राध्यापक बनना है .... वैसा ही करेगी जैसा शुशांत सर कहेंगे ....''
और उसको वही करना पड़ा जैसा शुशांत राय ने कहा . शालिनी दफ्तर जा चुकी थी और बेटा कॉलेज.... तब से सुहासिनी को अकेले में वह सहवासिनी कहकर पुकारने लगे थे .
सुहासिनी ने पी-एच.डी की और एक कॉलेज में उनके सहयोग से एडहॉक पढ़ाने लगी . उसे रेगुलर होना है और वह सोचती है कि उसके सर यानी शुशांत सर .. .. उसके रेगुलर होने में भी सहायक होंगे . इसीलिए वह दस-पन्द्रह दिनों में उनके घर आती है ... कॉलेज जाते समय ..... . शालिनी के कार्यालय जाने के बाद . लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ . शालिनी को ज्वर था . वह कार्यालय नहीं गई थी .
सुहासिनी घर आए और शुशांत अपने को नियंतित्रत रख लें , संभव नहीं था . चार वर्षों बाद उन्हें गेैराज की याद आयी थी . बमुश्किल से चाबी खोज पाए थे वह . ज्वर के कारण शालिनी अर्ध्दचेतनावस्था में थी .
शुशांत कठिनाई से गैराज का ताला खोल पाए , क्योंकि उसमें जंग लग चुकी थी . गैराज में जमी धूल की पर्त और दीवारों में लगे जालों ने एक बार तो उन्हें हतोत्साहित किया था , लेकिन उसका विकल्प उन्होंने खोज लिया था . 'चटाइयाें का आविष्कार शायद ऐसे अवसरों के लिए ही हुआ था ' उन्होंने उस समय सोचा था . लेकिन स्कूटर बाधक बन गया था . छोटे-से गैराज का अधिकांश स्थान उसने घेर रखा था . उतावलेपन के उस क्षण उस बाधा से मुक्ति आवश्यक थी . मुक्ति उसे हटा देने से ही संभव थी . लेकिन चार वर्षों से एक ही जगह अड़े स्कूटर को हटाना उनके लिए किसी पहाड़ को हटाने जैसा था . भले ही उन्होंने दुनिया को चलाया था ,लेकिन स्कूटर चलाना तो दूर आने के बाद उसे हाथ भी नहीं लगाया था , उसे हटाने से शालिनी के उठ आने का खतरा भी था . उसे खिसकाकर उन्होंने धूल और जालों की परवाह न कर धूलभरी फर्श पर किसी तरह आधी-अधूरी चटाई बिछा ली थी . ऐसे अवसरों में असुविधाओं में सुविधा खोज लेना उनकी फितरत थी .
लेकिन स्कूटर उनके दिमाग में अटक गया था . वह सड़क पर दौड़ने के बजाय उनके दिमाग में दौड़ने लगा था . उसे घर से बाहर कर देने का निर्णय उन्होंने कर लिया था . उसे बेच दें या किसी को दे दें इस द्वन्द्व में वह कई दिनों तक फंसे रहे थे . बेचने से अधिक किसी को दे देना उन्हें अनेक दृष्टिकोण से उपयुक्त लगा था . लेकिन कुछ मुफ्त देना उनके सिध्दाांत के विरुध्द था . मुफ्त पाने वाले की आदतें खराब हो जाती हैं . वह श्रम से बचने लगता है .... इससे न उसका विकास होता है और न देश का . 'मुफ्त' देने-पाने की नीति उनके प्रगतिशील विचारों के विरुध्द थी . अपने प्रगतिशील विचारों के प्रतिपादन के लिए उन्होंने अपने कुछ सिध्दांत तय किए थे और उन सिध्दान्तों का वह कठोरता से पालन करते थे .
सोच-विचारकर उन्होंने 'जनाधार लेखक संघ' से जुड़े अपने एक छात्र को स्कूटर देने का निर्णय किया . संध की परिकल्पना में उनकी भी भूमिका रही थी , जिससे उनके कुछ छात्र भी उससे जुड़े हुए थे . समय-समय पर वे संघ की ओर से धरना-प्रदर्शन कर लेते - - -जंतर-मंतर पर सरकार के विरुध्द नारे लगा लेते . संघ से जुड़े लोग प्रसन्न हो लेते कि वह सरकार की दुर्नीतियों के विरुध्द आवाज बुलंद कर रहे थे जबकि संघ के पदाधिकारी इससे सरकारी तंत्र पर दबाव बनाकर अपने हित साध लेने से प्रसन्न होते थे .
एक दिन राजीव प्रसाद नामके उस युवक को उन्होंने घर बुलाया . उसकी पढ़ाई , समस्याओं आदि की चर्चा कर कहा , ''राजीव तुम्हे एक प्रोजेक्ट पर काम करना है .''
'' कैसा प्रोजेक्ट सर ?''
''स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यासों में स्त्री विमर्श'' विषय पर कुछ काम करना है .''
'' सर .....'' राजीव के स्वर में कंपन था .
''मैं तुम्हारी सहायता करूंगा . यही कोई दो-ढाई-सौ पृष्ठों की पुस्तक ........ पर्याप्त पारिश्रमिक मिलेगा . पांच दशकों के महत्वपूर्ण उपन्यासों की सूची मेैं लिखवा दूंगा . प्रत्येक दशक के आधार पर पांच अध्याय और छठवां अध्याय उपसंहार .''
''सर- - - मैं- - - .''
''अरे घबड़ाते क्यों हो ? मैं हूं न ! '' दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए शुशंांत राय बोले ,'' इसके लिए कुछ परिश्रम करना होगा ... कुछ पुस्तकालयों की खाक भी छाननी होगी ..... उसके लिए तुम मेरा यह स्कूटर ले जाओ . केवल कार्य करने तक के लिए ही नहीं..... इसे मैं तुम्हें दे रहा हूं .''
राजीव उनके चेहेरे की ओर देखने लगा तो वह बोले ,'' ऐसे क्यों देख रहे हो ! भई मुफ्त में नहीं दे रहा हूं...... काम करवा रहा हूं . तुम प्रतिभाशाली हो और प्रतिभाशाली लोग मुझे प्रिय हैं . मैं उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता हूं .....''
''सर.....'' राजीव कसमसाया . वह सोच रहा था कि उसके लिए अपनी एम.फिल. का शोध प्रबंध ही भारी पड़ रहा है , ऊपर से इतना भारी-भरकम काम ..... कैसे कर पाएगा वह !''
''इसे दो महीनों में पूरा करना है ....फिर अपने एम.फिल का काम करते रहना .... अभी उसके लिए पर्याप्त समय है .'' और उन्होंने राजीव की ओर स्कूटर की चाबी उछाल दी थी . चाबी वह नहीं थाम पाया तो दाढ़ी में मुस्कराते हुए वह बोले ,'' कैच करने में कमजोर हो ?''
राजीव के घर से स्कूटर घसीटकर बाहर निकालते ही उन्होंने गेट बंद कर लिया था . उसके बाद उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि चार वर्षों में पिचक चुके टायरों और पथरा चुकी पेट्रोल की टंकी की रबड़ ने उसे कितना दुखी किया था . मेकेनिक ने उसकी जेब से पांच सौ रुपए निकलवा लिए थे , जो कि उसके पास नहीं थे .उसने एक साथी से रुपए उधार लेकर मेकेनिक को दिए थे .
लेकिन जिन्दगी में पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ कि सोची-समझी योजनानुसार किए गए कार्य में उन्हें असफलता मिली थी . राजीव प्रसाद नामक छात्र द्वारा तैयार पुस्तक उनके नाम से प्रकाशित हानी थी . उसने एक दशक के उपन्यासों पर एक चैप्टर लिखकर उन्हें दिखा भी दिया था , लेकिन उसके बाद वह गायब हो गया था . उन्हें ज्ञात हुआ कि बंगलौर की एक बहुराष्ट्रीय बैंक में उसे नौकरी मिल गयी थी और वह पढ़ाई छोड़ गया था . उन्हें इस बात का अफसोस था कि उन्होंने पहली बार गलत घोड़े पर दांव लगाया था .
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लेकिन अब उनके चुप होने का यह कारण नहीं था .
हुआ यह कि दो दिन पहले लंबे समय के बाद सुहासिनी उनके यहां आयी . शालिनी दफ्तर जा चुकी थी . सुहासिनी को देख वह प्रसन्न हुए . प्रसन्न इसलिए कि उसके आने के लिए कितनी ही बार उन्होंने उसके मोबाइल पर फोन कर उससे आग्रह -अनुग्रह किया था . उसे प्रेम भरे एस.एम.एस. किए थे .
सुहासिनी का उन्होंने ऐसे स्वागत किया मानों वर्षों बाद मिले थे . लेकिन सुहासिनी में उन्हें न वह उत्साह दिखा और न औत्सुक्य . घर में प्रवेश करते ही वह हिमखण्ड की भांति सोफे पर ढह गयी थी . वह देर तक उसकी ओर ताकते रहे थे चुप फिर पूछा था , ''सुहास तुम चुप क्यों हो ? तुम्हारी चुप्पी मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही .''
सुहासिनी उन्हें घूरती रही अपनी बड़ी-बड़ी तीक्ष्ण आंखों से . उन्होंने फिर जब टोका , वह रो पड़ी . उन्हें उसके साथ का पहला दिन याद हो आया . तब भी वह ऐसे ही रोयी थी और सोफे पर उसके निकट खिसक उन्होंने उसके आंसू पोछे थे . उन्होंने उसी प्रकार उसके आंसू पोछने चाहे तो सुहासिनी ने उनका हाथ झिटक दिया , ''आपने मुझे बर्बाद कर दिया .'' वह चीखी .
''मैं ऽ ऽ ने ....?''
''हां .....आपने.....मैं गर्भवती हूं ......''
''तुम .....तुम .....'' उनकी जुबान लड़खड़ा गयी थी . किसी प्रकार अपने को संभाल वह बोले , '' इसमें परेशान होने की क्या बात.....मैं तैयार होता हूं.....किसी डाक्टर के पास......''
''नहीं.....''
''फिर .....'' वह भौंचक थे .
''आप शालिनी जी को तलाक दें और मुझसे विवाह........''
''तुम होश में तो हो न सुहासिनी....?''
''पूरे.....होश-ओ-हवाश में कह रही हूं......''
''क्या प्रमाण है कि यह मेरा ही गर्भ है ?'' वह भड़क उठे थे .
'' प्रमाण क्या हैं ....यह आपको भी पता है........'' सुहासिनी ने सधे स्वर में कहा .
वह धप से सोफे पर बैठ गए थे सिर थामकर . उनके सामने डॉ. विप्लव त्रिपाठी का चेहरा घूम गया था.... राजनीतिशास्त्र विभाग के डॉ. विप्लव त्रिपाठी.... । उनकी एक एम.फिल. की छात्रा ने ऐसा ही आरोप लगाते हुए उनके द्वारा उसे मोबाइल पर भेजे गए एस.एम.एस. के प्रमाण विश्वविद्यालय प्रशासन और इन्क्वारी कमीटी के समक्ष प्रस्तुत किए थे और आरोप सिध्द होने के बाद डॉ. त्रिपाठी को प्रोफेसर पद से विश्वविद्यालय ने बर्खास्त कर दिया था .
सुहासिनी जा चुकी थी ..... कब उन्हें पता नहीं चला था .
और तभी से वह चुप हैं .
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Monday, January 4, 2010

कहानी-२९



वह चेहरा


रूपसिंह चन्देल

मध्य दिसम्बर का एक दिन . सुबह की खिली-खिली धूप और लॉन में पड़ी बेंचें . बेंचों पर बैठे कई चेहरे ..... धूप में नहाये चेहरे .... धूप सेकते चेहरे . खिड़की का पर्दा उन्होंने थोड़ा-सा खिसका दिया था , जिससे लॉन का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था . उनकी नजर एक चेहरे पर टिक गयी और वह गौर से उसे देखते रहे . चेहरे पर उम्र की लकीरें स्पष्ट थीं . उन्होंने कुर्सी एक ओर खिसकाई और खिड़की पर जा खड़े हुए .... निर्निमेष उस चेहरे को देखते हुए .

'वही हैं ......लेकिन यहां क्यों ? ' मस्तिष्क में तंरगें दौड़ने लगीं . कुछ क्षण खिड़की पर खड़े रहकर वह कमरे में टहलने लगे सोचते हुए , 'मैं कैसे भूल सकता हूं उस चेहरे को . ढल गया है .... ढलना ही था . पचास से अधिक सालों की लंबी यात्रा .... पचीस साल जैसा कौन रहता है ! शरीर में स्थूलता भी है ....अपने को देखो तपिश .... तुम क्या उतने ही स्लिम-ट्रिम हो .... बढ़ती उम्र में सभी के आकार-प्रकार - चेहरे बदलते ही हैं ........'

वह एक बार पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए और देखने लगे. इस समय वह चेहरा किसी युवती से बातें कर रहा था . ...युवती , जो पचीस -छब्बीस के आसपास थी ....उस चेहरे से मिलता -सांवला चेहरा , नाक नोकीली , होंठ पतले और आंखें छोटीं . लंबाई भी उतनी ही .....वह भी तो उस युवती जितनी लंबी थीं , लेकिन तब उनके नितंब छूते बाल थे , जैसे कि उस युवती के हैं , लेकिन अब वह बॉब्ड थीं .

'निेश्चित ही यह वही हैं .....' वह अपनी टेबल के चारों ओर कमरे में कुछ क्षण तक टहलते रहे , ' क्या उन्हें मेरे बारे में जानकारी नहीं ? या उनकी स्मृतिपटल से मेरा नाम सदा के लिए मिट चुका है . लेकिन ऐसा संभव नहीं . हम दो बार मिले थे .... कितने ही पत्र लिखे थे एक-दूसरे को .' वह पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए , 'यह मेरा भ्रम नहीं....यह वही हैं .'

दरवाजे पर दस्तक हुई .

