<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699</id><updated>2012-02-07T05:10:44.912-08:00</updated><category term='कहानी'/><category term='कहानी-२९'/><category term='कहानी -२८'/><category term='कहानी -२७'/><category term='कहानी - २७'/><title type='text'>रचना रूप</title><subtitle type='html'>रूपसिंह चन्देल की रचनाएं</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>14</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-2999263149693256915</id><published>2011-03-20T23:53:00.000-07:00</published><updated>2011-03-21T00:02:37.710-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी-३४</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-sc5JroEzxa8/TYb33CUICGI/AAAAAAAAASY/ivfHZmyDa3Q/s1600/Balram-4.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-sc5JroEzxa8/TYb33CUICGI/AAAAAAAAASY/ivfHZmyDa3Q/s200/Balram-4.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5586424912685828194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:x-large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#FF0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-B2yUDF-Hxao/TYb2tAqKdeI/AAAAAAAAASQ/PIa4BFcmrLA/s1600/Balram-1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#FF0000;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#6600CC;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;सब बकवास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#009900;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;रूपसिंह चन्देल &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;         हम जब उनके बंगले में पहुंचे, आसमान बिल्कुल साफ था, धूप खिली हुई थी और बंगले में खड़े नीम, आम, अमरूद, अनार---के पेड़ों पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। बंगले के एक ओर एक कोने में केले के वृक्षों का समूह एक-दूसरे  से मुंह जोड़े खड़े थे और उनमें घारें और खिलने को विकल फूल लटक रहे थे। लगभग एक हजार वर्गमीटर में फैले उस बंगले, जी हां उन्होंने बंगला ही कहा था और वह था भी, में आगे के आधे भाग में फैला था उनका वह उद्यान।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेन गेट से बंगले तक जाने के लिए लाल बजरी का पंद्रह फीट चौड़ा गलियारा था, जिसके दोनों ओर ईटों को टेढ़ा करके गाड़ा गया था। गलियारे के दोनों ओर लॉन और उससे हटकर पेड़। बंगले के चारों ओर बाउण्ड्रीवॉल और उस दीवार के साथ फूलों की क्यारियां ---खिले रंग-बिरंगे फूल। बजरी के गलियारे के बायीं ओर के लॉन में झूला पड़ा हुआ था और बराम्दे में गद्दीदार चार कुर्सियों के साथ एक आराम कुर्सी थी जिसपर वह अधलेटे हुए थे। सामने कुर्सी पर उनकी पत्नी आंखों पर चश्मा संभालती, जो बार-बार खिसककर नाक पर आ टिकता था, अखबार पढ़ रही थीं। उन्होंने हम पर कुछ इस प्रकार दृष्टि डाली मानों कहना चाहती थीं कि सुबह हमारा आगमन उन्हें अप्रिय लगा था। सामने अधलेटे उनके चेहरे पर भी प्रसन्नता का कोई भाव नहीं था, लेकिन चूंकि उन्होंने आने की इज़ाजत दी थी इसलिए चेहरे पर हल्की स्मिति ला बोले, ‘‘बैठें--- जो भी पूछना है पूछ लें--- दस बजे मुझे सी.एम. से मिलने जाना है। ग्यारह का समय दिया है उन्होंने।’’ उनके चेहरे पर स्मिति का स्थान गंभीरता ने ओढ़ लिया था और वह पूरी तरह हमारे प्रश्नों के लिए अपने को तैयार कर चुके थे किसी नेता की तरह। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमारे कुछ पूछने से पहले उन्होंने यथावत गंभीरता बरकरार रखते हुए पूछा,‘‘ कुछ लोगे?’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ना में सिर हिलाने के बाद वह बोले, ‘‘आप पत्रकार लोग ठंडा-गर्म कहां लेते हैं!’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमने उनके व्यंग्य को समझा और बोले,‘‘सर पहले हम अपने परिचय----।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमारी बात बीच में ही काटते हुए उन्होंने कहा, ‘‘परिचय मैं भूल जाया करता हूं --- क्या होगा जानकर --- आप पत्रकार हैं--- आप लोगों ने मेरे विरुद्ध बहुत विषवमन किया है। प्रारंभ में मैंने उत्तर भी दिए--- लेकिन आप लोगों के दिमाग में जो कीड़ा प्रवेश कर गया उसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं, फिर मेरी क्या औकात--- मैं एक साधारण लेखक----।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘आप अपना वही घिसा-पिटा प्रश्न दोहरा रहे हैं। नहीं बन्धु मैं आज भी कुछ न कुछ लिखता रहता हूं। फिर यह आवश्यक भी नहीं कि लेखक कागज पर कलम ही घिसता रहे, यदि वह कुछ भी साहित्य के लिए अपना योगदान दे रहा है तो क्या वह साहित्य की सेवा नहीं! और जहां तक लिखने का प्रश्न है-- कुछ दिन पहले-- यही कोई दो महीने पहले-- ‘पुस्तक सदन प्रकाशन’ की स्मारिका में उसके संस्थापक स्व. डॉ. सदाशिव शांडिल्य पर मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था। स्व. डॉ. शांडिल्य राज्य के शिक्षा मंत्री डॉ. शिवानंद शांडिल्य के पिता थे यह तो आप जानते ही होगें।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘जी हां, मेरी पुस्तकें उसी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थीं और स्व. शांडिल्य जी के जीवन काल में प्रकाशित हुई थीं। मेरा गहरा संबन्ध था उनसे। वे मेरे आत्मीय थे--- कहना चाहता हूं कि साहित्य में उन्होंने मुझे पहचान दी और जब तक वे जीवित रहे उनकी मुझ पर विशेष कृपा रही। यह आलेख मुझे बहुत पहले ही लिख लेना चाहिए था, और सच यह है कि लिखा भी गया था, लेकिन प्रकाशित यह देर से हुआ --- तो आपका यह कहना कि मैं लिख ही नहीं रहा, उचित नहीं है। आप मेरी व्यस्तता भी तो देखें--- कितनी ही संस्थाओं से जुड़ा हुआ हूं। आप लोगों को पता होना चाहिए। कितनी ही संस्थाओं का मैं अध्यक्ष हूं, कितनी ही का सलाहकार और ये सभी संस्थाएं साहित्य के लिए समर्पित हैं।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘यह प्रश्न कितना विचित्र है आपका--- इतने बड़े बंगले में अकेले क्यों रहता हॅंू ! बच्चे बाहर हैं, एक अमेरिका में, दूसरा दुबई में--- आते-जाते रहते हैं--- और अंततः उन्हें आकर रहना यहीं है।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘यह सच है कि जब मैं क्लर्क था ---उन दिनों मैंने बहुत लिखा। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर मेरी कहानियां प्रकाशित होती थीं--- एक साहित्यिक दायरा था---।’’ &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘अब वह बात नहीं है। लोग कम ही एक-दूसरे से मिलते हैं।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘क्यो? आपको जानना चाहिए। साहित्य में राजनीति प्रवेश कर गयी है। लोग अपने-अपनों को स्थापित करने की राजनीति कर रहे हैं। आपसी विश्वास घटा है।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘राजनीति पहले भी थी। आजादी के पहले भी---लेकिन आजादी के बाद वह बढ़ी और अब---तौबा----।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘आपका यह आरोप सही नहीं है कि मैं भी अपने मित्रों के साथ मिलकर अपने समकालीनों को उखाड़ने में सक्रिय रहता था---सब बकवास है। तब भी मेरे विरोधियों की कमी न थी, आज भी नहीं है--- तब कम थे आज अधिक हैं, लोग ईर्ष्या-द्वेष रखते हैं--- कुप्रचार करते हैं---यह क्या कुप्रचार नहीं है कि मेरी साहित्यिक मृत्यु हो चुकी है---या मैं कल का लेखक हूं---।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘आप मेरी व्यस्तता देखें-- जब मात्र क्लर्क था-- क्लर्की के बाद समय ही समय था मेरे पास। लिखता था--मित्रों से मिलता था, रचनाओं पर - पढ़ी हुई पुस्तकों पर चर्चा करता था। लेकिन अब हर बात में मेरी व्यस्तता आड़े आ जाती है। पुराने मित्र कट गए--।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘नहीं, यह सच नहीं है। मैंने उन्हें अपने से नहीं काटा--वे मेरी व्यस्तता के कारण स्वयं ही अलग हो गए।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘संभव है, जैसाकि आप कह रहे हैं,  उन्हें कुंठा हो। मैं क्या कर सकता हूं। कुंठा बहुत घातक होती है---।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘यह लोगों का कुप्रचार है। यह सच है कि मैं सरकारी नौकरी में पांच वर्षों तक लक्ष्यद्वीप में रहा था।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘मिसेज भरुनी-- साहित्य मर्मज्ञ --अच्छी हिन्दी कथाकार थीं। मेरे संपर्क में आने के बाद वह बहुत अच्छा लिखने लगी थीं--- बहुत ही नेक महिला थीं। उनके दो कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे ---।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘जी हां, उन संग्रहों के प्रकाशन में मेरी इतनी ही भूमिका थी कि उनका परिचय मैंने प्रकाशक से करवा दिया था। वह रिटायरमेण्ट के करीब थीं और लंबे समय से लक्ष्यद्वीप में सेवारत थीं---आई.ए.एस. थीं---।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘यह संयोग ही था कि मैं उनके संपर्क में आ गया था। उनकी बड़ी कृपा थी मुझ पर। मेरी पत्नी को छोटी बहन मानती थीं वह। छोटे भाई की तरह मुझे स्नेह देती थीं।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘यह मेरे विरोधियों का निराधार दुष्प्रचार है। मैंने उन पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं डाला था। कहा न कि वह मुझ पर बहुत कृपालु थीं-- मेरी पत्नी को इतना अधिक प्रेम करती थीं कि उन्होंने स्वेच्छया अपनी वसीयत मेरी पत्नी के नाम कर दी थी, जिसमें यह बंगला भी था।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘जी हां , वे अकेले थीं। उनके पति की मृत्यु लगभग दस वर्ष पहले हो चुकी थी और पति की मृत्यु के पश्चात् इस बंगले में एकाकी जीवन बिताना कठिन जान उन्होंने अपना स्थानांतरण लक्ष्यद्वीप करवा लिया था।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘लतिका सरकार -- आप मिसेज भरुनी की तुलना उनसे क्यों कर रहे हैं ? मैंने कहा न, उन्होंने स्वेछया मेरी पत्नी के नाम वसीयत की थी। उनके परिवार में कोई नहीं था। दूर-दराज के रिश्तेदारों को वह पसंद नहीं करती थीं। मेरे परिवार के प्रति उनकी आत्मीयता प्रगाढ़ थी। वे देवीस्वरूपा थीं---बड़ा दिल पाया था उन्होंने।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘नहीं, वह वापस दिल्ली नहीं आ पायीं। मेरी पत्नी के नाम वसीयत करने के कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी थी।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘मैंने पहले ही कहा कि मेरे विरोधी हर प्रकार से मुझे बदनाम करने की नीयत से यह दष्प्रचार कर रहे हैं। उस नेक महिला की मृत्यु स्वाभाविकरूप से हुई थी। कोई रहस्य नहीं था। फूडप्वायजनिंग से हुई थी उनकी मृत्यु। मेडिकल रपट आज भी मेरे पास है। आप कभी भी देख सकते हैं--- लेकिन आज नहीं--- मुझे सी.एम. से मिलने जाना है।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘मुझे अपने विरोधियों के दुष्प्रचार का कोई उत्तर नहीं देना। उत्तर न देना ही सबसे बड़ा उत्तर है।’’ वह उठ खड़े हुए ‘‘क्षमा करेगें---मुझे--।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘जी सर, आपको सी.एम. से मिलने जाना है।’’ हमने उनकी बात लपक ली थी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब हम उनके बंगले से बाहर निकल रहे थे चिड़ियां नहीं चहचहा रही थीं। आम के पेड़ पर कौआ कांव-कांव कर रहे थे और आसमान पर घने काले बादल घिरते दिख रहे थे।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-2999263149693256915?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/2999263149693256915/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=2999263149693256915&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/2999263149693256915'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/2999263149693256915'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2011/03/blog-post_20.html' title='कहानी-३४'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-sc5JroEzxa8/TYb33CUICGI/AAAAAAAAASY/ivfHZmyDa3Q/s72-c/Balram-4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-801522844480932130</id><published>2011-03-05T06:57:00.000-08:00</published><updated>2011-03-05T07:01:30.378-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी-३३</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Tr-Vvcze4QA/TXJP13KN8nI/AAAAAAAAASI/KqWWwjtPsYI/s1600/Balram-5.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5580610675023934066" style="WIDTH: 128px; CURSOR: hand; HEIGHT: 119px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-Tr-Vvcze4QA/TXJP13KN8nI/AAAAAAAAASI/KqWWwjtPsYI/s200/Balram-5.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; चित्र :बलराम अग्रवाल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#000099;"&gt;वह चेहरा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff9900;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य दिसम्बर का एक दिन . सुबह की खिली-खिली धूप और लॉन में पड़ी बेंचें . बेंचों पर बैठे कई चेहरे ..... धूप में नहाये चेहरे .... धूप सेकते चेहरे . खिड़की का पर्दा उन्होंने थोड़ा-सा खिसका दिया था , जिससे लॉन का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था . उनकी नजर  एक चेहरे पर टिक गयी और वह गौर से उसे देखते रहे . चेहरे पर उम्र की लकीरें स्पष्ट थीं .  