''कम इन '' वह तेजी से पलटे और कुर्सी की ओर ऐसे बढ़े मानो चोरी करते हुए पकड़े जाने का भय था .

कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 प्रवीण राय ने आहिस्ता से प्रवेश किया .

''यस प्रवीण .... इज एवरीथिंग फाइन !''

''जी सर . एक्सपर्ट्स डॉ0 श्रेयांष तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह आ गए हैं . ''

''और हेड साहब....डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे ?''

डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष थे और विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज में शिक्षक के किसी भी पद के साक्षात्कार में उनका होना अनिवार्य था . यह विश्वविद्यालय का नियम था .

'' उनके पी.ए. का फोन आया था सर कि वह कुछ देर पहले ही कार्यालय से निकले हैं ......उन्हें पहुंचने में कम से कम आध घण्टा का समय लगेगा .''

''हुंह......'' कुछ सोचने के बाद वह बोले , '' हेड साहब के आने तक प्रतीक्षा करना होगा .... डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह को मेरे यहां ले आओ.......''

''सर मैंने पहले ही उन्हें आपके यहां के लिए कहा था लेकिन दोनों सीधे गेस्ट रूम में जाते हुए बोले कि वहां उन्हें कोई कष्ट नहीं.....''

''ओ. के. ...'' प्रवीण राय को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए वह बैठ गए और बोले , ''इन दोनों की जोड़ी जहां भी जाती है अपने कंडीडेट के लिए दबाव बनाते है ....''क्षणभर चुप रहे , '' दरअसल हेड साहब सीधे व्यक्ति हैं ..... वह सब कुछ जानते हैं , लेकिन नहीं मालूम किन कारणों से प्राय: इन दोनों को एक साथ विशेषज्ञ के रूप में रिकमेण्ड कर देते हैं .''

''सर , मुझे जहां तक जानकारी है .... जब भी डॉ. तिवारी से पूछा जाता है विशेषज्ञ के रूप में किसी कॉलेज में जाने के लिए उनकी शर्त होती है कि उनके साथ दूसरा विशेषज्ञ डॉ. निकिता सिंह होंगी तभी.... विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ जाने की शक्ति किसी में नहीं है . हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक हैं ... . सत्ता में पैठ है और वी.सी. भी उन्हें मानते हैं .''

वह मुस्कराते रहे .

''सर , निकिता सिंह का कोई छात्र है ....सुना है .... उनके निर्देशन में पी-एच.डी. कर रहा है और 'नेट' भी उत्तीर्ण है .....हो सकता है .....''

उन्होंने प्रवीण की बात आधी-अधूरी सुनी . उस क्षण उनकी नजरें खिड़की से बाहर बेंच पर अखबार में झुके उस चेहरे पर टिकी हुई थीं . युवती अब वहां नहीं थी .

'युवती भी शायद अभ्यर्थी है .' उन्होंने सोचा .

''सर , फिर.....'' प्रवीण के टोकने से वह अचकचा गए .

''हुंह.....यह हो सकता है . लेकिन डॉ. तिवारी दो अपने रखते हैं तब कहीं एक वेकेंसी निकिता सिंह को देते हैं . ''

''सर ''.

''प्राय: महिला अभ्यर्थी ही उनकी कंडीडेट होती हैं . उनके निर्देशन में पी-एच.डी करने वाली सभी लड़कियां ही हैं ..... एकदम समाजवादी हैं डॉ. तिवारी . निकिता ने भी उनके निर्देशन में पी-एच.डी की थी ..... उनके आलोचक इसे उनकी कमजारी मानते हैं तो मानते रहें . '' चुप होकर प्रवीण की ओर देखने के बाद वह खिड़की से बाहर लॉन की ओर देखने लगे . वह चेहरा उन्हें वहां नजर नहीं आया . 'कहां गई ? ' क्षणांश के लिए वह विचलित हुए , लेकिन तभी सामने बैठे अपनी ओर ताकते प्रवीण पर दृष्टि डाली और बोले , ''लेकिन हम क्या करें प्रवीण ?''

'' क्या सर ?''

''आपको बताया था .... मिनिस्ट्र्री से आए फोन के बारे में .... मंत्री जी किसी निरंजन प्रसाद में इंटरेस्टेड हैं .... मंत्री जी के मुंह लगे ज्वाइण्ट सेक्रेटरी का फोन था . दोनों ही बिहार के हैं . जे.एस. ने संकेत में यह भी कहा था कि निरंजन मंत्री जी का दूर का रिश्तेदार है .......''

''सर , हमें डॉ. तिवारी से पहले ही बात कर लेनी चाहिए और अपनी समस्या डॉ. पाण्डे को भी बता देना चाहिए .''

''प्रवीण , आप जानते हैं कि डॉ. तिवारी का कंडीडेट नहीं तो किसी का नहीं ......उन पर मंत्री-संत्री का प्रभाव नहीं पड़ने वाला ....... ''

''सर , वेकेंसी भी एक ही है....एडहॉक भी नहीं ....वर्ना डॉ. तिवारी के लिए एडहॉक का ऑफर दे सकते थे .''

''प्रवीण, '' वह कुछ गंभीर हो उठे , ''आपको नहीं लगता कि यह सब कितना अनफेयर है .... मंत्री के कंडीडेट की बात हो या डॉ. तिवारी या डा. निकिता की या किसी अन्य के कंडीडेट की .... जो अभ्यर्र्थी दूर से आते हैं और कितनी ही बार उन्हें दूर शहरों में असफल साक्षात्कार के लिए जाना होता है....... उनके विषय में सोचो . अधिकांश बेकार और साधारण हैसियत के युवक .... ये तिवारी या मंत्री जैसे घड़ियाल उनकी नौकरियां निगल जाते हैं .....'' उनका चेहरा लाल हो उठा .

''सर '' प्रवीण ने चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि वह स्वयं भी सिफारिश से नियुक्त हुआ था . लेकिन वह जानता था कि उसके सामने बैठे डॉ0 तपिश .... उसके प्राचार्य एक मेरीटोरियस व्यक्ति थे और उन्होंने सिफारिश से नहीं अपनी योग्यता से प्राध्यापकी पायी थी और विश्वविद्यालय - कॉलेज की राजनीति के बावजूद वह इस पद पर पंहुचे थे ... अपनी योग्यता के बल पर ....

'' डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह के लिए जलपान की व्यवस्था .....'' अपनी बात अधूरी छोड़ दी उन्होंने .

''सर डॉ0 अनिरुध्द शुक्ल उनकी सेवा में हैं .''

''ओ.के. ....'' उन्होंने पुन: लॉन की ओर देखा . बेंचों पर बैठे अन्य लोग भी इधर'उधर जा चुके थे .... केवल एक वृध्द पुरुष को छोड़कर .

''डॉ0 पाण्डे के आते ही मुझे सूचित करना . उनके आते ही इंटरव्यू प्रारंभ कर देना है..... तब तक आप डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह का खयाल रखें ..... '' वह पुन: कुर्सी से उठ खड़े हुए और कमरे में टहलने लगे .

******

'लोग रिसेप्शन में बैठे होंगे ....धूप में गर्मी बढ़ गयी होगी . मुझे रिसेप्शन की ओर जाना चाहिए .'

'लेकिन क्यों ?'

'शायद वह वहां मिल जांए . '

'मिल भी जाती हैं तो क्या तुम उनसे बात कर सकते हो इस समय . वह लड़की उनकी बेटी होगी .... यह तो अनुमान लग ही गया है . एक अभ्यर्थी की मां से बात करना....तपिश तुम प्राचार्य हो इस कॉलेज के.....'

'प्राचार्य क्या इंसान नहीं ! उसके परिचितों के बच्चे साक्षात्कार में नहीं बैठ सकते ? बात कर लेने से ही मैं उनकी लड़की का फेवर करने लगूंगा ? मुझे उस लड़की का नाम भी मालूम नहीं .... जबकि मंत्री जी की तोप इन्हीं बच्चों के बीच कहीं समायी होगी .... तिवारी और निकिता सिंह की गन भी होगी कहीं ...... इण्टरव्यू करने उधर से जाते हुए मैं उन्हें भलीभांति देख सकूंगा ..... जरूरी नहीं कि वह मानसी ही हों .... हों भी तो वह मुझे पहचान लेंगी यह आवश्यक नहीं है .'

'फिर तुम उधर से जाना ही क्यों चाहते हो ?' अंदर से आवाज आयी . 'पहचान लिए जाने के लिए ही न ! लेकिन क्या बात मात्र इतनी ही है ! क्या यह सच नहीं कि उनके पहचानने से तुम्हारा आहत स्वाभिमान संतुष्ट होगा . तुम उन्हें यह अहसास नहीं करवाना चाहते कि तुम इस कॉलेज के प्रिसिंपल हो ?'

'नहीं , ऐसा नहीं है .....इतनी पुरानी बात ....तीस साल पुरानी ....मैं तो भूल ही गया था ..'

'नहीं तपिश....तुम उसे एक दिन ...बल्कि एक पल के लिए भी नहीं भूले....भूल सकते भी नहीं थे .... वह पुन: खिड़की पर खड़े हो गए और बाहर देखने लगे . लॉन की एक बेंच पर वही अकेला वृध्द व्यक्ति बैठा था और बेंच से कुछ हटकर एक कुत्ता अपना पेट , टांगें और मुंह ऊपर उठाये पीठ के बल निश्चल लेटा हुआ था . तभी दरवाजे पर नॉक हुआ .

''यस !'' वह पलटे .

'सर , हेड साहब आ गए हैं ....सीधे कांफ्रेंस रूम में .....आप भी......''

''ओ.के.'' अभ्यर्थियों के नामों का फोल्डर टेबल से उठा वह डॉ0 प्रवीण के पीछे हो लिए थे .

*******

उन दिनों वह दिल्ली में विदेश मंत्रालय में अनुवादक थे . अपने को पी-एच.डी. के लिए पंजीकृत करवाने में दो बार असफल हो चुके थे . यह उन दिनों की बात है जब दूसरी बार विश्वविद्यालय ने उनके शोध विषय को खारिज किया था . वह परेशान थे और यह बात मानसी को बताना चाहते थे . बताना इसलिए चाहते थे क्योंकि पिछली मुलाकात में मानसी ने पहले विषय के खारिज होने के कारणों पर गहरी रुचि प्रदर्शित की थी और उसके हर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक ही बात कही थी कि विश्वविद्यालय ने विषय के खारिज होने का कोई कारण उन्हें नहीं बताया ....केवल सूचना भेजी थी . मानसी उद्विग्न थी और तब उन्होंने अनुभव किया था उनके शोध से शायद उसकी भविष्य की आकांक्षाएं जुड़ी हुई थीं . लेकिन 'संभव है यह मेरी अपनी सोच हो.... वह ऐसा न सोचती हो .' उन्होंने सोचा था .' यदि शोध नहीं कर सके और प्राध्यापक नहीं बन पाए तो क्या . जो नौकरी वह कर रहे हैं .... उसका भविष्य प्राध्यापक जितना आकर्षक न सही लेकिन बुरा भी नहीं . डिप्टी डायरेक्टर तो वह बन ही जाएगें .'

'लेकिन मानसी को बताना आवयक है . पिछले एक वर्ष से कभी एक बहाने तो कभी दूसरे वह शादी टालती जा रही थी . वह दूरदर्शन में प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव थी और प्रारंभ में उसका बहाना था कि वह दिल्ली में थे और दिल्ली में उसका स्थानांतरण कठिन था क्योंकि वहां पहले से ही अतिरिक्त प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव्स बैठे हुए थे , जबकि उनका लखनऊ स्थानांतरण संभव नहीं था . मानसी के स्थानांतरण के विषय में वह कमलेश्वर जी से मिले थे . कमलेश्वर जी उन्हीं दिनों दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर नियुक्त हुए थे . मुस्कराते हुए कमलेश्वर जी ने कहा था , ''तपिश जी ..... यह बड़ा काम नहीं है . शादी करो....स्थानांतरण की जिम्मेदारी मेरी .'' कमलेश्वर जी ने उनकी आंखों में देखा , फिर मुस्कराये ....एक मीठी मुस्कान और बोले थे , ''भाई , पता कर लो ....आपकी मंगेतर की कोई दूसरी समस्या तो नहीं ....''

''ऐसा नहीं लगता सर....उसे दोनों के अलग-अलग शहरों मे रहने का भय ही सता रहा लगता है .''

''उन्हें बता दो कि मैंने आश्वस्त किया है ....''

कमलेश्वर जी की बात बताने के बाद मानसी ने खत में लिखा , ''तपिश , आपने पहले यह क्यों नहीं बताया था ... अब एक साल के लिए मैं बंध गई हूं . मैंने यहां विश्वविद्याालय में मार्निंग शिफ्ट में उर्दू सार्टीफिकेट कोर्स में प्रवेश ले लिया है . एक जमाने से मैं उर्दू सीखना चाहती रही हूं .... एक वर्ष की ही बात है .....कमलेश्वर जी तो अभी आए ही हैं .... अभी रहेगें ही ..... भले ही आई.ए.एस . लॉबी उनके खिलाफ है.......तो क्या आप एक वर्ष रुक नहीं सकते ?''

''मैं तो रुका हुआ हूं ही..... लेकिन मेरे घरवाले....उनका धैर्य चुका जा रहा है .'' उन्होंने मानसी को लिखा था .

''मैंने अपने डैडी से बात की है. वह आपके डैडी को मेरी समस्या से अवगत करवा देंगे .'' मानसी ने इस पत्र में आगे लिखा , ''समय निकालकर आकर मिल लें ......पत्रों में बातें हो नहीं पातीं .''