उन्होंने कुर्सी एक ओर खिसकाई और खिड़की पर जा खड़े हुए .... निर्निमेष उस चेहरे को देखते हुए . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वही हैं ......लेकिन यहां क्यों ? ' मस्तिष्क में तंरगें दौड़ने लगीं . कुछ क्षण खिड़की पर खड़े रहकर वह कमरे में टहलने लगे सोचते हुए , 'मैं कैसे भूल सकता हूं उस चेहरे को . ढल गया है .... ढलना ही था . पचास से अधिक सालों की लंबी यात्रा .... पचीस साल जैसा कौन रहता है ! शरीर में स्थूलता भी है ....अपने को देखो तपिश .... तुम क्या उतने ही स्लिम-ट्रिम हो .... बढ़ती उम्र में सभी के आकार-प्रकार - चेहरे बदलते ही हैं ........'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह एक बार पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए और देखने लगे. इस समय वह चेहरा किसी युवती से बातें कर रहा था . ...युवती , जो पचीस -छब्बीस के आसपास थी ....उस चेहरे से मिलता -सांवला चेहरा , नाक नोकीली , होंठ पतले और आंखें छोटीं . लंबाई भी उतनी ही .....वह भी तो उस युवती जितनी लंबी थीं , लेकिन तब उनके नितंब छूते बाल थे , जैसे कि उस युवती के हैं , लेकिन अब वह बॉब्ड थीं .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'निेश्चित ही यह वही हैं .....' वह अपनी टेबल के चारों ओर कमरे में कुछ क्षण तक टहलते रहे , ' क्या उन्हें मेरे बारे में जानकारी नहीं ? या उनकी स्मृतिपटल से मेरा नाम सदा के लिए मिट चुका है . लेकिन ऐसा संभव नहीं . हम दो बार मिले थे .... कितने ही पत्र लिखे थे एक-दूसरे को .' वह पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए , 'यह मेरा भ्रम नहीं....यह वही हैं  .'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजे पर दस्तक हुई  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कम इन '' वह तेजी से पलटे और कुर्सी की ओर ऐसे बढ़े मानो चोरी करते हुए पकड़े जाने का भय था  .&lt;br /&gt;कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 प्रवीण राय ने आहिस्ता से प्रवेश किया .&lt;br /&gt;''यस प्रवीण .... इज एवरीथिंग फाइन !''&lt;br /&gt;''जी सर . एक्सपर्ट्स डॉ0 श्रेयांष तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह आ गए हैं . ''&lt;br /&gt;''और हेड साहब....डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे ?''&lt;br /&gt;डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष थे और विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज में शिक्षक के किसी भी पद के साक्षात्कार में उनका होना अनिवार्य था . यह  विश्वविद्यालय का नियम था .&lt;br /&gt;'' उनके पी.ए. का फोन आया था सर कि वह कुछ देर पहले ही कार्यालय से निकले हैं ......उन्हें पहुंचने में कम से कम आध घण्टा का समय लगेगा .''&lt;br /&gt;''हुंह......'' कुछ सोचने के बाद वह बोले , '' हेड साहब के आने तक प्रतीक्षा करना होगा .... डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह को मेरे यहां ले आओ.......''&lt;br /&gt;''सर मैंने पहले ही उन्हें आपके यहां के लिए कहा था लेकिन दोनों सीधे गेस्ट रूम में जाते हुए बोले कि वहां उन्हें कोई कष्ट नहीं.....''&lt;br /&gt;''ओ. के. ...'' प्रवीण राय को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए वह बैठ गए और बोले ,  ''इन दोनों की जोड़ी जहां भी जाती है अपने कंडीडेट के लिए दबाव बनाते है ....''क्षणभर चुप रहे ,  '' दरअसल हेड साहब सीधे व्यक्ति हैं ..... वह सब कुछ जानते हैं , लेकिन नहीं मालूम किन कारणों से प्राय: इन दोनों को एक साथ विशेषज्ञ के रूप में रिकमेण्ड कर देते हैं .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सर , मुझे जहां  तक जानकारी है .... जब भी डॉ. तिवारी से पूछा जाता है विशेषज्ञ के रूप में किसी कॉलेज में जाने के लिए उनकी शर्त होती है कि उनके साथ दूसरा विशेषज्ञ डॉ. निकिता सिंह होंगी तभी.... विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ जाने की शक्ति किसी में नहीं है . हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक हैं ... . सत्ता में पैठ है और वी.सी. भी उन्हें मानते हैं  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मुस्कराते रहे .&lt;br /&gt;''सर , निकिता सिंह का कोई छात्र है ....सुना है .... उनके  निर्देशन में पी-एच.डी. कर रहा है और 'नेट' भी उत्तीर्ण है .....हो सकता है .....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने प्रवीण की बात आधी-अधूरी सुनी . उस क्षण उनकी नजरें खिड़की से बाहर बेंच पर अखबार में झुके उस चेहरे पर टिकी हुई थीं . युवती अब वहां नहीं थी  .&lt;br /&gt;'युवती भी शायद अभ्यर्थी है .' उन्होंने सोचा .&lt;br /&gt;''सर , फिर.....'' प्रवीण के टोकने से वह अचकचा गए  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''हुंह.....यह हो सकता है . लेकिन डॉ. तिवारी दो अपने रखते हैं तब कहीं एक वेकेंसी निकिता सिंह को देते हैं  . ''&lt;br /&gt;''सर ''.&lt;br /&gt;''प्राय: महिला अभ्यर्थी ही उनकी कंडीडेट होती हैं . उनके निर्देशन में पी-एच.डी करने वाली सभी लड़कियां ही हैं ..... एकदम समाजवादी हैं डॉ. तिवारी . निकिता ने भी उनके निर्देशन में पी-एच.डी की थी ..... उनके आलोचक इसे उनकी कमजारी मानते हैं तो मानते रहें . '' चुप होकर प्रवीण की ओर देखने के बाद वह खिड़की से बाहर लॉन की ओर देखने लगे . वह चेहरा उन्हें वहां नजर नहीं आया . 'कहां गई ? ' क्षणांश के लिए वह विचलित हुए , लेकिन तभी सामने बैठे अपनी ओर ताकते प्रवीण पर दृष्टि डाली और बोले , ''लेकिन हम क्या करें प्रवीण  ?''&lt;br /&gt;'' क्या सर  ?''&lt;br /&gt;''आपको बताया था .... मिनिस्ट्र्री से आए फोन के बारे में .... मंत्री जी किसी निरंजन प्रसाद में  इंटरेस्टेड हैं .... मंत्री जी के मुंह लगे ज्वाइण्ट सेक्रेटरी का फोन था . दोनों ही बिहार के हैं . जे.एस. ने संकेत में यह भी कहा था कि निरंजन मंत्री जी का दूर का रिश्तेदार है .......''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सर , हमें डॉ. तिवारी से पहले ही बात कर लेनी चाहिए और अपनी समस्या डॉ. पाण्डे को भी बता देना चाहिए  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''प्रवीण , आप जानते हैं कि डॉ. तिवारी का कंडीडेट नहीं तो किसी का नहीं ......उन पर मंत्री-संत्री का प्रभाव नहीं पड़ने वाला ....... ''&lt;br /&gt;''सर , वेकेंसी भी एक ही है....एडहॉक भी नहीं ....वर्ना डॉ. तिवारी के लिए एडहॉक का ऑफर दे सकते थे  .''