''कोशिश करूंगा .'' उन्होंने उसे लिख तो दिया था लेकिन लखनऊ जाने का प्रयास नहीं किया और न ही मानसी का उसके बाद कोई पत्र आया . शोध के अपने नये विषय की तैयारी और रूपरेखा प्रस्तुत करने की चिन्ता में वह इतना डूबे कि वह उसे पुन: पत्र लिख नहीं पाए . इस बार विषय प्रस्तुत करते ही निर्णायक समिति की बैठक हुई और उनका विषय पुन: खारिज कर दिया गया . विश्वविद्यालय का पत्र थामें वह कितनी ही देर तक यह सोचते रहे थे कि उन्हें मानसी को यह सूचना देना ही चाहिए . और उन्होंने उसे अंतर्देशीय पत्र लिख दिया था .

पन्द्रह दिन के अंदर ही उत्तर आया , ''आपका मिलना आवश्यक है . जितनी जल्दी संभव हो ....''

उन्होंने उसके ऑफिस के पते पर पत्र लिख दिया कि वह अमुक तिथि को अमुक ट्रेन से लखनऊ पहुंचेंगे....सुबह दस बजे उसके कार्यालय में मिलेंगे .''

''कार्यालय नहीं.....इंडियन कॉफी हाउस ....ग्यारह बजे .... मेरे कार्यालय के निकट ही है ....सुबह ग्यारह बजे ....मिस नहीं करेंगे .'' मानसी ने तुरंत लिख भेजा था .

******

निश्चित तिथि को ठीक ग्यारह बजे सुबह वह कॉफी हाउस में थे . पांच मिनट ही हुए थे उन्हें वहां पहुंचे कि उन्होंने एक युवक के साथ सड़क पार करते हुए मानसी को देखा . टेबल पर बैठने के लिए उन्होंने कुर्सी को हाथ लगाया ही था कि रुक गए और बाहर निकल आए . उनकी दृष्टि युवक पर टिकी हुई थी , मानसी जिससे हंसकर कुछ कह रही थी . युवक लंबा....पांच फीट आठ इंच के लगभग.....स्लिम ...गोरा ....एक वाक्य में ... सुन्दर था .

'ऑफिस का कोई कलीग होगा .' उन्होंने सोचा , 'कहीं जा रहा होगा .'

लेकिन युवक कहीं नहीं गया . मानसी के साथ रहा . मानसी ने दूर से ही उन्हें देख लिया था और उनकी ओर हाथ का इशारा कर कुछ कहा . उन्होंने मानसी के संकेत के बाद युवक को हंसते देखा था .

''सॉरी....मैं दस मिनट लेट हूं .'' उनके निकट पहुच मानसी बोली .

वह चुप रहे . उनकी नजरें युवक पर गड़ी थीं .

''ओह ! '' मानसी ने उनके भाव पढ़ लिए , ''यह हैं मनीष तिवारी ....आकाशवाणी में हैं ....प्रोग्रैम....''

''एक्ज्यूक्यूटिव....'' मानसी से शेष शब्द मनीष तिवारी ने झटक लिया और उनकी ओर हाथ बढ़ा बोला , ''आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई .''

''थेैंक्स .'' मंद स्वर में वह बोले थे .

''मैं चलता हूं मानसी.....आफ्टरनून आकर केस डिस्कस कर लूंगा....नो हरी.....''

''अरे यार.....ऐसी भी क्या जल्दी है ! तपिश जी क्या सोचेगें ? एक कप कॉफी पीकर चले जाना '' मनीष की ओर देख मुस्कराती हुई मानसी बोली , ''अरे हम लोग यहीं खड़े रहेगें या बैठेगें भी .....'

''हां.....हां....क्यों नहीं ......'' और वह अंदर की ओर मुड़ गए तो मानसी और मनीष भी उनके पीछे हो लिए थे . जिस मेज पर वह बैठने जा रहे थे .... वह अभी भी खाली थी .

बैठने के बाद उनके बीच देर तक चुप्पी पसरी रही . चुप्पी को ताड़ती हुई मानसी ने पूछा ,

''कॉफी लेंगें ?''

''कॉफी हाउस में बैठे हैं तो वह तो लेना ही है........इस मुलाकात को यादगार भी तो बनाना है .'' उन्हें अपनी बात अटपटी लगी , लेकिन बात जुबान से रपट चुकी थी . संभालने का प्रयत्न करते हुए उन्होंने तत्काल जोड़ा , '' मनीष जी का साथ होने से इसे यादगार मुलाकात ही कहूंगा ....''

मनीष के चेहरे पर मुस्कान तिर गयी .

''हां , यह है . मनीष बहुत व्यस्त रहते हैं ....कभी पकड़ में नहीं आते . आकाशवाणी की नौकरी......नाटक लिखते हैं ....इनकी कई स्क्रिप्ट पर दूरदर्शन और आकाशवाणी ने नाटक तैयार किए हैं .''

''हुंह .'' उन्होंने मनीष की ओर पुन: हाथ बढ़ाया .''मेरा सौभाग्य . आप जैेसे कलाकार से मुलाकात का श्रेय मानसी जी को .... इनका भी आभार .''

''मानसी कुछ अधिक ही प्रशंसा कर रही हैं सर ! बस यूं ही कुछ उल्टा-सीधा लिख लेता हूें .''

''तपिश जी ......ये संकोच करते हैं .....''

''हर बड़ा कलाकार अपने बारे में बताने या बताए जाने पर संकोच प्रकट करता है . बड़प्पन की यही निशानी है . '' वह अब पूरी तरह खुल चुके थे .

''यू आर राइट तपिश जी .... मनीष जीनियस हैं , लेकिन मेैं जब कहती हूं तो यह चिड़चिड़ा जाते हैं .''

उन्होंने देखा अपने को 'जीनियस' कहे जाने पर मनीष का चेहरा खिल उठा था . वह चुप रहे . कुछ देर बाद मनीष बोला , ''मानसी की ज़र्रानवाजी सर .....लेकिन आप मुझे लेकर कोई गलतफहमी नहीं पालेंगे ..... मुझ जैसे कलाकार-लेखक गली-कूंचों में एक खोजेंगे -- अनेक मिल जाएगें ....''

''आपने देखा इनकी विनम्रता .'' तपिश की ओर देखते हुई मानसी बोली .

वह तब भी चुप रहे .

''यार मनीष , कुछ और तारीफ तभी करूंगी .... जब कुछ पी लूंगी .'' मानसी बोली .

''बेयरे को आवाज दो .....दो चक्कर काट गया और हम लोग बातों में लगे रहे .''

''जाकर आर्डर कर आता हूं .'' मनीष जाने के लिए उठा , दो कदम बेयरे की ओर बढ़ा , फिर रुककर उनसे पूछा ,'' तपिश जी कुछ और लेगें .''

''नो थैंक्स .''

******

कॉफी पीकर मनीष तिवारी चला गया .

''तपिश जी , आपको कहीं कोई दूसरा काम है ?'' मानसी ने पूछा .

वह अचकचा गए . सोचने लगे ,''इसने मुझे बुलाया और अब पूछ रही है कि.....''

कोई उत्तर दिए बिना वह मानसी की ओर देखने लगे थे .

''सॉरी ,मैंने यूं ही पूछा . कभी-कभी ऐसा होता है ... लेकिन ....'' आगे कुछ न बोल वह कभी बेयरे की ओर देखती ओैर कभी गेट की ओर .

तपिश को लगा कि शायद उसने किसी और को भी बुलाया हुआ है . कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने पूछ लिया ,''किसी को आना है ?''

''नहीं....कौन आएगा ? '' मानसी फिर चुप थी और लगातार गेट कर ओर देखती जा रही थी . तपिश भी उधर ही देखने लगे . तभी बेयरा आ गया .

मानसी का ध्यान गेट की ओर होने का लाभ उठा तपिश ने कॉफी के पैसे बेयरे को दे दिए .

''आपने क्यों दिए ?''

''मुझे नहीं देना चाहिए था ?''

''मेरा यह मतलब नहीं ....''

''अगर आपको किसी की प्रतीक्षा नहीं तो हम उठें ....डेढ़ घण्टा हो चुका है .... ''

''हां.....लेकिन यहां तो लोग सुबह आकर शाम तक बैठे रहते हैं ....''

''हां.....आं....लेकिन हमें अभी बूढ़ा होने में बहुत वक्त है .''

मानसी मुस्करा दी . उन्होंने ध्यान दिया , उसकी मुस्कराहट में उत्साह -प्रफुल्लता नहीं थी .

उठ खड़े होते हुए उन्होंने पूछा , ''आपके पास अभी ओैर कितना वक्त है ....?''

''लंच तक आपके साथ रह सकती हूं ... ''

बाहर फुटपाथ पर पहुंच वह बोले ,''फिर हम क्यों न हजरतगंज में चहल-कदमी करते हुए बातें करें ....''

''जी...श्योर ...''

*****

दो बजे तक मानसी उनके साथ हजरतगंज में एक छोर से दूसरे छोर तक उलट-
फेर कर टहलती रही . उन्हें आश्चर्य था कि जिस उद्देश्य से उसने उन्हें तुरंत आ जाने का आग्रह किया था उस पर चर्चा करने से वह बचती रही . उन्होंने जब अपने शोध विषय के निरस्त होने की चर्चा छेड़ी... उसने केवल ,''ऐसा होता है ... वह कोई मुद्दा नहीं .''

''फिर मुद्दा क्या है ?''

''मुद्दा ....... कुछ है ही नहीं .''

''फिर....?''

''आपको लिखा था कि मैंने उर्दू कोर्स ज्वायन किया है .... उसे पूरा कर लेना चाहती हूं .''

''यह कोई आई.ए.एस. , पी.सी.एस. जैसी तैयारी तो नहीं . '' वह बोले . उनका स्वर कुछ ऊंचा था .

''आप इतनी उतावली क्यों दिखा रहे हैं ?'' मानसी के स्वर में चिड़चिड़ाहट थी .

वह हत्प्रभ थे . कारण वह पहले ही बता चुके थे . चुप रहे .

''मैं समझती हूं ... रुकना हमारे हित में है . आपको शोध के लिए पंजीकृत होने में सुविधा रहेगी .... तब तक कुछ काम भी कर डालेगें ... मैं भी उर्दू में कुछ कर लेना चाहती हूं....''

''हुह....'' सामने से आ रहे व्यक्ति से उन्होंने अपने को बचाया .

''क्या आप नहीं चाहते कि आप जैसे प्रतिभाशाली युवक का स्थान किसी डिग्री कॉलेज या विश्वविद्यालय में है .... बुरा नहीं मानेगें .... आपने बताया था कि अच्छे अंको से आपने प्रथम श्रेणी पायी थी एम.ए. में .''

''जी .''

''फिर अनुवाद में प्रतिभा का क्षरण क्यों ...?''

वह निरुत्तर रहे .

''अरे दो बज रहे हैं ? ढाई से मेरे एक कार्य का लाइव टेलीकॉस्ट है ....मैं चलूं ?''

''श्योर .'' उदासीन स्वर में वह बोले थे .

मानसी ने बॉय किया और तेजी से दूरदर्शन केन्द्र की ओर लपक गयी . वह देर तक खड़े उसे जाता देखते रहे थे . मानसी तो चली गई थी लेकिन उनके अंदर एक उद्वेलन छोड़ गयी थी ....

उन्होंने रिक्शा पकड़ा और होटल लौट गए थे .

*****

उनके पिता पारंपरिक सोच के थे और अपनी बढ़ती उम्र से चिन्तित . एक दिन वह दिल्ली आ पहुंचे और उन्हें धमकाने के अंदाज में बोले , ''तपिश , मैं उस रिश्ते को तोड़ने जा रहा हूं.... हद ही हो गयी . तय हुए डेढ़ साल से ऊपर हो चुका है .... उनके बहानों का अंत ही नहीं .... मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है .''

''क्या ?'' धीमे स्वर में उन्होंने पूछा .

''यही कि वे लोग किसी आई.ए.एस. -पी.सी.एस. के चक्कर में हैं . वहां से उन्हें स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा होगा .... और तुम्हें उन्होंने स्थानापन्न के रूप में रखा हुआ है .''

''मैं भी जल्दी में नहीं हूँ . '' उन्होंने उत्तर दिया था .

''तुम्हें जल्दी क्यो होगी ? तुम्हारी छोटी बहन छब्बीस की हो रही है ... तुम्हें यह पता नहीं होगा....? लेकिन मुझे उसकी चिन्ता भी करनी है .''

''डैडी ...आप विपाशा की शादी की चिन्ता करें .... मैं फिलहाल शोध की चिन्ता करूंगा....''

'' शोध-बोध...शादी के बाद भी होता रहेगा .''

'' रजिस्ट्रेशन होने तक मेरे मामले को स्थगिेत कर देंगे तो मेरे हित में होगा .'' उनके स्वर की निरीहता ने शायद पिता को सोचने के लिए विवश किया था . हथियार डालते हुए वह मरे-से स्वर में बोले थे ,''तपिश , शादी की भी एक उम्र होती है ... उसके बाद फिर समझौते ही होते हैं .''

वह चुप रहे थे .

पिता गए तो वह शोध के लिए नये विषय के पंजीकरण की तैयारी में लग गए थे .

*****

तीसरी बार शोध निर्णायक मंडल की बैठक छ: माह बाद हुई . उस बार उनका विषय पंजीकरण के लिए स्वीकृत हो गया था . जिस दिन यह बताने के लिए दफ्तर में उनके गाइड का फोन आया उसी दिन शाम घर पहुंचने पर डाक से आया उन्हें एक निमंत्रण पत्र मिला , जिसपर नजर पड़ते ही वह चौंके थे . उस पर 'मानसी और मनीष के नाम लिखे थे . कार्ड खोलने का मन न होते हुए भी उन्होंने उसे खोला .... पढ़ा और एक ओर खिसका दिया . उसके दसवें दिन उन दोनों का विवाह होना था . देर तक वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा सोफे पर अधलेटे से बैठे रहे थे . पिछली मुलाकात के दृश्य तेजी से उनकी आंखों के सामने घूमते रहे थे .

'मानसी ने उन्हें केवल मनीष से मिलवाने के लिए बुलाया था .... वह शायद इस विषय में बताना चाहती थी ...फिर कहा कयों नहीं... ' वह सोच रहे थे - 'कहना आवश्यक था ? यदि तुममें समझने की क्षमता ही नहीं तब कहकर भी क्या समझ लेते ? उसके परिवार वालों को भी इस बारे में जानकारी रही होगी . वे मनीष और उसके प्रेम संबधों के कारण उलझन में रहे होंगे . लेकिन मानसी ने उचित ही किया . यदि अपने परिवार के दबाव में वह उनसे विवाह कर भी लेती तो भी क्या वह मनीष को भूल जाती ! तब क्या स्थिति बनती.... नहीं उसने उचित कदम उठाया ....'' मुझे उसे बधाई देनी चाहिए .

और अगले दिन उन्होंने मानसी को बधाई का टेलीग्राम भेज दिया था .

******

उसके बाद जीवन कुछ यूं बदला कि उन्हें पता ही नहीं चला . वह निरंतर सफलताओं के सोपान चढ़ते रहे ... पी-एच.डी. सम्पन्न होने से पहले ही उस कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए....और आज वह उस कॉलेज में ही प्राचार्य थे . उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा .... क्क्त भी नहीं था देखने का ...वक्त शादी करने के लिए भी नहीं निकाल सके....काम-शोध...और उसी दौरान दो वर्षों के लिए वह हिमाचल विश्वविद्यालय के वी.सी. भी रहे .... केवल दो वर्षों के लिए... दो वर्षों बाद पुन: अपने पद पर वापस लौटे . उन्हें कभी किसी की कमी खटकी भी नहीं . अपने अधीनस्थों और विद्यार्थियों को अपना परिवार समझा और सभी के लिए दरवाजे खुले रखे . आज वह दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्राचार्य के रूप में जाने जाते हैं .

लेकिन मानसी उन्हें कभी याद नहीं आयी ऐसा नहीं था . काम के बीच कभी अचानक खाली होते तो सोच लेते....मानसी उनके जीवन में आयी पहली और अंतिम लड़की थी .... भले ही उसके पिता ने उसे खोजा था और बाकायदा उनकी 'रिंग' सेरेमनी हुई थी . उसके बाद वह उससे दो बार ही मिले थे.... कुछ पत्राचार हुआ था .... तब वह उसके विषय में ही सोचते रहते थे .... सपने बुनते रहते थे . अकेले रहते थे ... दफ्तर के बाद मानसी उनके साथ हाती थी ... लेकिन जब सब समाप्त हुआ उन्होंने अपने को इतना समेटा कि मानसी भूले-भटके कभी उनके मानस पटल पर विचरण कर जाती और तब वह - ''आपने उचित निर्णय लिया था मानसी '' अपने को उसकी स्मृति से मुक्त कर लेते , 'लेकिन उसके जाते-जाते यह भी कहते , ''यदि आपने वह निर्णय न किया हेता मानसी तो मैं आज जो कुछ हूं वह नहीं होता .''

******

साक्षात्कार प्रारंभ होने से पूर्व उन्होंने अभ्यर्थियों के नामों पर दृष्टि डाली और अभीप्सा तिवारी , लखनऊ पर अटक गए . सब कुछ उलटता-पलटता नजर आया . 'हर अभ्यर्थी को जानकारी होती है कि जिस कॉलेज में वह साक्षात्कार के लिए जा रहा है वहां का प्राचार्य , विभागाध्यक्ष और विश्वविद्यालय का विभागाध्यक्ष कौन है . अभीप्सा यदि मानसी की बेटी है तब मानसी को भी ज्ञात होगा ,फिर उसने मुझे एप्रोच क्यों नहीं किया ? करती तो क्या तुम उसके लिए कुछ कर देते ! डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता और मंत्रालय..... क्या वह इतना आसान होता .' उन्होंने सोचा 'आवश्यक नहीं मानसी को पता ही हो .... मेरे नाम के कितने ही लोग हो सकते हैं . फिर उसने तो यही सोचा होगा कि मैं सरकारी बाबू था .... आज भी कुछ पदोन्नतियों के बाद वहीं होऊंगा .... ' क्षणांश के लिए रुककर पुन: सोचा , ''यह भी संभव हेै वह मानसी हो ही न.... '

वह कुछ और सोचते कि अभ्यर्थियों को बुलाये जाने के लिए प्रवीण ने पूछा और उनसे पहले डॉ0 पाण्डे ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी .

अभीप्सा तिवारी को जब बुलाया गया तब वह कुछ विचलित हुए . एक बार उनके मन में आया कि वह उससे कुछ न पूछकर केवल उसके पेरेण्ट्स के विषय में पूछें , लेकिन तत्काल अंदर से आवाज आयी ,'' डॉ0 तपिश ....क्या मूर्खतापूर्ण बात सोचने लगे .... इतना भावुक होकर अपने पद की गरिमा क्यों घटाने पर तुले हुए हो ?''

अभीप्सा ने चयन बोर्ड के सभी सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर दिए और सही -बेहिचक . लखनऊ विश्वविद्यालय से उसने प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया था , नेट उत्तीर्ण थी और पी-एच.डी. कर रही थी . अभीप्सा एक हलचल थी उनके अंदर . उसके अतिरिक्त दो अभ्यर्थी और भी थे जिन्होंने सभी के प्रश्नों के सही उत्तर दिए थे . लेकिन उन दोनों के बजाय घूमफिर कर उनके दिमाग में अभीप्सा की नियुक्ति घूम रही थी . 'अभीप्सा ही क्यों ?' मन के एक कोने से प्रश्न उठा ,'दूसरे अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय के छात्र हैं ..... उनमें कोई कमी भी नहीं है .... फिर तपिश तुम अभीप्सा के बारे में ही क्यों सोच रहे हो ! मानसी से जुड़ा अतीत तुम्हें परेशान कर रहा है ?'

उन्होंने विश्वविद्यालय के विभागाध्यसक्ष और डॉ0 तिवारी की ओर दृष्टि डाली . डॉ0 तिवारी साक्षकार समाप्त हो जाने के बाद डॉ0 निकिता सिंह से फुसफुसाकर कुछ कह रहे थे और वह स्वीकृति में सिर हिला रही थी . कांफ्रेंसरूम में सन्नाटा देर तक चहलकदमी करता रहा . बीच-बीच में कुछ कागजों की सरसराहट की आवाज हो जाती . तभी उन्होंने धण्टी बजायी . वह सन्नाटे को तोड़ना चाहते थे . गेट पर तैनात चपरासी दौड़ता हुआ आया .

''चाय ''

''जी सर .'' चपरासी के मुड़ते ही वह बोले , ''किसके नाम पर विचार किया डॉ0 तिवारी ? '' उन्होंने विभागाध्यक्ष और डॉ0 निकिता सिंह की ओर देखा .

'' रंजना श्रीवास्तव .....''

''डा0 साहब रंजना आधे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं दे पायी थी.....'' डॉ0 प्रवीण राय विनम्रतापूर्वक बोले .

उन्होंने पुन: विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष की ओर देखा . वह चुप थे .

''सर.... डॉ0 प्रवीण ठीक कह रहे हैं .'' डॉ0 शुक्ल की आवाज थी . डॉ. शुक्ल ने कुछ अधिक ही प्रश्न किए थे रंजना श्रीवास्तव से . उन्होंने उससे यह भी पूछा था कि पी-एच.डी. के उसके निर्देशक कौन थे ! प्रश्न सुनकर पहले तो रंजना अचकचाई थी , फिर डॉ0 तिवारी की ओर देखती रही थी . वे यह देखकर उलझन में थे कि वह उनकी ओर क्यों देख रही थी . जब डॉ0 शुक्ल ने अपना प्रश्न दोहराते हुए कहा , ''रंजना श्रीवास्तव , आप डाक्टर साहब की ओर क्यों देख रही हैं ? मेरे प्रश्न का उत्तर दें .''

''जी , डाक्टर साहब मेरे निर्देशक थे .'' डॉ0 तिवारी की ओर इशारा करती हुई रंजना बोली थी .

अब वह समझ पा रहे थे कि डॉ0 शुक्ल ने सोच-समझकर उस लड़की से वह प्रश्न किया था . शुक्ल को पहले से ही जानकारी रही होगी और बोर्ड के सभी सदस्यों को इस प्रकार वह इस बात से अवगत करवाना चाहते होगें . शायद उन्हें यह भी जानकारी रही होगी कि डॉ0 तिवारी रंजना श्रीवास्तव का ही चयन करना चाहेगें .

अभीप्सा के नाम का प्रस्ताव करने का विचार उन्हें त्यागना पड़ा था , क्योंकि डॉ. तिवारी डॉ. शुक्ल पर बरस पड़े थे . प्रवीण शुक्ल के पक्ष में बोल रहे थे और उनके तर्क थे कि जब रंजना श्रीवास्तव से अच्छे और उससे अधिक योग्य अभ्यर्थी हैं तब उसका चयन क्यो किया जाए !

डॉ0 तिवारी और निकिता सिंह रंजना के पक्ष में अड़ गये . लगभग दो घण्टे तक बहस चलती रही . चाय के दो दौर समाप्त हो चुके थे . निष्कर्ष के लिए शुक्ल और प्रवीण उनकी और हेड की ओर देखने लगे थे . हेड ने पूरी तरह मौन धारण किया हुआ था . शायद उन्हें पहले से ही यह ज्ञात था कि तिवारी अपने कंडीडेट के लिए सदैव की भांति अड़ेंगे . तिवारी के आड़े आना उन्हें उचित नहीं लगा . उन्होंने चुप का विकल्प चुन लिया था . तपिश बहुत देर तक अपने प्राध्यापकों और डॉ0 तिवारी के बीच छिड़ी बहस को सुनते रहे थे . उन्होंने विभागाध्यक्ष की ओर पुन: देखा . वह स्थितप्रज्ञ थे . अंतत: उन्होंने कहा , ''डॉ0 तिवारी , रंजना इस कॉलेज के लिए उपयुक्त नहीं रहेगी .... उसके बजाय आप किसी अन्य के नाम पर विचार करें तो अच्छा होगा .''

''मैं किसी और के नाम की संस्तुति नहीं करूंगा . यदि आप लोग करना भी चाहेगें तो मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा . ''डॉ0 तिवारी ने उबलते हुए कहा .

''मैं भी नहीं करूंगा .'' डॉ0 निकिता सिंह के स्वर में भी उत्तेजना थी .

और बोर्ड निरस्त कर दिया गया था .

*****

जब कांफ्रेंस रूम से वह बाहर निकले अंधेरा हो चुका था . चपरासी , सेक्शन अफसर , दो क्लर्कों के अतिरिक्त चौकीदार ही वहां थे . टयूबलाइट्स और पीले बल्बों की रोशनी कॉलेज परिसर में फैेली हुई थी . किसी से बिना कुछ कहे वह रिशेप्शन की ओर बढ़ गए . प्रवीण उनके पीछे लपके , लेकिन दूर से ही सूना पड़े रिशेप्शन को देख वह उल्टे पांव लौट पड़े थे अपने चैप्बर की ओर .

''सर , मैंने आपसे पहले ही कहा था .... हमें दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा सर ..... छ: महीने लग जाएगें ... लेकिन.....''

'हुंह....'' विचारमग्न स्वर में वह बोले , ''तो सभी चले गए ?''

''कौन सर ?'' प्रवीण ने उनके पीछे चलते हुए पूछा .

''कोई नहीं .''

और वह तेजी से अपने चैम्बर की ओर बढ़ गए थे .

*****

Wednesday, November 11, 2009

कहानी के बारे में

तकनीकी कारणों से कहानी - २७ का शीर्षक कहानी के साथ प्रकाशित नहीं हो पाया . अतः पाठको से अनुरोध है कि वह उसका शीर्षक - ’हादसा’ पढ़ेंगे.

रूपसिंह चन्देल

Wednesday, November 4, 2009

कहानी - २८


दरिन्दे
रूपसिंह चन्देल

आप भले ही यह सोचें कि यह किसी विश्वविद्यालय के किसी प्रोफेसर की कहानी है , जिसकी अधीनस्थ अधिकारी ने उसके विरुध्द यौन प्रताड़ना की लिखित शिकायत वाइस चांसलर से लेकर ऐसे मामलों के लिए गठित शिखर समितियों से की ; लेकिन वे लंबे समय तक कान में तेल डाले बैठे रहे और प्राफेसर साहब अपने मित्रों और परिचितों से शिकायतकर्ता पर दबाव डलवाते रहे कि वह शिकायत वापस लेकर अपनी नौकरी की रक्षा करे , क्योंकि उसकी नौकरी एडहॉक है ।

मेरी कहानी न किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बनर्जी , चटर्जी , मुखर्जी , बाली , कमाली , सिंह , शर्मा की है और न ही वहां की किसी अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी मिस मोनिका या मीनाक्षी की । यह कहानी एक विशुध्द क्लर्क की है , जो एक सरकारी दफ्तर में काम करती थी .