&lt;br /&gt;''प्रवीण, '' वह कुछ गंभीर हो उठे , ''आपको नहीं लगता कि यह सब कितना अनफेयर है .... मंत्री के कंडीडेट की बात हो या डॉ. तिवारी या डा. निकिता की या किसी अन्य के कंडीडेट की .... जो अभ्यर्र्थी दूर से आते हैं और कितनी ही बार उन्हें दूर शहरों में असफल साक्षात्कार के लिए जाना होता है....... उनके विषय में सोचो . अधिकांश बेकार और साधारण हैसियत के युवक .... ये तिवारी या मंत्री जैसे घड़ियाल उनकी नौकरियां निगल जाते हैं .....'' उनका चेहरा लाल हो उठा . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सर '' प्रवीण ने चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि वह स्वयं भी सिफारिश से नियुक्त हुआ था  . लेकिन वह जानता था कि उसके सामने बैठे डॉ0 तपिश .... उसके प्राचार्य एक मेरीटोरियस व्यक्ति थे और उन्होंने सिफारिश से नहीं अपनी योग्यता से प्राध्यापकी पायी थी और विश्वविद्यालय - कॉलेज की राजनीति के  बावजूद वह इस पद पर पंहुचे थे ... अपनी योग्यता के बल पर ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'' डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह के लिए जलपान की व्यवस्था .....''  अपनी बात अधूरी छोड़ दी उन्होंने .&lt;br /&gt;''सर डॉ0 अनिरुध्द शुक्ल उनकी सेवा में हैं .''&lt;br /&gt;''ओ.के. ....'' उन्होंने पुन: लॉन की ओर देखा . बेंचों पर बैठे अन्य लोग भी इधर'उधर जा चुके थे .... केवल एक वृध्द पुरुष को छोड़कर  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''डॉ0 पाण्डे के आते ही मुझे सूचित करना . उनके आते ही इंटरव्यू प्रारंभ कर देना है..... तब तक आप डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह का खयाल रखें ..... ''  वह पुन: कुर्सी से उठ खड़े हुए और कमरे में टहलने लगे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****** &lt;br /&gt;'लोग रिसेप्शन में बैठे होंगे ....धूप में गर्मी बढ़ गयी  होगी . मुझे रिसेप्शन की ओर जाना चाहिए .'&lt;br /&gt;'लेकिन क्यों ?'&lt;br /&gt;'शायद वह वहां मिल जांए . '&lt;br /&gt;'मिल भी जाती हैं तो क्या तुम उनसे बात कर सकते हो इस समय . वह लड़की उनकी बेटी होगी .... यह तो अनुमान लग ही गया है . एक अभ्यर्थी की मां से बात करना....तपिश तुम प्राचार्य हो इस कॉलेज के.....'&lt;br /&gt;'प्राचार्य क्या इंसान नहीं ! उसके परिचितों के बच्चे साक्षात्कार में नहीं बैठ सकते ? बात कर लेने से ही मैं उनकी लड़की का फेवर करने लगूंगा ? मुझे उस लड़की का नाम भी मालूम नहीं .... जबकि मंत्री जी की तोप इन्हीं बच्चों के बीच कहीं समायी होगी .... तिवारी और निकिता सिंह की गन भी होगी कहीं ...... इण्टरव्यू करने उधर से जाते हुए मैं उन्हें भलीभांति देख सकूंगा ..... जरूरी नहीं कि वह मानसी ही हों .... हों भी तो वह मुझे पहचान लेंगी यह आवश्यक नहीं है  .'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर तुम उधर से जाना ही क्यों चाहते हो ?' अंदर से आवाज आयी . 'पहचान लिए जाने के लिए ही न ! लेकिन क्या बात मात्र इतनी ही है ! क्या यह सच नहीं कि उनके पहचानने से तुम्हारा आहत स्वाभिमान संतुष्ट होगा . तुम उन्हें यह अहसास नहीं करवाना चाहते कि तुम इस कॉलेज के प्रिसिंपल हो ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं , ऐसा नहीं है .....इतनी पुरानी बात ....तीस साल पुरानी ....मैं तो भूल ही गया था ..'&lt;br /&gt;'नहीं तपिश....तुम उसे एक दिन ...बल्कि एक पल के लिए भी नहीं भूले....भूल सकते भी नहीं थे .... वह पुन: खिड़की पर खड़े हो गए और बाहर देखने लगे . लॉन की एक बेंच पर वही अकेला वृध्द व्यक्ति बैठा था और बेंच से कुछ हटकर एक कुत्ता अपना पेट , टांगें और मुंह ऊपर उठाये पीठ के बल निश्चल लेटा  हुआ था . तभी दरवाजे पर नॉक हुआ  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''यस !'' वह पलटे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सर , हेड साहब आ गए हैं ....सीधे कांफ्रेंस रूम में .....आप भी......''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''ओ.के.'' अभ्यर्थियों के नामों का फोल्डर टेबल से उठा वह डॉ0 प्रवीण के पीछे हो लिए थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;उन दिनों वह दिल्ली में विदेश मंत्रालय में अनुवादक थे . अपने को पी-एच.डी. के लिए पंजीकृत करवाने में दो बार असफल हो चुके थे . यह उन दिनों की बात है जब दूसरी बार विश्वविद्यालय ने उनके शोध विषय को खारिज किया था . वह परेशान थे और यह बात मानसी को बताना चाहते थे  . बताना इसलिए चाहते थे क्योंकि पिछली मुलाकात में मानसी ने पहले विषय के खारिज होने के कारणों पर गहरी रुचि प्रदर्शित की थी और उसके हर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक ही बात कही थी कि विश्वविद्यालय ने विषय के खारिज होने का कोई कारण उन्हें नहीं बताया ....केवल सूचना भेजी थी . मानसी उद्विग्न थी और तब उन्होंने अनुभव किया था उनके शोध से शायद उसकी भविष्य की आकांक्षाएं जुड़ी हुई थीं . लेकिन 'संभव है यह मेरी अपनी सोच हो.... वह ऐसा न सोचती हो .' उन्होंने सोचा था .' यदि शोध नहीं कर सके और प्राध्यापक नहीं बन पाए तो क्या  .  जो नौकरी वह कर रहे हैं .... उसका भविष्य प्राध्यापक जितना आकर्षक न सही लेकिन बुरा भी नहीं . डिप्टी डायरेक्टर तो वह बन ही जाएगें .'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लेकिन मानसी को बताना आवयक है . पिछले एक वर्ष से कभी एक बहाने तो कभी दूसरे वह शादी टालती जा रही थी . वह दूरदर्शन में प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव थी और प्रारंभ में उसका बहाना था कि वह दिल्ली में थे और दिल्ली में उसका स्थानांतरण कठिन था क्योंकि वहां पहले से ही अतिरिक्त प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव्स बैठे हुए थे , जबकि उनका लखनऊ स्थानांतरण संभव नहीं था . मानसी के स्थानांतरण के विषय में वह कमलेश्वर जी से मिले थे . कमलेश्वर जी उन्हीं दिनों दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर नियुक्त हुए थे . मुस्कराते हुए कमलेश्वर जी ने कहा था , ''तपिश जी ..... यह बड़ा काम नहीं है . शादी करो....स्थानांतरण की जिम्मेदारी मेरी .'' कमलेश्वर जी ने उनकी आंखों में देखा , फिर मुस्कराये ....एक मीठी मुस्कान और बोले थे , ''भाई , पता कर लो ....आपकी मंगेतर की कोई दूसरी समस्या तो नहीं ....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''ऐसा नहीं लगता सर....उसे दोनों के अलग-अलग शहरों मे रहने का भय ही सता रहा लगता है .''&lt;br /&gt;''उन्हें बता दो कि मैंने आश्वस्त किया है ....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमलेश्वर जी की बात बताने के बाद मानसी ने खत में लिखा , ''तपिश , आपने पहले यह क्यों नहीं बताया था ... अब एक साल के लिए मैं बंध गई हूं . मैंने यहां विश्वविद्याालय में मार्निंग शिफ्ट में उर्दू सार्टीफिकेट कोर्स में प्रवेश ले लिया है . एक जमाने से मैं उर्दू सीखना चाहती रही हूं ....  एक वर्ष की ही बात है .....कमलेश्वर जी तो अभी आए ही हैं .... अभी रहेगें ही ..... भले ही आई.ए.एस . लॉबी उनके खिलाफ है.......तो क्या आप एक वर्ष रुक नहीं सकते ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मैं तो रुका हुआ हूं ही..... लेकिन मेरे घरवाले....उनका धैर्य चुका जा रहा है  .'' उन्होंने मानसी को लिखा था  .&lt;br /&gt;''मैंने अपने डैडी से बात की है. वह आपके डैडी को मेरी समस्या से अवगत करवा देंगे .'' मानसी ने इस पत्र में आगे लिखा , ''समय निकालकर आकर मिल लें ......पत्रों में बातें हो नहीं पातीं .''&lt;br /&gt;''कोशिश करूंगा .'' उन्होंने उसे लिख तो दिया था लेकिन लखनऊ जाने का प्रयास नहीं किया और न ही मानसी का उसके बाद कोई पत्र आया . शोध के अपने नये विषय की तैयारी और रूपरेखा प्रस्तुत करने की चिन्ता में वह इतना डूबे कि वह उसे पुन: पत्र  लिख नहीं पाए . इस बार विषय प्रस्तुत करते ही निर्णायक समिति की बैठक हुई और उनका विषय पुन: खारिज कर दिया गया . विश्वविद्यालय का पत्र थामें वह कितनी ही देर तक यह सोचते रहे थे कि उन्हें मानसी को यह सूचना देना ही चाहिए . और उन्होंने उसे अंतर्देशीय पत्र लिख दिया था .&lt;br /&gt;पन्द्रह दिन के अंदर ही उत्तर आया , ''आपका मिलना आवश्यक है  . जितनी जल्दी संभव हो ....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने उसके ऑफिस के पते पर पत्र लिख दिया कि वह अमुक तिथि को अमुक ट्रेन से लखनऊ पहुंचेंगे....सुबह दस बजे उसके कार्यालय में मिलेंगे  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कार्यालय नहीं.....इंडियन कॉफी हाउस ....ग्यारह बजे .... मेरे कार्यालय के निकट ही है ....सुबह ग्यारह बजे  ....मिस नहीं करेंगे  .'' मानसी ने तुरंत लिख भेजा था  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;निश्चित तिथि को ठीक ग्यारह बजे सुबह वह कॉफी हाउस में थे . पांच मिनट ही हुए थे उन्हें वहां पहुंचे कि उन्होंने एक युवक के साथ सड़क पार करते हुए मानसी को देखा . टेबल पर बैठने के लिए उन्होंने कुर्सी को हाथ लगाया ही था कि रुक गए और बाहर निकल आए .  उनकी दृष्टि युवक पर टिकी हुई थी , मानसी जिससे हंसकर कुछ कह रही थी . युवक लंबा....पांच फीट आठ इंच के लगभग.....स्लिम ...गोरा ....एक वाक्य में ... सुन्दर था  .&lt;br /&gt;'ऑफिस का कोई कलीग होगा .' उन्होंने सोचा , 'कहीं जा रहा होगा .'&lt;br /&gt;लेकिन युवक कहीं नहीं गया . मानसी के साथ रहा . मानसी ने दूर से ही उन्हें देख लिया था और उनकी ओर हाथ का इशारा कर कुछ कहा . उन्होंने मानसी के संकेत के बाद युवक को हंसते देखा था  .&lt;br /&gt;''सॉरी....मैं दस मिनट लेट हूं .'' उनके निकट पहुच मानसी बोली  .&lt;br /&gt;वह चुप रहे  . उनकी नजरें युवक पर गड़ी थीं  .&lt;br /&gt;''ओह ! '' मानसी ने उनके भाव पढ़ लिए , ''यह हैं मनीष तिवारी ....आकाशवाणी में हैं ....प्रोग्रैम....''&lt;br /&gt;''एक्ज्यूक्यूटिव....'' मानसी से शेष शब्द मनीष तिवारी ने झटक लिया और उनकी ओर हाथ बढ़ा बोला , ''आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई  .''&lt;br /&gt;''थेैंक्स .'' मंद स्वर में वह बोले थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मैं चलता हूं मानसी.....आफ्टरनून आकर केस डिस्कस कर लूंगा....नो हरी.....''&lt;br /&gt;''अरे यार.....ऐसी भी क्या जल्दी है ! तपिश जी क्या सोचेगें ? एक कप कॉफी पीकर चले जाना  '' मनीष की ओर देख मुस्कराती हुई मानसी बोली , ''अरे  हम लोग यहीं खड़े रहेगें या बैठेगें भी .....'&lt;br /&gt;''हां.....हां....क्यों नहीं ......'' और वह अंदर की ओर मुड़ गए तो मानसी और मनीष भी उनके पीछे हो लिए थे . जिस मेज पर वह बैठने जा रहे थे .... वह अभी भी खाली थी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठने के बाद उनके बीच देर तक चुप्पी पसरी रही  . चुप्पी को ताड़ती हुई  मानसी ने पूछा ,&lt;br /&gt;''कॉफी लेंगें  ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कॉफी हाउस में बैठे हैं तो वह तो लेना ही है........इस मुलाकात को  यादगार भी तो बनाना है .'' उन्हें अपनी बात अटपटी लगी , लेकिन बात जुबान से रपट चुकी थी . संभालने का प्रयत्न करते हुए उन्होंने तत्काल जोड़ा , '' मनीष जी का साथ होने से इसे यादगार मुलाकात ही कहूंगा ....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनीष के चेहरे पर मुस्कान तिर गयी  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''हां , यह है . मनीष बहुत व्यस्त रहते हैं ....कभी पकड़ में नहीं आते . आकाशवाणी की नौकरी......नाटक लिखते हैं ....इनकी कई स्क्रिप्ट पर दूरदर्शन और आकाशवाणी ने नाटक तैयार किए  हैं  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''हुंह  .'' उन्होंने मनीष की ओर पुन: हाथ बढ़ाया .''मेरा सौभाग्य . आप जैेसे कलाकार से मुलाकात का श्रेय मानसी जी को .... इनका भी आभार  .''&lt;br /&gt;''मानसी कुछ अधिक ही प्रशंसा कर रही हैं सर ! बस यूं ही कुछ उल्टा-सीधा लिख लेता हूें  .''&lt;br /&gt;''तपिश जी ......ये संकोच करते हैं .....''&lt;br /&gt;''हर बड़ा कलाकार अपने बारे में बताने या बताए जाने पर संकोच प्रकट करता है . बड़प्पन की यही निशानी है . '' वह अब पूरी तरह खुल चुके थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''यू आर राइट तपिश जी .... मनीष जीनियस हैं , लेकिन मेैं जब कहती हूं तो यह चिड़चिड़ा जाते हैं .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने देखा अपने को 'जीनियस' कहे जाने पर मनीष का चेहरा खिल उठा था . वह चुप रहे . कुछ देर बाद मनीष बोला , ''मानसी की ज़र्रानवाजी सर .....लेकिन आप मुझे लेकर कोई गलतफहमी नहीं पालेंगे ..... मुझ जैसे कलाकार-लेखक गली-कूंचों में एक खोजेंगे -- अनेक मिल जाएगें  ....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आपने देखा इनकी विनम्रता .'' तपिश की ओर देखते हुई मानसी बोली .&lt;br /&gt;वह तब भी चुप रहे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''यार मनीष , कुछ और तारीफ तभी करूंगी  .... जब कुछ पी लूंगी .'' मानसी बोली  .&lt;br /&gt;''बेयरे को आवाज दो .....दो चक्कर काट गया और हम लोग बातों में लगे रहे  .''&lt;br /&gt;''जाकर आर्डर कर आता हूं  .'' मनीष जाने के लिए उठा , दो कदम बेयरे की ओर बढ़ा , फिर रुककर उनसे पूछा  ,'' तपिश जी कुछ और लेगें  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''नो थैंक्स .''&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;कॉफी पीकर मनीष तिवारी चला गया .