मैं जानता हूं कि पूरी कहानी सुनने के बाद आप यह कहेगें कि मेरी पात्रा विमला रस्तोगी ओैर प्रोफेसर के विरुध्द शिकायत दर्ज करवाने वाली उसकी अधीनस्थ अधिकारी अर्पिता वर्मा की कहानी में साम्यता है । आप यह भी कहेंगे कि विमला रस्तोगी को सताने वाला महानिदेशक वेणु कामथ और अर्पिता वर्मा से ' तुम्हारे पास बहुत कीमती.....' और 'सट जा या हट जा ' जैसे शब्द कहने वाले प्रोफेसर प्रद्योत सेन में कोई अंतर नहीं है . लेकिन दोनों में कुछ अंतर है ....... अर्पिता वर्मा की प्रताड़ना की कहानी एक पत्रकार को ज्ञात हुई , उसने उसे समझा और अपने राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित कर दिया . विश्वविद्यालय प्रशासन में कुछ सुगबुगाहट हुई . मेजें हिलीं , कुर्सियों में फुसफुसाहट हुई . वाइस चांसलर ने शिकायत न मिलने , कहीं डाक स्तर में पड़ी होने को लेकर मलाल व्यक्त किया . लेकिन बड़े विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का दिल बड़ा होता है . उन्होंने कहलवाया कि पीड़िता को शिकायत लिख भेजने के बजाय सीधे उनसे मिलकर पीड़ा व्यक्त करनी चाहिए थी . आखिर वह भी प्रोफेसर थे ...... अभी भी हैं . एक प्रोफेसर के विरुध्द एक अदने अधिकारी की शिकायत सुनना उनके कर्तव्य क्षेत्र में आता है . दण्ड-व्यवस्था बाद की बात है . शिकायत उन तक पहुंचनी चाहिए . पन्द्रह दिन बाद भी नहीं पहुंची तो शिकायतकर्ता को दुखी नहीं होना चाहिए . अर्जी कहीं अटक गई है . सभी पर काम का बोझ है . फाइलों के बोझ तले अर्पिता वर्मा की अर्जी कहीं दबी होगी . शिक्षा के मंदिर का छोटा-बड़ा हर पुजारी बहुत व्यस्त है . लेकिन अर्जी का दम घुटने न पाएगा . अंतिम सांस तक वह निकलेगी और उन तक पहंच ही जाएगी . लेकिन वह सहृदय हैं ..... दयालु हैं और अर्पिता वर्मा को उन्होंने स्वयं आकर मिलने का संदेश दिया . वह गई और शिकायत ले ली गई . कृपालु वी.सी. ने दम साधकर प्रोफेसर प्रद्योत सेन के विरुध्द शिकायत सुनी और अर्पिता वर्मा के अपने चैम्बर से बाहर निकलने के बाद पत्रकार को दिल खोलकर कोसा जो छोटे-बड़े मसलों को एक-सा मानकर मनमाने ढंग से रिपोर्ट छाप देते हैं .

लेकिन मित्र , विमला रस्तोगी किससे शिकायत करती ! तब तक यौन प्रताड़ना के विषय में कोर्ट का सख्त आदेश न था और होता भी तब भी सरकारी दफ्तर , जहां अफसरों की तानाशाही किसी राजशाही ढंग से कार्यरत है , विमला रस्तोगी को मीडिया तक जाने का साहस न दे पाता ।

हां , आप ठीक कह रहे हैं । विश्वविद्यालयों में भी प्रोफेसरो की तानाशाही सरकरी अफसरशाही से कम नहीं है . पी-एच.डी. से लेकर नियुक्तियों तक .....सर्वत्र अराजकता व्याप्त है . आपकी सलाह महत्वपूर्ण है कि देश के सभी केन्दीय विश्वविद्यालयों की नियुक्तियां यू.पी.एस.सी. द्वारा संयुक्त विज्ञापन के आधार पर की जाएं और प्राध्यापक से लेकर प्राफेसर तक के पद स्थानातंरणीय हों . शायद तब शिक्षा के मंदिरों में होने वाले भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लग सके . वर्ना प्रोफेसरों के कच्छे ढीले होने की कहानियों पर विराम संभव नहीं और न ही अपने चहेतों की नियुक्तियों पर रोक .

आपकी चिन्ता वाज़िब है । शिखर समितियां भी शिकायतों के बोझ से दबी हुई हैं . वर्षों पुरानी शिकायतों का निस्तारण वे नहीं कर पातीं . उनकी भी समस्याएं हैं . चार समितियां हैं और चारों के अधिकार क्षेत्र अलग हैं . चारों यही निर्णय नहीं कर पातीं कि कौन-सी शिकायत किसके अधिकार क्षेत्र की है ....हैं बेशक सभी यौन-प्रताड़ना से संबन्धित . किसी महिला प्राध्यापक को उसके सहयोगी ने प्रताड़ित करने का प्रयत्न किया तो किसी छात्रा को उसके प्रोफेसर ने . सभी शिकायतकर्ता अर्पिता वर्मा जैसी भाग्यशाली नहीं कि उन्हें वी.सी. बुला लेते या कोई पत्रकार तक उनकी पीड़ा पहुंच पाती . वी.सी. अति व्यस्त व्यक्ति ....देश-देशांतर के सेमीनारों आदि में उन्हें भाग लेना होता है . किस-किस की सुनें . अर्पिता वर्मा को सुन लिया यह क्या कम है !

आप ठीक कह रहे हैं । अर्पिता वर्मा जैसी लड़कियां उगंलियों में गिनने योग्य हैं . लेकिन हैं .... कम से कम शिक्षा के मंदिरों में ऐसी लड़कियां हैं . यदि न होतीं तो शिखर समितियों के पास शिकायतों का जो पुलिन्दा पड़ा है , वह न होता . आप यह भी कह सकते हैं कि यह पुलिन्दा पड़ा ही क्यों है ? भई , यह प्रश्न न्यायालय के संदर्भ में भी उठ सकता है . वहां न्याय पाने के लिए जिन्दगी ही गुजर जाती है . पहले ही कहा , इसका सीधा कारण काम के बोझ से है . शिखर समितियों के पास कितना काम है ..... इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते . लेकिन आप इस बात से दुखी क्यों हैं कि अपराधी उन्मुक्त घूमते हैं , दूसरों को प्रताड़ित करने की जुगत खेजते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यदि कभी कुछ कार्यवाई हुई भी उनके विरुध्द तो उन्हें मात्र चेतावनी दी जाती है , या तीन इन्क्रीमेण्ट रोक दिए जाते हैं या ......केवल एक ही मामला है इस विश्वविद्यालय के इतिहास में कि यौन-प्रताड़ना प्रकरण में एक प्रोफेसर साहब को नौकरी गंवानी पड़ी थी .

लेकिन विमला रस्तोगी एक सरकारी दफ्तर में नौकरी करती थी , जहां किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत करना अपराध था । उसकी सजा नौकरी से बर्खास्तगी या स्थानांतारण था . आप कहते हैं कि बर्खास्तगी विश्वविद्यालय में भी होती है . बताया न कि इस विश्वविद्यालय के इतिहास में केवल एक ही प्रोफेसर को नौकरी से हटाया गया . हां , नौकरी जाती है उन्हीं की जो अनुबन्ध पर या एडहॉक होते हैं . नियमित की बर्खास्तगी आसान नहीं . आपने ही बताया कि वहां ' यूनियन ताकतवर है '..... . आप सही कहते हैं . शिक्षकों की यूनियन ताकतवर है . उनकी मांगों के सामने सरकार तक घुटने टेक देती है . वह हड़ताल की धमकी देती है और सरकार दुम हिलाती नजर आती है . लेकिन मित्र , कर्मचारी यूनियन यदि ताकतवर होती तो स्थिति ही कुछ और होती . मुझे लगता है कि इस यूनियन में अवसरवादी बैठे हैं जो अपने निजी लाभ के लिए उच्चाधिकारियों के विरुद्ध आवाज उठाना पसंद नहीं करते . और यदि करते हैं तो केवल अपने हित साधन के लिए .

लेकिन मैं चाहता हूं कि अब आप चुप रहें . विमला रस्तोगी की चर्चा चलते ही यदि आप अर्पिता वर्मा या विश्वविद्यालय के प्रसंग छेड़ते रहे तो मैं विमला रस्तोगी की बात आप तक नहीं पहुंचा पाऊंगा , जिसे मैं ही पहुंचा सकता हूं क्योंकि मैं उसका सहयोगी जो था .
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विमला रस्तोगी ने बी।ए. किया ही था कि उसके पिता की मृत्यु हो गयी . उन दिनों कर्मचारी की मृत्यु पर परिवार के किसी सदस्य , पत्नी या बच्चे को , अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल जाती थी . विमला रस्तोगी पिता के स्थान पर क्लर्क बनकर महानिदेशालय कार्यालय में आयी . उन्हीं दिनों यू.डी.सी. के रूप में मैं भी उस कार्यालय में नियुक्त हुआ . विमला को मेरे ही अनुभाग में टाइपिगं के काम में लगाया गया . तीखे नाक-नक्श की सुन्दर लड़की थी वह , जिसके बाल कमर से नीचे तक लटकते रहते थे , जिनमें वह दो बेड़ियां गूंथतीं थी . और जब वह चलती तब दोनों चोटियां सर्पिणी की भांति नितम्बों पर हिलती-डुलती रहतीं थीं .

महानिदेशक कार्यालय का यह नियम था , हो सकता है उस विश्वविद्यालय में भी हो , कि जो भी नया व्यक्ति वहां नियुक्त होकर आता , दो-चार दिन में उसकी पेशी महानिदेशक वेणु कामथ के सामने अवश्य होती । मेरी भी हुई और मैंने पाया कि वेणु कामथ बहुत मधुर ओर सौम्य स्वभाव का व्यक्ति था . साक्षात्कार के दोरान मेरी टांगे और आवाज कांप रही थीं , क्योंकि अनुभाग वालों ने कहा था कि दबकर ही उत्तर दूं ..... साहब नाराज न हों , खयाल रखूं . इससे मैं भयभीत था . शायद कामथ ने यह समझ लिया था और साहस देते हुए कहा था कि ईमानदारी से अपना काम करूं और यदि कोई पेरेशानी अनुभव करूं तब पी.ए. के माध्यम से उनसे मिलकर बताऊं .

महानिदेशक के कमरे से बाहर आया तब मैं कुछ और ही था . भय जा चुका था , क्योंकि कामथ ने मुझसे प्रेम से बात की थी और जब विमला रस्तोगी की पेशी हुई , उसे मुझसे भी अधिक प्यार-दुलार से कामथ ने समझाया. विमला भी गदगद थी . वह मित-भाषी थी . अधिकतर अपनी ही सीट पर चिपकी रहने वाली . कभी बात भी करती तो मुझसे , क्योंकि मैंने उससे एक सप्ताह पहले ज्वाइन किया था .
महानिदेशक कार्यायल में उन दिनों दस और महिलाएं थीं । लंच के समय वे एक साथ लंच करतीं . उनके आग्रह पुनराग्रह से विमला उनके साथ लंच करने लगी थी . मेरे परिचितों का दायरा भी बढ़ने लगा था . मैं भी लंच में दो-चार बाबुओं के साथ घूमने जाने लगा . एक दिन एक सहयोगी बोला , ''छ: महीने बीतने को आए , कामथ ने विमला रस्तोगी को याद नहीं किया ?''

''क्यों ?'' मैंने पूछा ।

सहयोगी के चेहरे पर व्यंग्य मुस्कान थी , ''तुझे कुछ नहीं मालूम ?''

''क्या ऽऽऽ ?''

''शिकार ।''

''कैसा ?'' मैं चौंका था । सहयोगी , जो तीन थे , ठठाकर हंसे थे . हम आईसक्रीम वाले के पास थे . आईसक्रीम ली गई और बात आई गई हो गई थी .

और ठीक उसके अगले सप्ताह सुबह दस बजे प्रशासनिक अनुभाग पांच , जिसका काम अफसरों और उनके बीबी-बच्चों और बंगलों का खयाल रखना था , का अनुभाग अधिकारी विमला रस्तोगी के पास झुका हुआ कुछ फुसफुसा रहा था । विमला रस्तोगी एक सादा कागज और पेन लेकर उसके पीछे हो ली थी . अनुभाग के बाबुओं ने आंखों ही आंखों में एक-दूसरे से कुछ बातें की थीं . मेरा अनुभाग अधिकारी फाइल पर सिर झुकाए कोई नोट तैयार कर रहा था . उसका चेहरा लाल हो उठा था और उसका हाथ कांप रहा था . सच यह था कि अनुभाग के सभी बाबुओं के चेहरों पर तनाव था . उन्हें लग रहा था कि अनुभाग पांच का अनुभाग अधिकारी उनकी मांद में घुसकर बकरी उठा ले गया था और वे विवश थे कि अपना विरोध भी न जता सके थे . क्षणभर बाद ही सभी के सिर गर्दनों पर यों लटक गए थे मानों वे मुर्दा थे . मैं भौंचक एकाधिक बार उन्हें देख काम करने का प्रयत्न करने लगा था .

बीस मिनट भी न बीते थे कि विमला रस्तोगी दरवाजे पर प्रकट हुई । उसका चेहरा पीला और आंसुओं से भीगा हुआ था . सीट पर बैठते ही उसने टाइप राइटर पर सिर रख लिया और सुबक-सुबक कर रोने लगी . उसके आते ही मेरा अनुभाग अधिकारी फाइल दबा कमरे से बाहर निकल गया . अनुभाग के अन्य चारों बाबू क्रमश: एक-एक कर मुझसे यह कहकर चले गए कि वे चाय पीने जा रहे थे . मैं विमला रस्तोगी से कुछ पूछना चाहता था , लेकिन पूछ नहीं सका . भय , जुगुप्सा और आंशका के मिले-जुले भाव ने मुझे घेर लिया और मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा बैठा रहा .

लगभग एक घण्टा बीत गया । इस बीच अनुभाग अधिकारी फाइल दबाए दबे पांव कमरे में प्रकट हुआ . उसका चेहरा अभी भी लाल था . बिना बोले नयी फाइल पर सिर झुका वह कुछ पढ़ने लगा था . मैं समझ रहा था कि वह पढ़ नहीं रहा था केवल पढ़ने का बहाना कर रहा था . अनुभाग अधिकारी के बाद एक-एक कर चारों बाबू आ गए और अपनी सीटों पर सिर झुकाकर बैठ गए . विमला रस्तोगी अभी -भी टाइपराइटर पर सिर रखे थी . कमरे में मृत्यु -सा सन्नाटा व्याप्त था . सन्नाटा प्रशासनिक अनुभाग दो के अनुभाग अधिकारी के आने से टूटा . उसके हाथ में एक आदेश की तीन प्रतियां थीं . उसने दरवाजे से ही आवाज दी , ''विमला रस्तोगी ऽऽऽ!''