&lt;br /&gt;''तपिश जी , आपको कहीं कोई दूसरा काम है ?'' मानसी ने पूछा   .&lt;br /&gt;वह अचकचा गए . सोचने लगे ,''इसने मुझे बुलाया और अब पूछ रही है कि.....''&lt;br /&gt;कोई उत्तर दिए बिना वह मानसी की ओर देखने लगे थे  .&lt;br /&gt;''सॉरी ,मैंने यूं ही पूछा . कभी-कभी ऐसा होता है ... लेकिन ....'' आगे कुछ न बोल वह कभी बेयरे की ओर देखती ओैर कभी गेट की ओर .&lt;br /&gt;तपिश को लगा कि शायद उसने किसी और को भी बुलाया हुआ है . कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने पूछ लिया ,''किसी को आना है  ?''&lt;br /&gt;''नहीं....कौन आएगा ? '' मानसी फिर चुप थी और लगातार गेट कर ओर देखती जा रही थी . तपिश भी उधर ही देखने लगे . तभी बेयरा आ गया .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानसी का ध्यान गेट की ओर होने का लाभ उठा तपिश ने कॉफी के पैसे बेयरे को दे दिए  .&lt;br /&gt;''आपने क्यों दिए  ?''&lt;br /&gt;''मुझे नहीं देना चाहिए था  ?''&lt;br /&gt;''मेरा यह मतलब नहीं ....''&lt;br /&gt;''अगर आपको किसी की प्रतीक्षा नहीं तो हम उठें ....डेढ़ घण्टा हो चुका है .... ''&lt;br /&gt;''हां.....लेकिन यहां तो लोग सुबह आकर शाम तक बैठे रहते हैं ....''&lt;br /&gt;''हां.....आं....लेकिन हमें अभी बूढ़ा होने में बहुत वक्त है  .''&lt;br /&gt;मानसी मुस्करा दी . उन्होंने ध्यान दिया , उसकी मुस्कराहट में उत्साह -प्रफुल्लता नहीं थी  .&lt;br /&gt;उठ खड़े होते हुए उन्होंने पूछा , ''आपके पास अभी ओैर कितना वक्त है ....?''&lt;br /&gt;''लंच तक आपके साथ रह सकती हूं ... ''&lt;br /&gt;बाहर फुटपाथ पर पहुंच वह बोले ,''फिर हम क्यों न हजरतगंज में चहल-कदमी करते हुए बातें करें ....''&lt;br /&gt;''जी...श्योर ...''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;दो बजे तक मानसी उनके साथ हजरतगंज में एक छोर से दूसरे छोर तक उलट-फेर कर टहलती रही . उन्हें आश्चर्य था कि जिस उद्देश्य से उसने उन्हें तुरंत आ जाने का आग्रह किया था उस पर चर्चा करने से वह बचती रही . उन्होंने जब अपने शोध विषय के निरस्त होने की चर्चा छेड़ी... उसने केवल ,''ऐसा होता है ... वह कोई मुद्दा नहीं  .''&lt;br /&gt;''फिर मुद्दा क्या है ?''&lt;br /&gt;''मुद्दा ....... कुछ है ही नहीं  .''&lt;br /&gt;''फिर....?''&lt;br /&gt;''आपको लिखा था कि मैंने उर्दू कोर्स ज्वायन किया है .... उसे पूरा कर लेना चाहती हूं  .''&lt;br /&gt;''यह कोई आई.ए.एस. , पी.सी.एस.  जैसी  तैयारी तो नहीं . '' वह बोले  . उनका स्वर कुछ ऊंचा था  .&lt;br /&gt;''आप इतनी उतावली क्यों दिखा रहे हैं ?'' मानसी के स्वर में चिड़चिड़ाहट थी  .&lt;br /&gt;वह हत्प्रभ थे . कारण वह पहले ही बता चुके थे . चुप रहे .&lt;br /&gt;''मैं समझती हूं ... रुकना हमारे हित में है . आपको शोध के लिए पंजीकृत होने में सुविधा रहेगी .... तब तक कुछ काम भी कर डालेगें ... मैं भी उर्दू में कुछ कर लेना चाहती हूं....''&lt;br /&gt;''हुह....'' सामने से आ रहे व्यक्ति से उन्होंने अपने को बचाया .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''क्या आप नहीं चाहते कि आप जैसे प्रतिभाशाली युवक का स्थान किसी डिग्री कॉलेज या विश्वविद्यालय में है .... बुरा नहीं मानेगें .... आपने बताया था कि अच्छे अंको से आपने प्रथम श्रेणी पायी थी  एम.ए. में  .''&lt;br /&gt;''जी .''&lt;br /&gt;''फिर अनुवाद में प्रतिभा का क्षरण क्यों ...?''&lt;br /&gt;वह निरुत्तर रहे  .&lt;br /&gt;''अरे दो बज रहे हैं  ? ढाई से मेरे एक कार्य का लाइव टेलीकॉस्ट है ....मैं चलूं ?''&lt;br /&gt;''श्योर  .'' उदासीन स्वर में वह बोले थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानसी ने बॉय किया और तेजी से दूरदर्शन केन्द्र की ओर लपक गयी . वह देर तक खड़े उसे जाता देखते रहे थे . मानसी तो चली गई थी लेकिन उनके अंदर एक उद्वेलन छोड़ गयी थी ....&lt;br /&gt;उन्होंने रिक्शा पकड़ा और होटल लौट गए थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;उनके पिता पारंपरिक सोच के थे और अपनी बढ़ती उम्र से चिन्तित . एक दिन वह दिल्ली आ पहुंचे  और उन्हें धमकाने के अंदाज में बोले , ''तपिश , मैं उस रिश्ते को तोड़ने जा रहा हूं.... हद ही हो गयी . तय हुए डेढ़ साल से ऊपर हो चुका है .... उनके बहानों का अंत ही नहीं .... मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है  .''&lt;br /&gt;''क्या ?'' धीमे स्वर में उन्होंने पूछा  .&lt;br /&gt;''यही कि वे लोग किसी आई.ए.एस. -पी.सी.एस. के चक्कर में हैं . वहां से उन्हें स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा होगा .... और तुम्हें उन्होंने स्थानापन्न के रूप में रखा हुआ है .''&lt;br /&gt;''मैं भी जल्दी में नहीं हूँ . '' उन्होंने उत्तर दिया था .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''तुम्हें जल्दी क्यो होगी  ? तुम्हारी छोटी बहन छब्बीस की हो रही है ... तुम्हें यह पता नहीं होगा....? लेकिन मुझे उसकी चिन्ता भी करनी है .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''डैडी ...आप विपाशा की शादी की चिन्ता करें .... मैं फिलहाल शोध की चिन्ता करूंगा....''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'' शोध-बोध...शादी के बाद भी होता रहेगा .''&lt;br /&gt;'' रजिस्ट्रेशन होने तक मेरे मामले को स्थगिेत कर देंगे तो मेरे हित में होगा .'' उनके स्वर की निरीहता ने शायद पिता को सोचने के लिए विवश किया था . हथियार डालते हुए वह मरे-से स्वर में बोले थे ,''तपिश , शादी की भी एक उम्र होती है ... उसके बाद फिर समझौते ही होते हैं  .''&lt;br /&gt;वह चुप रहे थे   .&lt;br /&gt;पिता गए तो वह शोध के लिए नये विषय के पंजीकरण की तैयारी में लग गए थे  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;तीसरी बार शोध निर्णायक मंडल की बैठक छ: माह बाद हुई . उस बार उनका विषय पंजीकरण के लिए स्वीकृत हो गया था . जिस दिन यह बताने के लिए दफ्तर में उनके गाइड का फोन आया  उसी दिन शाम घर पहुंचने पर डाक से आया उन्हें एक निमंत्रण पत्र मिला , जिसपर नजर पड़ते ही वह चौंके थे . उस पर 'मानसी और मनीष के नाम लिखे थे . कार्ड खोलने का मन न होते हुए भी उन्होंने उसे खोला .... पढ़ा और एक ओर खिसका दिया . उसके दसवें दिन उन दोनों  का विवाह होना था . देर तक वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा सोफे पर अधलेटे से बैठे रहे थे . पिछली मुलाकात के दृश्य तेजी से उनकी आंखों के सामने घूमते रहे थे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मानसी ने उन्हें केवल मनीष से मिलवाने के लिए बुलाया था .... वह शायद इस विषय में बताना चाहती थी ...फिर कहा कयों नहीं... ' वह सोच रहे थे - 'कहना आवश्यक था ? यदि तुममें समझने की क्षमता ही नहीं तब कहकर भी क्या समझ लेते ? उसके परिवार वालों को भी इस बारे में जानकारी रही होगी . वे मनीष और उसके प्रेम संबधों के कारण उलझन में रहे होंगे  . लेकिन  मानसी ने उचित ही  किया . यदि अपने परिवार के दबाव में वह उनसे विवाह कर भी लेती तो भी क्या वह मनीष को भूल जाती  ! तब क्या स्थिति बनती.... नहीं उसने उचित कदम उठाया ....'' मुझे उसे बधाई देनी चाहिए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अगले दिन उन्होंने मानसी को बधाई का टेलीग्राम भेज दिया था  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;उसके बाद जीवन कुछ यूं बदला कि उन्हें पता ही नहीं चला . वह निरंतर सफलताओं के सोपान चढ़ते रहे ... पी-एच.डी. सम्पन्न होने से पहले ही उस कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए....और आज वह उस कॉलेज में ही प्राचार्य थे . उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा .... क्क्त भी नहीं था देखने का ...वक्त शादी करने के लिए भी नहीं निकाल सके....काम-शोध...और उसी दौरान दो वर्षों के लिए वह हिमाचल विश्वविद्यालय के वी.सी.  भी रहे .... केवल दो वर्षों के लिए... दो वर्षों बाद पुन: अपने पद पर वापस लौटे . उन्हें कभी किसी की कमी खटकी भी नहीं . अपने अधीनस्थों और विद्यार्थियों को अपना परिवार समझा और सभी के लिए दरवाजे खुले रखे . आज वह दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्राचार्य के रूप में जाने जाते हैं .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मानसी उन्हें कभी याद नहीं आयी ऐसा नहीं था . काम के बीच कभी अचानक खाली होते तो सोच लेते....मानसी उनके जीवन में आयी पहली और अंतिम लड़की थी .... भले ही उसके पिता ने उसे खोजा था और बाकायदा उनकी 'रिंग' सेरेमनी हुई थी . उसके बाद वह उससे दो बार ही मिले थे.... कुछ पत्राचार हुआ था .... तब वह उसके विषय में ही सोचते रहते थे .... सपने बुनते रहते थे . अकेले रहते थे ... दफ्तर के बाद मानसी उनके साथ हाती थी ... लेकिन जब सब समाप्त हुआ उन्होंने अपने को इतना समेटा कि मानसी भूले-भटके कभी उनके मानस पटल पर विचरण कर जाती और तब वह - ''आपने उचित निर्णय लिया था मानसी '' अपने को उसकी स्मृति से मुक्त कर लेते , 'लेकिन उसके जाते-जाते यह भी कहते , ''यदि आपने वह निर्णय न किया हेता मानसी तो मैं आज जो कुछ हूं वह नहीं होता  .''&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;साक्षात्कार प्रारंभ होने से पूर्व उन्होंने अभ्यर्थियों के नामों पर दृष्टि डाली और अभीप्सा तिवारी , लखनऊ पर अटक गए . सब कुछ उलटता-पलटता नजर आया . 'हर अभ्यर्थी को जानकारी होती है कि जिस कॉलेज में वह साक्षात्कार के लिए जा रहा है वहां का प्राचार्य , विभागाध्यक्ष और विश्वविद्यालय का विभागाध्यक्ष कौन है . अभीप्सा यदि मानसी की बेटी है तब मानसी को भी ज्ञात होगा ,फिर उसने मुझे एप्रोच क्यों नहीं किया ? करती तो क्या तुम उसके लिए कुछ कर देते  ! डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता और मंत्रालय..... क्या वह इतना आसान होता .' उन्होंने सोचा 'आवश्यक नहीं मानसी को पता ही हो .... मेरे नाम के कितने ही लोग हो सकते हैं . फिर उसने तो यही सोचा होगा कि मैं सरकारी बाबू था .... आज भी कुछ पदोन्नतियों के बाद वहीं होऊंगा .... ' क्षणांश के लिए रुककर पुन:  सोचा , ''यह भी संभव हेै वह मानसी हो ही न.... '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कुछ और सोचते कि अभ्यर्थियों को बुलाये जाने के  लिए प्रवीण ने पूछा और उनसे पहले डॉ0 पाण्डे ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी .&lt;br /&gt;अभीप्सा तिवारी को जब बुलाया गया तब वह कुछ विचलित हुए . एक बार उनके मन में आया कि वह उससे कुछ न पूछकर केवल उसके पेरेण्ट्स के विषय में पूछें , लेकिन तत्काल अंदर से आवाज आयी ,'' डॉ0 तपिश ....क्या मूर्खतापूर्ण बात सोचने लगे .... इतना भावुक होकर अपने पद की गरिमा क्यों घटाने पर तुले हुए हो  ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभीप्सा ने चयन बोर्ड के सभी सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर दिए और सही -बेहिचक . लखनऊ विश्वविद्यालय से उसने प्रथम श्रेणी में एम.ए.  किया था , नेट उत्तीर्ण थी और पी-एच.डी.  कर रही थी . अभीप्सा एक हलचल थी उनके अंदर . उसके अतिरिक्त दो अभ्यर्थी और भी थे जिन्होंने सभी के प्रश्नों के सही उत्तर दिए थे . लेकिन उन दोनों के बजाय घूमफिर कर उनके दिमाग में अभीप्सा की नियुक्ति घूम रही थी . 'अभीप्सा ही क्यों  ?' मन के  एक कोने से प्रश्न उठा  ,'दूसरे अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय के छात्र हैं ..... उनमें कोई कमी भी नहीं है .... फिर तपिश तुम अभीप्सा के बारे में ही क्यों सोच रहे हो ! मानसी से जुड़ा अतीत तुम्हें परेशान कर रहा है ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; उन्होंने विश्वविद्यालय के विभागाध्यसक्ष और डॉ0 तिवारी की ओर दृष्टि डाली . डॉ0 तिवारी साक्षकार समाप्त हो जाने के बाद डॉ0 निकिता सिंह से फुसफुसाकर कुछ कह रहे थे और वह स्वीकृति में सिर हिला रही थी . कांफ्रेंसरूम में सन्नाटा देर तक चहलकदमी करता रहा . बीच-बीच में कुछ कागजों की सरसराहट की आवाज हो जाती . तभी उन्होंने धण्टी बजायी  . वह सन्नाटे को तोड़ना चाहते थे  . गेट पर तैनात चपरासी दौड़ता हुआ आया  .&lt;br /&gt;''चाय ''&lt;br /&gt;''जी सर  .'' चपरासी के मुड़ते ही वह बोले  , ''किसके नाम पर विचार किया डॉ0 तिवारी  ? '' उन्होंने विभागाध्यक्ष और डॉ0 निकिता सिंह की ओर देखा .&lt;br /&gt;'' रंजना श्रीवास्तव .....''&lt;br /&gt;''डा0 साहब रंजना आधे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं दे पायी थी.....'' डॉ0 प्रवीण राय विनम्रतापूर्वक बोले .&lt;br /&gt;उन्होंने पुन: विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष की ओर देखा . वह चुप थे  .&lt;br /&gt;''सर.... डॉ0 प्रवीण ठीक कह रहे हैं .'' डॉ0 शुक्ल की आवाज थी . डॉ.  शुक्ल ने कुछ अधिक ही प्रश्न किए थे रंजना श्रीवास्तव से . उन्होंने उससे यह भी पूछा था कि पी-एच.डी. के उसके निर्देशक कौन थे ! प्रश्न सुनकर पहले तो रंजना अचकचाई थी , फिर डॉ0 तिवारी की ओर देखती रही थी . वे यह देखकर उलझन में थे कि वह उनकी ओर क्यों देख रही थी . जब डॉ0 शुक्ल ने अपना प्रश्न दोहराते हुए कहा , ''रंजना श्रीवास्तव , आप डाक्टर साहब की ओर क्यों देख रही हैं  ? मेरे प्रश्न का उत्तर दें  .''