वह एक दक्षिण भारतीय था .....संभवत: तमिल । उसे हिन्दी नहीं आती थी . विमला ने सिर नहीं उठाया . अनुभाग अधिकारी की आवाज कुछ ऊंची और तीखी हो उठी , ''आपको दफ्तर का डिसिप्लिन नईं मालूम ?'' अंग्रेजी में वह बोला . विमला ने सिर उठाया . आंसुओं की लकीरें उसके मुर्झाए चेहरे पर स्पष्ट थीं . आंखें सूजी हुई थीं .

''ये आपका ट्रांसफर आर्डर है । रिसीव करें .....''

विमला का चेहरा फीका पड़ गया । वह शायद नहीं समझ पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए . तभी सामने खड़ा व्यक्ति तमिल लहजे में अंग्रेजी में चीखा , '' जल्दी कीजिए और इसे लेकर तुरंत दफ्तर से चली जाइए . डी.जी. साहब का आदेश है . शुक्र है नौकरी नई गई . अभी प्रोबेशन पर है ..... और नखरे तो देखो.....''

वह क्षणभर के लिए रुका , ''दस दिन का ज्वाइनिगं टाइम दिया है । आपको चेन्नई के निदेशक कार्यालय में रिपोर्ट करना मांगता . ओ.के......ऽऽ ''

विमला ने कांपते हाथों ट्रांसफर आर्डर ले लिया । प्रशासन दो का अनुभाग अधिकारी मेरे अनुभाग अधिकारी से उसी कड़क स्वर में बोला , ''मिस्टर सिंह , एक कॉपी आपके लिए .....'' और रिसीव करने के लिए उसने तीसरी प्रति सिंह के आगे बढ़ा दी .

विमला रस्तोगी झटके से उठी । रूमाल से चेहरा पोछा . एक दृष्टि सब पर डाली . मुझे लगा शायद उस समय वह कहना चाह रही थी , ''तुम सब कापुरुष हो ....सब ........'' संभव है वह कुछ और ही कहना चाह रही हो . यह भी संभव है कुछ कहना ही न चाहती हो . बहरहाल , वह पर्स झुलाती कमरे से बाहर निकल गई थी किसी से कुछ कहे बिना . उस समय उसकी चाल में शिथिलता न थी ..... समर्पण के बजाए उसने सजा स्वीकार कर ली थी .

विमला रस्तोगी पर अपने दो छोटे भाइयों और मां का बोझ था , लेकिन वह चेन्नई नहीं गयी थी . पता चला उसने त्याग पत्र दे दिया था .
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आपकी बात सही है कि अर्पिता वर्मा प्रकरण ने आज मुझे सहसा विमला रस्तोगी की याद दिला दी . लेकिन मित्र , इस देश में हजारों -हजारों अर्पिता वर्मा और विमला रस्तोगी हैं , जिन पर न किसी पत्रकार की दृष्टि पड़ी न किसी लेखक की और दरिन्दों का खेल बदस्तूर जारी है .
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कहानी-२७



पर्यावरण के संबन्ध में उसे इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में वक्तव्य देना था। हारवर्ड विश्वविद्यालय से 'पर्यावरण प्रबन्धन ' की उपाधि लेकर जब एक साल पहले वह स्वदेश लौटा, सरकार के पर्यावरण विभाग ने उसकी सेवाएँ लेने के लिए कई प्रस्ताव भेजे। लेकिन स्वयं कुछ करने के उद्देश्य से उसने सरकारी प्रस्तावों पर उदासीनता दिखाई। वह जानता है कि ऐसी किसी संस्था से बँधने से उसकी स्वतंत्रोन्मुख सोच और विकास बाधित होंगे। वह स्वयं को अपने देश तक ही सीमित नहीं रखना चाहता, बावजूद इसके कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ देश के लिए देना चाहता है।
पर्किंग से गाड़ी निकालते समय पिता ने पूछा, ''अमि, (उसका पूरा नाम अमित है ) कब तक लौट आओगे?''''दो घण्टे का सेमीनार है बाबू जी।.... नौ तो बज ही जाएँगे।'' पिता चुप रहे, लेकिन वह सोचे बिना नहीं रह सका, 'अवश्य कोई बात है, वर्ना बाबू जी उसके आने के विषय में कभी नहीं पूछते।' गेट से पहले गाड़ी रोक वह उतरा और 'कोई खास बात बाबू जी?'' पूछा।''हाँ....आं.....'' बाबू जी मंद स्वर में बोले, ''मेरा मित्र अमृत है न!..... उसकी बेटी की शादी है।...रोहिणी में....''''सेमीनार खत्म होते ही निकल आऊँगा।''
''तुम परेशान मत होना। मैं ऑटो ले लूँगा।....'' बाबू जी ने सकुचाते हुए कहा।
''कार्यक्रम आठ बजे समाप्त हो जाएगा। लोगों से बिना मिले निकल आऊँगा..... यहाँ पहुँचने में एक घण्टा तो लग ही जाएगा, लेकिन आप ऑटो के चक्कर में नहीं पड़ेंगे.....मैं आ जाऊँगा।'' उसने पिता को बॉय किया और गाड़ी स्टार्ट कर सड़क पर उतर गया।
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अमित जब हारवर्ड पढ़ने गया था, माँ जीवित थीं। पिता रेल मंत्रालय से निदेशक पद से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। माँ-बाप का वह इकलौता बेटा था। उन लोगों ने कभी अपनी इच्छाएँ उस पर नहीं थोंपीं, लेकिन उसने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। हारवर्ड जाने के एक वर्ष बाद ही माँ का निधन हो गया। पिता अकेले रह गये। पटेल नगर के तीन सौ वर्ग गज के उस मकान में नितांत एकाकी। उसने वापस लौटने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन पता ने पहली बार उसे सख्त आदेश सुनाया, ''मेरे लिए लौटने की बात तुम्हारे दिमाग में आयी कैसे अमि.... अपनी शिक्षा पूरी करो।... '' कुछ देर तक चुप रहे थे बाबू जी और वह सिर झुकाए उनके सामने बैठा रहा था। तब वह माँ के दसवें पर आया था।
''तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना चाहिए।....अलग बनना चाहिए। मेरे लिए अगले दस वर्षों तक तुम्हें सोचने की आवश्यकता नहीं है। नौकरी से अवकाश ग्रहण किया है।... शरीर और मन से नहीं। वंदना।...तुम्हारी माँ थी तो अधिक बल था, लेकिन।...'' पिता फिर चुप हो गए थे। अतीत में खो गए थे वह। कुछ देर की चुप्पी के बाद वह धीमे स्वर में फिर बोले, ''तुम्हें कुछ ऐसा करना है, जिससे देश-समाज....देशान्तर को लााभ पहुँचे।....नौकरी सभी कर लेते हैं, लेकिन दुनिया उससे आगे भी है.....''
अमित चुपचाप पिता की ओर देखता रहा था।
पढ़ाई समाप्त कर लौटने के बाद पिता ने केवल एक बार पूछा, ''क्या करना चाहते हो?''
''फिलहाल नौकरी नहीं।...अपना कुछ करने के विषय में सोच रहा हूँ।''
''अपना।....?''
''पर्यावरण सम्बन्धी एक संस्था स्थापित करना चाहता हूँ.......''
''हुँह ।'' कुछ देर की चुप्पी के बाद।....कुछ सोचते हुए पिता बोले, ''अच्छा विचार है।''
संस्था को लेकर उसने देश के पर्यावरणविदों से सलाह करना प्रारंभ कर दिया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने पहले उसे अपने सेमीनारों में श्रोता के रूप में, फिर वक्ता के रूप में बुलाना प्रारंभ कर दिया था ।
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सेमीनार खत्म होते ही वह निकलने लगा। चाहता था कि कोई उसे देखे, टोके-रोके, उससे पहले ही वह गाड़ी में जा बैठे, लेकिन वैसा हुआ नहीं। वह हाल से बाहर निकला ही था कि सामने दिल्ली के प्रसिध्द पर्यावरणविद डॉ. मुरलीधरन टकरा गए।
''क्या खूब बोलते हो नौजवान!'' पकी दाढ़ी और सफेद बोलों में स्पष्ट वैज्ञाानिक दिखनेवाले मुरलीधरन बोले, डॉ. सुनीता नारायण को तुम जैसे युवकों से परामर्श लेना चाहिए। ''
''सर, वह बहुत विद्वान हैं।.... विश्व में उनकी पहचान है। मैं तो अभी।...''
''यही न कि अभी कम उम्र - कम अनुभवी हो!'' ठठाकर हंसे मुरीधरन तो वह संकुचित हो उठा।
दोनों देर तक चुप रहे। अंतत: कुछ सोचकर, शायद यह भांपकर कि उसे चलने की जल्दी है, मुरलीधरन बोले, ''ओ। के। यंगमैन, हम फिर मिलेंगें। ''
''जी सर।'' वह गाड़ी की ओर बढ़ा यह सोचते हुए कि अनुभवी लोग चेहरे से ही अनुमान लगा लेते हैं कि कोई क्या सोच रहा है।'
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वह सामान्य गति से गाड़ी चला रहा था। कभी तेज गाड़ी चलाता भी नहीं वह। दिल्ली की सड़कें और ट्रैफिक की अराजकता।.... वह पैंतालीस-पचास तो कहीं -कहीं बीस-तीस की गति से चला रहा था। तालकटोरा स्टेडियम के पास गोल चक्कर पर टै्रफिक कुछ अधिक था। उसकी गाड़ी रेंग-सी रही थी। तभी उसके बगल में हट्टा -कट्टा लगभग बत्तीस वर्ष के युवक ने अपनी पल्सर रोकी और चीखता हुआ बोला, ''गाड़ी चलानी नहीं आती? गाड़ी (मोटरसाइकिल) को टक्कर मार देता अभी।''
वह भौंचक था, क्योंकि उसकी जानकारी में कुछ हुआ ही नहीं था। उसने धीमे और सधे स्वर में, जैसा कि उसका स्वभाव था, कहा, ''टक्कर लगी तो नहीं! ''
वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही मोटर साइकिल सवार ने मोटर साइकिल आगे बढाकर उसकी कार के आगे लगा दी। वह गोल चक्कर पारकर शंकर रोड चौराहे की ओर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था। उसने गाड़ी रोक दी। मोटरसाइकिल सवार युवक उसकी ओर झपटा। वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने उसे गाड़ी से बाहर खींचा और फुटपाथ की ओर घसीटने लगा।
''बात क्या है।... आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?'' विरोध करता हुआ वह उसकी मजबूत पकड़ के समक्ष अपने को असहाय पा रहा था।
''तेरी माँ की।....बताता हूँ कि बात क्या है।....मादर।...के कहता है कि लगी तो नहीं।...'' युवक का झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। वह लड़खड़ा गया। उसे चक्कर -सा आ गया। जब तक वह संभलता मोटर साइकिल सवार का दूसरा तमाचा उसके दूसरे गाल पर पड़ा।
पैदल चलने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गयी। लेकिन कोई भी वाहन वाला नहीं रुका। भीड़ मूक दर्शक थी और मोटर साइकिल सवार युवक दरिन्दे की भांति उस पर लात-घूँसे बरसा रहा था। लगभग अधमरा कर उसने उसे छोड़ दिया और फुटपाथ से नीचे उतरकर घूरकर उसे देखने लगा। अमित फुटपाथ पर पसरा हुआ था।... निस्पंद। भीड़ में कुछ लोग अपनी राह चल पड़े थे। कुछ खड़े थे।..... लेकिन उनमें अभी भी साहस नहीं था कि वे अमित को उठा सकते, क्योंकि मोटर साइकिल सवार वहीं खड़ा था अमित को घूरता हुआ।
लगभग दस मिनट बाद उसने आँखें खोलीं और किसी प्रकार उठकर बैठा। बैठते ही उसका हाथ मोबाइल पर गया। उसका दिमाग, जो सुन्न था, अब काम करने लगा था। पिता को यह बताने के लिए कि पहुँचने में उसे कुछ देर हो जाएगी, वह उनका नम्बर मिलाने लगा। उसे नम्बर मिलाता देख मोटर साइकिल सवार झपटकर फुटपाथ पर चढ़ा और उससे मोबाइल छीनते हुए उसके जबड़े पर मारकर चीखा, ''धी के..... पुलिस को फोन करता है।....स्साले इतने से ही सबक ले।... शुक्र मना कि बच गया।...'' उसने अमित का फोन अपनी जेब के हवाले किया, मोटर साइकिल स्टार्ट की और अमित के इर्द-गिर्द खड़े लोगों को हिकारत से देखता हुआ तेज गति से शंकर रोड चौराहे की ओर मोटर साइकिल दौड़ा ले गया।
अमित फिर फुटपाथ पर लेट गया। भीड़ फुसफुसा रही थी ''अस्पताल ले जाना चाहिए....'' ''कैसा दरिन्दा था! रुई की तरह धुन डाला.....''''पुलिस को फोन करना चाहिए।''''पुलिस के लफड़े में पड़ना ठीक नहीं।''''वह कोई गुण्डा था!''''दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।....''''दिल्ली गुण्डों।.......बाइकर्स के आंतक में जी रही है और पुलिस असहाय है।''''भाई पुलिस वालों के वे साले जो लगते हैं।...हफ्ता पुजाते हैं। असहाय-वसहाय कुछ नहीं है..... जिसने हफ्ता नहीं दिया..... हवालात उसके लिए है।'' एक दूसरी आवाज थी।''राम सेवक....तुम्हें गाड़ी चलानी आती है न! '' किसी ने अपने साथी से पूछा।''आती है।''''फिर हम दोनों इन्हें राममनोहर लोहिया अस्पताल ले चलते हैं।...इन्हीं की गाड़ी में।...''अमित सभी को सुन रहा था। उसने आंखें खोलीं। दो लोग उसके ऊपर झुके हुए थे। दूसरे कुछ हटकर खड़े थे।''बाबू।...हम आपको अस्पताल पहुँचा देते हैं।''अमित चुप रहा।
''हाँ, आपकी ही गाड़ी से।....''''धन्यवाद।'' अमित फुसफुसाकर बोला, ''आप लोग कष्ट न करें।...मैं ठीक हूँ।''
रामसेवक और उसका साथी एक-दूसरे के चेहरे देखते कुछ देर खड़े रहे, फिर बिड़ला मंदिर की ओर मुड़कर चले गए। दूसरे ने पहले ही जाना प्रारंभ कर दिया था।
लगभग पन्द्रह मिनट बाद अमित ने साहस बटोरा और उठ बैठा। सिर अभी भी चकरा रहा था। उसे चिन्ता हो रही थी उसकी प्रतीक्षा करते बाबू जी की। वह अपने को रोक नहीं पाया। आहिस्ता से फुटपाथ से नीचे उतरा, गाड़ी में बैठा और चल पड़ा। एक्सीलेटर, ब्रेक और क्लच पर पैर ढंग से नहीं पड़ रहे थे। फिर भी वह धीमी गति से गाड़ी चलाता रहा।
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राजेन्द्र नगर की रेड लाइट तक पहुँचने में उसे काफी समय लगा। चौराहा पार कर वह किसी पी.सी.ओ. से पिता को फोन करना चाहता था। लेकिन जैसे ही वह रेड लाइट के निकट पहुँचा, वहाँ का दृश्य देख उसे चक्कर-सा आता अनुभव हुआ। रेड लाइट से कुछ पहले बाईं ओर एक मोटर साइकिल पड़ी हुई थी और उससे कुछ दूर एक युवक के इर्द-गिर्द खड़े कई लोग पुलिस को कोस रहे थे।
उसने सड़क किनारे गाड़ी खड़ी की।.... उतरा। कुछ देर पहले अपने साथ हुआ हादसा उसके दिमाग में ताजा हो उठा, ' तो यह उस युवक का नया शिकार था।' उसने सोचा और धीमी गति से आगे बढ़ा। चोट के कारण वह तेज नहीं चल पा रहा था।
''टक्कर इतनी जबरदस्त थी।..... शुक्र है कि गाड़ी इसके ऊपर से नहीं गुजरी।'' भीड़ में कोई कह रहा था।
''किस गाड़ी ने टक्कर मारी?'' कोई पूछ रहा था।
'' ब्लू लाइन बस थी ।....मैंने देखा।....मैं उस समय उधर पेशाब कर रहा था '' कहने वाले ने हाथ उठाकर पेशाब करने की जगह की ओर इशारा किया। ''तेज आवाज हुई तो मैंने मुड़कर देखा।'' बोलने वाला क्षणभर के लिए रुका, ''बस ने टक्कर नहीं मारी भाई जान! मोटरसाइकिल इतनी तेज थी।....इतनी।... रहा होगा ये सौ से ऊपर की स्पीड में।...यही टकराया बस से और मोटर साइकिल इधर और यह उधर।...बच गया। लेकिन चोट बहुत है।''
अमित आगे बढ़ा।
''कितनी देर हुई? '' उसने एक व्यक्ति से पूछा।''यही कोई आध घण्टा।...''''आध घण्टा।...और आप लोग खड़े इसे देख रहे हैं? पुलिस को किसी ने सूचित किया?'' वह यह कह तो गया लेकिन तत्काल सोचा कि अपरिचित राहगीरों से उसे इसप्रकार नहीं बोलना चाहिए था।
अमित के प्रश्न पर मौन छा गया था। कुछ देर बाद किसी की बुदबुदाहट सुनाई दी, ''पी.सी.आर. वैन यहीं खड़ी रहती है।... आज नदारत है।''''पुलिस को फोन करके कौन मुसीबत मोल ले।'' भीड़ में कोई और बुदबुदाया।
अमित चुप रहा। वह घायल युवक के पास पहुँचा और उसे देख भोंचक रह गया। वह वही युवक था जिसने कुछ देर पहले अकारण ही बुरी तरह उसे पीटा था।
' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँ? ' अमित के मन में विचार कौंधा।'कदापि नहीं।' लेकिन तभी अंदर से एक आवाज आयी, ' अमित, तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना है।....अलग बनना है,' यह पिता की आवाज थी।' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँगा।...राम मनोहर लोहिया अस्पताल पास में है।' उसने निर्णय कर लिया और वहाँ एकत्रित लोगों से बोला, ''आप लोग इतनी सहायता करें कि इसे उठाकर मेरी गाड़ी में पीछे की सीट पर लेटा दें। इसे अस्पताल ले जाऊँगा।''''मैं भी आपके साथ चलता हूँ।'' एक व्यक्ति बोला।''आप परेशान न हों।...केवल गाड़ी में इसे लेटा दें....बस।....''
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अस्पताल में जिस समय एमरजेंसी के सामने उसने गाड़ी रोकी मोटर साइकिल सवार को होश आ गया। उसे देख कराहते हुए वह चीखा, ''तुम.....तुम....sss '' और वह फिर बेहोश हो गया था।

Wednesday, October 21, 2009

कहानी - २६



खण्डित स्वप्न

रूपसिंह चन्देल

कॉलेज में आज भी मीटिंग देर से समाप्त हुई . जब वे घर पहुंची , साढ़े जीन बज रहे थे . दरवाजा खोलते ही नौकरानी पूछ बैठी , ‘‘बीबीजी , आज फिर देर कर दी .....’’ लेकिन उसकी बात का उत्तर दिए बिना उससे जल्दी खाना लगा देने के लिए कहकर बिना कपड़े बदले ही वह बाथरूम चली गयीं और जब बाहर निकलीं , उनके चेहरे से दिन भर की थकान के चिन्ह मिट चुके थे .
पेट में चूहों को धमाचैकड़ी करते दो घंटे से अधिक हो चुके थे . वे सीधे डाइनिंग रूम में जा पहुंचीं . रोजाना की भांति रामकली ने टेबुल पर खाना सजा दिया था .वे खाना शुरू ही करने वाली थीं कि रामकली ने उन्हें एक लिफाफा पकड़ा दिया . बोली , ‘‘मुआ डाकिया लिफाफा दे ही नहीं रहा था . कहता था मेम सा‘ब के नाम है , मैं उन्हीं को दूंगा . बड़ी मुश्किल से माना .’’ कहकर वह उनकी प्रतिक्रया जानने के लिए उनकी ओर देखने लगी . लेकिन दीपाली ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की . वे उलट-पलटकर लिफाफे को देखती रहीं .
आखिर उन्होंने लिफाफा खोल डाला . उसमें जो कुछ था , उसे देख उनका मन उद्वेलित हो उठा , मानो सरोवर के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया गया हो .उन्होंने कागजों को मेज पर रख दिया और रामकली को वहां से जाने के लिए कहा . उसके जाने के बाद सिर को कुर्सी से टिकाकर वे सोचने लगीं , ‘तो विजय के साथ संबन्धों की यही अंतिम परिणति होनी थी .... इतने दिनों में ही सब कुछ बेमानी हो गया --- प्रेम...रिश्ते....इंसानियत....’ और वे धीरे-धीरे अतीत की अंधेरी गुफाओं में धंसती चलीं गयीं .
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उन दिनों वे एम. ए. फाइनल में थीं . प्रतिवर्ष की भांति उस वर्ष भी कॉलेज के वार्षिकोत्सव के अवसर पर छात्र संघ की ओर से एक नाटक मंचित होना था . नाटक था ‘आभिज्ञान शाकुन्तल’ . छात्रसंघ के सामने एक गंभीर संमस्या पैदा हो गयी -- शकुन्तला की भूमिका को लेकर . कॉलेज की कोई भी छात्रा उस भूमिका के लिए तैयार न थी . वार्षिकोत्सव के दिन निकट आते जा रहे थे , रिहर्सल शुरू हो चुकी थी , लेकिन शकुन्तला का स्थान रिक्त था . तभी एक दिन छात्र संघ के अध्यक्ष महेन्द्र के साथ विजय उनके पास आए . काफी देर तक वे शकुन्ला के अभिनय के लिए उन्हें समझाते रहे . उन्होंने दूसरे दिन अपना निर्णय बताने के लिए कहकर उन्हें टाल दिया था .
लेकिन कॉलेज से घर वापस जाते समय पूरे रास्ते वे सोचती रही कि वे शकुन्तला का अभिनय कर सकती हैं या नहीं .... और घर तक पहुंचते-चहुंचते इस निर्णय पर पहुंची कि वे यह अभिनय कर सकेंगी . और दूसरे दिन महेन्द्र और विजय को उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी थी .
वार्षिकोत्सव के दिन नाटक मंचित हुआ . दुष्यन्त का अभिनय विजय कर रहे थे . नाटक बहुत सफल रहा था . नगर में दोनों के अभिनय की चर्चा थी . समाचारपत्रों ने विशेष प्रशंसात्मक टिप्पणियों के साथ उन दोनों के चित्र प्रकाशित किये थे . नाटक की सफलता के बाद वे और विजय अनायास ही एक-दूसरे के निकट आ गये थे . विजय उनके सहपाठी थे और उसके बाद प्रायः ही उनके घर आने लगे थे . धीरे-धीरे वे महसूस करने लगी थीं कि वे वास्तव में ही शकुन्तला हैं और विजय दुष्यन्त .एक दिन वे फूलबाग में टहल रहे थे . टहलते हुए अचानक विजय रुक गये और दोनों कन्धों के पास उन्हें पकड़कर बोले , ‘‘दीपा , मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रहा था . ’’
‘‘कहो .’’ उन्होंने जिज्ञासा-भरी नजरें विजय के चेहरे पर गड़ा दी थीं .
‘‘यह , मैं नहीं जानता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो , लेकिन सच मानों तुम्हें लेकर मैं तमाम स्वप्न ....’’ आगे वह कुछ बोल न पाये थे .
वे भी उस क्षण भावुक हो उठी थीं . बिना बोले ही विजय की आंखों में कितनी ही देर तक देखती रही थीं और उन्होंने उन आंखों में साकार होने के लिए मचलते हजारों स्वप्न देखे थे .
क्षणभर बाद उन्हें झकझोरते हुए विजय ने पूछा था , ‘‘पागलों की तरह क्या देख रही हो , दीपा ?’’
‘‘कुछ नहीं .... अच्छा , अब चला जाये . बहुत देर हो गयी ..’’
और दोनों चल पड़े थे .
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उस दिन के बाद विजय का अधिकांश समय उनके साथ ही बीतने लगा था . विजय के प्रस्ताव पर उन्होंने ‘कम्बाइंड स्टडी’ शुरू कर दी थी . कॉलेज से वह सीधे उनके घर आ जाते और रात देर तक पढ़ने के पश्चात घर जाते . समय तेजी से खिसकात रहा और परीक्षा सिर पर आ गयी . और एक दिन वह भी सम्पन्न हो गयी . परीक्षा के अंतिम दिन घर लौटते हुए विजय उन्हें एक रेस्टारेण्ट में ले गये . कॉफी पीते हुए उन्होंने सीधे शादी का प्रस्ताव रख दिया . वे उस समय फिर क्षणभर के लिए कहीं खो-सी गयी थीं . कप में पड़ी कॉफी ठंडी हो गयी . विजय भी कॉफी पीना भूलकर निर्निमेष उनके चेहरे पर आ-जा रहे भावों को देखते रहे थे . जब बेयरे ने आकर पूछा , ‘‘साब , और कुछ चाहिए ? ’’ तब दोनों की तन्द्रा दूर हुई थी .
‘‘अरे , कॉफी तो ठंडी हो गयी . तुमने पी क्यों नहीं ?’’‘‘‘आपने भी तो नहीं पी ....’’
‘‘अरे हां ....’’ फिर बेयरे को दो और कॉफी का आर्डर देकर विजय बोले , ‘‘दीपा , तुमने कोई उत्तर नहीं दिया .’’
‘‘कया उत्तर देना इतना आसान है ?’’
‘‘यह सब कुछ तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है . यदि तुम चाहोगी ....’’
‘‘लेकिन विजय , क्या हमारे मां-बाप इतनी आसानी से तैयार हो जायेंगे ?’’
‘‘मैं तुम्हारे ममी-पापा के विषय में नहीं बता सकता , लेकिन मेरे ममी-पापा को कोई आपत्ति न होगी .’’
वे कुछ सोचती रह गयी थीं . तभी बेयरा आ गया था . थोड़ी देर के लिए उत्तर देने से वे बच गयी थीं . लेकिन बिल चुकता करने के बाद जब दोनों रिक्शा पर सवार हुए विजय ने पुनः पूछ लिया , ‘‘क्या सोचा तुमने , दीपा ?’’
‘‘कुछ दिन सोचने दो .’’
‘‘ठीक है .’’
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लेकिन विजय के प्रस्ताव को वे अधिक दिनों तक टाल न सकीं थीं . विजय के असीम प्यार प्रदर्शान ने उन्हें स्वीकृति के लिए विवश कर दिया था . विजय को पा जाने की लालसा उनके अन्दर तीव्रतर हो उठी थी . उन्होंने अपना निर्णय ममी-पापा को बता दिया . लेकिन जैसी कि आशा थी , वही हुआ . विजय के साथ विवाह करना उन लोगों को स्वीकार न था . दो पीढि़यों के मध्य विचारों की टकराहट शुरू हो गयी थी . जैसे-जैसे ममी-पापा उनकी गतिविधियों को प्रतिबन्धित करते जा रहे थे , उनके मन में विजय के साथ विवाह करने का निश्चय दृढ़ होता जा रहा था .
और एक दिन लावा फूट ही पड़ा था . पापा का रुद्र रूप उन्होंने उस दिन पहली बार देखा था . उलटा-सीधा कहने के बाद उस दिन अंत में वे बोले थे , ‘‘दीपू , अगर तूने उसके साथ शादी की तो इस घर के दरवाजे तेरे लिए सदैव के लिए बन्द हो जायेंगे .’’ हथियार तो उन्होंने डाल दिए थे , किन्तु रूढि़वादी ऐंठ उनमें तब भी शेष थी .
जिस दिन परीक्षाफल घोषित हुआ , विजय दौड़ते हुए उन्हें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की बधाई देने आए थे . लेकिन उस समय पापा ने विजय का जो अपमान किया , उससे वे बौखला उठी थीं , किन्तु किसी प्रकार अपने को संयत किये रही थीं . उस क्षण उन्होंने उस घर को शिघ्र ही छोड़ देने का निर्णय किया था और उसके ठीक बीसवें दिन उन्होंने विजय के साथ ‘कोर्ट मैरिज’ कर ली थी .
विजय उन दिनों समाचारपत्रों में रिक्त स्थान देखने लगे थे . कई जगह आवेदन भी किया लेकिन कहीं से काई उत्तर नहीं आया . वे स्वयं पी-एच.डी. करने के विषय में सोचने लगी थीं . एक दिन जब परिवार के सब लोग शाम की चाय ले रहे थे , उन्होंने दबी जुबान अपनी इच्छा जाहिर की . उनकी बात सुनते ही विजय के ममी-पापा एक साथ बोल उठे थे , ‘‘बहू , हमारी सामर्थ्य न तो अब विजय को आगे पढ़ाने की है और न ही तुम्हे .’’
पापा तो इतना ही कहकर चुप हो गये थे , किन्तु ममी आगे बोली थीं , ‘‘हां , अगर तुम्हारे पापा चाहें तो तुम्हें पढ़ा सकते हैं . उनके पास धन की कोई कमी भी तो नहीं .....’’
‘‘लेकिन ममी , अब उनसे कुछ भी अपेक्षा करना क्या उचित है ?’’
‘‘क्या बात कह रही हो , बहू ? मां -बाप आखिर मां-बाप ही होते हैं . थोड़े दिनों बाद बच्चों को माफ कर देते हैं . उन्हें कितनी सरलता से मेरा हीरा जैसा बेटा दामाद के रूप में मिल गया है .वह भी बिना दहेज . सोच बहू , अगर वे तुम्हारी शादी कहीं और करते तो .... खैर , तू तो खुद ही समझदार है , पढ़ी-लिखी है .’’
‘‘छोडिए भी ममी इन बातों को , ’’ कहकर विजय उठकर वहां से चले गये थे . वे भी रुक न पायी थीं . कमरे में जाकर बेड पर ढह गयी थीं . रात विजय की आहट पाकर उनकी नींद खुली थी . लेकिन उनसे बिना कोई बात किए बत्ती बुझाकर वह भी लेट गये थे .
उस दिन के बाद उस घर का वातावरण तनावपूर्ण हो उठा था . विजय के अतिरिक्त सभी उनसे कम बातें करने लगे थे और विजय को भी उनसे बात करने का वक्त कहां मिलता था . वह सुबह के निकले शाम को घर में प्रवेश करते थे . घर में सबके होते हुए एकाकीपन उन्हें डसता रहता था . शादी के बाद पूरे आठ महीने हो चुके थे विजय को भटकते हुए , लेकिन कहीं भी नौकरी नहीं मिली थी . एक सुबह अखबार में रिक्त स्थान देखते हुए वह उछल पड़े थे . डी.ए.वी. में लेक्चरर की पोस्ट निकली थी . उनके कन्धे झकझोरते हुए वह बोले थे , ‘‘दीपा , तुम आवेदन कर दो . तुम्हें यह पोस्ट मिल सकती है .’’
घर के वातावरण ने उन्हें उबा दिया था . विजय की ममी का व्यवहार उनके प्रति दिन-प्रतिदिन अत्यधिक रूखा और कड़वा होता जा रहा था . छोटी-छोटी’-सी बात में वह उन्हें प्रताडि़त करने लगती थीं . उन दिनों वास्तव में वे भयंकर मानसिक तनाव में जी रही थीं . यह उनके लिए एक सुखद अवसर था . उन्होंने आवेदन किया और साक्षात्कार में बिना किसी सिफारिश के चुन ली गयीं . लेकिन उनका नौकरी करना भी विजय के ममी-पापा को पसन्द नहीं आया . एक दिन उनके कॉलेज से लौटते ही उन लोगों ने स्पष्ट घोषणा की थी , ‘‘नौकरीपेशा बहू के लिए इस घर में कोई जगह नहीं है . यदि नौकरी करनी है तो जाकर रहो अपने पिता के घर .’’
एक ओर था भविष्य और दूसरी ओर था वर्तमान का कलहपूर्ण जीवन . उन्होंने विजय से बात की . लेकिन विजय ने कोई उत्तर नहीं दिया . आखिर कई दिनों की कलह के बाद उन्होंने विजय से स्पष्ट कह दिया , ‘‘अब वे उस घर में नहीं रह सकतीं . अलग मकान की व्यवस्था करेंगी .’’ विजय फिर भी चुप रहे थे .
लेकिन वे निर्णय कर चुकी थीं अलग रहने का . आखिर विजय को झुकना पड़ा . ब्रम्हनगर में दो कमरों की जगह किराये पर लेकर उस घर को भी उन्होंने एक दिन छोड़ दिया . किराये के मकान में आने के बाद उन्होंने विजय को आई. ए.एस. में बैठने के लिए प्रोत्साहित किया . उनकी सलाह विजय को पसन्द आयी और वह आई.ए.एस. की तैयारी में जुट गये . उस मकान में आने के चार महीने पश्चात विजय और उनके प्रेम का प्रतीक विभु पैदा हुआ . उन दिनों विजय आई.ए.एस. की परीक्षा देने गये हुए थे . कितनी परेशानियां उठानी पड़ी थीं उन्हें . दोनो घरों के दरवाजे उनके लिए बन्द थे . असहाय-सी उन्होंने पड़सी की कुण्डी खटखटाई थी . उस दिन उन्हें पहली बार एहसास हुआ था कि कभी-कभी गैर अपनों से अच्छे होते हैं .
पड़ोसी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया था जहां रातभर उसकी पत्नी उनके साथ रही थी . पैदा होने के बाद विभु पर प्रथम दृष्टि पड़ते ही चीखकर उन्होंने आंखें बन्द कर ली थीं और नर्स से बोली थीं ‘‘सिस्टर , इस मांस के लोथड़े को ले जाइये . यह मेरा बच्चा नहीं है .... नहीं ...’’ और वे बेहोश हो गयी थीं .
लेकिन होश आने पर नर्स और पड़ोसिन के समझाने के बाद विभु को गोद में लेकर न जाने कितनी देर उसे देखती रही थीं . विभु का नीचे का भाग अपंग था . उसे अपनी छाती से लगाकर वे फूट-फूटकर रोती रही थीं .
दूसरे दिन विजय लौट आए थे . सीधे अस्पताल पहुंचकर उन्होंने पहले विभु को देखना चाहा था , लेकिन , उन्होंने केवल ऊपर का भाग ही उन्हें दिखया था . काफी देर तक बातें करने के बाद जब विजय उनके लिए फल और दूध लेने के लिए चलने लगे , उसी समय नर्स आ गयी और विभु की सफाई करने के लिए जैसे ही उसने ऊपर से कपड़े हटाए , विजय की दृष्टि विभु के पर पड़ी थी . विजय के मुंह से भी एकदम चीख निकल गयी थी , ‘‘दीपा , यह क्या है ?’’
‘‘तुम्हारे घर में मुझे मिली मानसिक यन्त्रणा का परिणाम ....’’ वे फूट-फूटकर रोने लगी थीं . नर्स ने विभु को संभालने के लिए उन्हें डपट दिया था और आंसू पोंछकर वे उसे गोद में उठाने लगी थीं . विजय कब चले गये , उन्हें पता नहीं चला था .
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विजय आई.ए.एस. में सिलेक्ट हो गये थे . प्रशिक्षण के लिए उन्हें मसूरी जाना था . जाने से एक दिन पहले बोले , ‘‘दीपा , तुम अकेले विभु और नौकरी दोनों कैसे संभाल पाओगी ?’’
‘‘मैं कल एक आया के लिए बात कर आयी हूं . वह दिनभर विभु की देखभाल किया करेगी . तुम चिन्ता न करों . थोड़े दिनों की बात है . जब तुम्हारी कहीं पोस्टिंग हो जायेगी तब मैं नौकरी छोड़ दूंगी .’’
विजय कुछ सोचने लगे थे .
‘‘तब तक विभु भी कुछ बड़ा हो जायेगा . तब हम दिल्ली या कहीं और इसका इलाज करवायेंगे . इसके इलाज के लिए भी तो पैसों की जरूरत होगी . विभु ठीक हो जाएगा .... ठीक हो जाएगा न , विजय . ’’ विजय की छाती से लगकर उन्होंने पूछा था .
‘‘क्यों नहीं ठीक होगा . इससे अधिक खराब केसेज ठीक हो जाते हैं .’’
‘‘विजय , उस दिन की कल्पना करो जब तुम किसी दफ्तर के इन्चार्ज होगे , हम सब एक साथ रह रहे होंगे . विभु स्कूल जाया करेगा और रात में हम तीनों एक साथ बैठकर भोजन किया करेंगे . कितना अच्छा होगा तब ....’’ आंखें बन्द किये वे बोली थीं .
‘‘बहुत अच्छा लगा करेगा दीपा , लेकिन तुम अधिक कल्पनाएं मत किया करो . ’’ उनके कान में चिकोटी काटते हुए विजय ने कहा था . ‘‘मेरी तैयारी की भी चिन्ता करोगी या बातें ही करती रहोगी .’’
वे विजय की तैयारी में जुट गयी थीं .
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मसूरी पहुंचकर विजय ने कई पत्र लिखे , जिनमें अपने प्रशिक्षण तथा प्रशिक्षणार्थियों के विषय में ही विस्तार से चर्चा की . वे भी हर पत्र का उत्तर देती रहीं और अपनी तथा विभु की चिन्ता न करने के विषय में उन्हें लिखती रहीं . कभी-कभी विजय के पत्र आने में देर हो जाती तब वह लगातार कई पत्र लिखकर उन्हें लापरवाही की याद भी दिला देती थीं .
एक बार लगभग पन्द्रह दिन तक उनका कोई पत्र नहीं आया . उन्होंने भी सोच लिया कि इस बार वे तब तक पत्र नहीं लिखेंगी जब तक विजय का पत्र नहीं आता . आखिर एक दिन उनका पत्र आया , जिसमें माफी मांगते हुए उन्होंने लिखा था , ‘‘दीपा , आजकल पढ़ाई तथा अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण तुम्हें पत्र नहीं लिख पाया . मैं जानता हूं तम्हें अवश्य बुरा लग रहा होगा . भविष्य में ऐसा कभी नहीं होगा . ....यहां मेरे साथ लखनऊ की नीतासिंह भी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहीं हैं . मेरी अच्छी मित्र बन गई हैं . कभी अवसर मिलने पर तुमसे मिलवाऊंगा . तुम उन्हें अव्श्य पसन्द करोगी .’’
उस पत्र में न तो विजय ने यह पूछा था कि वे कैसी हैं और न ही विभु के विषय में एक शब्द लिखा था . उन्हें यह अच्छा न लगा . उन्होंने कई दिनों बाद पत्र का उत्तर दिया . लेकिन विजय उनसे दस हाथ आगे निकले . उन्होंने एक महीने बाद उनके पत्र का उत्तर दिया . वह भी केवल चार पंक्तियों में . इन्हीं दिनों विभु बीमार हो गया , उसकी बीमारी में वे इस कदर उलझीं कि विजय को लिख नहीं पायीं . शहर के अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाने के बाद भी वे विभु को बचा न सकीं . विभु उन्हें छोड़कर चला गया . विभु की मृत्यु ने उन्हें अन्दर से तोड़ दिया .
विभु की मृत्यु का समाचार विजय को देते हुए उन्होंने लिखा कि वह चाहे एक दिन के लिए घर आएं , किन्तु आएं अवश्य . लेकिन विजय नहीं आये . काफी दिनों बाद उनका पत्र आया जबलपुर से . उनकी वहां पोस्टिंग हो गयी थी . लेकिन उसमें उन्होंने केवल अपनी पोस्टिंग की सूचना ही दी थी . विभु की मृत्यु के विषय में एक शब्द भी न लिखा था . वही विजय का अंतिम पत्र था . उनका मन विजय से मिलने के लिए परेशान था . लेकिन विश्वविद्यालय की परीक्षाएं निकट थीं , जिससे वे उनसे मिलने भी नहीं जा सकती थीं .
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समय तेजी से गुजरता जा रहा था . उनकी परेशानी भी बढ़ती जा रही थी . जबलपुर के पते पर विजय को लिखे उनके अनेक पत्र अनुत्तरित रहे थे . और एक दिन उन्होंने निर्णय किया कि न तो वे विजय को पत्र लिखेंगी और न ही उनसे मिलने जाएंगी . उन्होंने अपने को पूरी तरह अध्ययन और अध्यापन में लगा दिया . दो वर्ष का समय कब और कैसे बीत गया , पता नहीं चला . दो वर्ष बाद उन्हें जो कुछ मिला , वह उनके सामने था तलाक के कागजातों के रूप में , जिसके साथ विजय का संक्षिप्त पत्र था , जिसमें उन्होंने कागजातों को हस्ताक्षर करके तुरंत लौटा देने का मात्र अनुरोध किया था .
उन्होंने एक नजर सामने रखी खाली प्लेटों पर डाली , जिसे ठीक उनके सामने नित्यप्रति की भांति रामकली ने सजा रखा था .
‘रामकली कितना खयाल रखती है मेरी भावनाओं का .’ वे सोचने लगीं , ‘यही तो था उनका स्वप्न . मेज के एक ओर वे होंगी , एक ओर विजय और एक ओर विभु.....’ लेकिन वह स्वप्न तो कब का खण्डित हो चुका .
उन्होंने पेन उठाया और तलाक के कागजातों पर हस्ताक्षर करने लगीं .
(1987)
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