&lt;br /&gt;''जी , डाक्टर साहब मेरे निर्देशक थे .'' डॉ0 तिवारी की ओर इशारा करती हुई रंजना बोली थी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वह समझ पा रहे थे कि डॉ0 शुक्ल ने सोच-समझकर उस लड़की से वह प्रश्न किया था . शुक्ल को पहले से ही जानकारी रही होगी और बोर्ड के सभी सदस्यों को इस प्रकार वह इस बात से अवगत करवाना चाहते होगें . शायद उन्हें यह भी जानकारी रही होगी कि डॉ0 तिवारी रंजना श्रीवास्तव का ही चयन करना  चाहेगें .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभीप्सा के नाम का प्रस्ताव करने का विचार उन्हें त्यागना पड़ा था , क्योंकि डॉ. तिवारी डॉ. शुक्ल पर बरस पड़े थे . प्रवीण शुक्ल के पक्ष में बोल रहे थे और उनके तर्क थे कि जब रंजना श्रीवास्तव से अच्छे और उससे अधिक योग्य अभ्यर्थी हैं तब उसका चयन क्यो किया जाए !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ0 तिवारी और निकिता सिंह रंजना के पक्ष में अड़ गये . लगभग दो घण्टे तक बहस चलती रही . चाय के दो दौर समाप्त हो चुके थे  . निष्कर्ष के लिए शुक्ल और प्रवीण उनकी और हेड की ओर देखने लगे थे . हेड ने पूरी तरह मौन धारण किया हुआ था . शायद उन्हें पहले से ही यह ज्ञात था कि तिवारी अपने कंडीडेट के लिए सदैव की भांति अड़ेंगे . तिवारी के आड़े आना उन्हें उचित नहीं लगा . उन्होंने चुप का विकल्प चुन लिया था . तपिश बहुत देर तक अपने प्राध्यापकों और डॉ0 तिवारी के बीच छिड़ी बहस को सुनते रहे थे . उन्होंने विभागाध्यक्ष की ओर पुन: देखा . वह स्थितप्रज्ञ थे . अंतत: उन्होंने कहा , ''डॉ0 तिवारी , रंजना इस कॉलेज के लिए उपयुक्त नहीं रहेगी .... उसके बजाय आप किसी अन्य के नाम पर विचार करें तो अच्छा होगा  .''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मैं किसी और के नाम की संस्तुति नहीं करूंगा . यदि आप लोग करना भी चाहेगें तो मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा . ''डॉ0 तिवारी ने उबलते हुए कहा .&lt;br /&gt;''मैं भी नहीं करूंगा  .'' डॉ0 निकिता सिंह के स्वर में भी उत्तेजना थी  .&lt;br /&gt;और बोर्ड निरस्त कर दिया गया था .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;जब कांफ्रेंस रूम से वह बाहर निकले अंधेरा हो चुका था . चपरासी , सेक्शन अफसर , दो क्लर्कों के अतिरिक्त चौकीदार ही वहां थे . टयूबलाइट्स और पीले बल्बों की रोशनी कॉलेज परिसर में फैेली हुई थी . किसी से बिना कुछ कहे वह रिशेप्शन की ओर बढ़ गए . प्रवीण उनके पीछे लपके  , लेकिन दूर से ही सूना पड़े रिशेप्शन को देख वह उल्टे पांव लौट पड़े थे अपने चैप्बर की ओर  .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सर , मैंने आपसे पहले ही कहा था  .... हमें दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा सर  ..... छ: महीने लग जाएगें ... लेकिन.....''&lt;br /&gt;'हुंह....'' विचारमग्न स्वर में वह बोले , ''तो सभी चले गए ?''&lt;br /&gt;''कौन सर ?'' प्रवीण ने उनके पीछे चलते हुए पूछा .&lt;br /&gt;''कोई नहीं .'' &lt;br /&gt;और वह तेजी से अपने चैम्बर की ओर बढ़ गए थे  .&lt;br /&gt; ****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-801522844480932130?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/801522844480932130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=801522844480932130&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/801522844480932130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/801522844480932130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='कहानी-३३'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Tr-Vvcze4QA/TXJP13KN8nI/AAAAAAAAASI/KqWWwjtPsYI/s72-c/Balram-5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-7161855684170848433</id><published>2010-03-12T01:36:00.000-08:00</published><updated>2010-03-12T01:44:37.979-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी-३२</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S5oLSkTqXnI/AAAAAAAAAO0/wWowezG5mWU/s1600-h/cactus.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5447679112869731954" style="WIDTH: 98px; CURSOR: hand; HEIGHT: 87px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S5oLSkTqXnI/AAAAAAAAAO0/wWowezG5mWU/s200/cactus.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अभिशप्त  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;रूपसिंह चन्देल   &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;होश आने पर मुसने अपने को अस्पताल में पाया। आसपास मंडराती नर्सों और पंक्तिबद्ध बिस्तरों पर पड़े मरीजों ने उसके इस विश्वास को पूरी तरह पुख्ता कर दिया कि वह अस्पताल में ही है। लेकिन क्यों ? कैसे पहुंचा अस्पताल ! मस्तिष्क भली-भांति काम नहीं कर रहा था. आंखों के आगे चारों ओर काले-काले धब्बे-से उभरते-मिटरे महसूस हो रहे थे. उसने आंखें बन्द कर लीं और सोचने का प्रयत्न करने लगा-- क्या हुआ है उसे ? काफी देर सोचने के बाद भी उसकी समझ में कुछ नहीं आया. उसने करवट लेनी चाही, पैरों ने विद्रोह कर दिया. असह्य पीड़ा से वह छटपटा पड़ा . दो नर्सें दौड़ी आयीं।      &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;  "मिस जॉन---जल्दी----इंजेक्शन ----अच्छा---तुम इधरी रहना---मैं अभी आयी----। " दो महिला स्वर ----शायद नर्सें हैं। उसने अनुभव किया।    &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दर्द कुछ कम हुआ तो उसने आंखें खोलीं। देखा, एक नर्स खड़ी है। उसके पास ही आंसू बहाती पत्नी को देख वह और अधिक आश्चर्यचकित हो उठा। आंसू पोंछकर पत्नी उसके सिरहाने स्टूल पर बैठ गयी और पूछने लगी, "तबीयत कैसी है अब ?" "मैं यहां क्यों हूं, नमिता ?" किसी तरह वह पूछ सका।  नमिता की हिचकियां फिर बंध गयीं. नर्स ने डांट दिया, "तुम्हार  इस तरह रोने से मरीज का दिल घबराएगा." नमिता ने होंठ भींचपर आंखें पोंछ डालीं. दूसरी नर्स इंजेक्शन ले आयी थी. दोनों ने मिलकर उसकी बांह पर इंजेक्शन घोंप दिया और जाते-जाते नमिता को हिदायत देती गईं कि रोने की जरूरत नहीं है---कोई बात हो तो वे सामने बैठी हैं---आकर बता दे. इंजेक्शन से उसे राहत मिली. दर्द कुछ और कम हुआ तो उसने फिर करवट लेनी चाही, लेकिन नमिता ने मना कर दिया, "पैरों पर प्लास्टर चढ़ा है---ऎसे ही लेटे रहो." "प्लास्टर---?" अब वह समझ सका कि पैर क्यों नहीं हिल रहे. उसने कबल के नीचे हि नीचे छूकर देखा, गांठों के नीचे प्लास्टर था. "यह सच कैसे हुआ, नमिता? " "कल सुबह----दफ्तर जाते समय---बस से ." नमिता ने आंखें छिपाते हुए कहा, "वह तो अच्छा था कि तुम्हारे दफर के कोई सज्जन थे बस में ----उन्होम्ने तुम्हें यहां----औरमुझे खबर दी थी." एक दीर्घ निश्चास ले उसने आंखें बन्द कर लीं. धीरे-धीरे उस दिन सुबह का दृश्य मस्तिष्क-पटल पर उभरने लगा. ***** उस दिन जब वह आई.टी.ओ. के स्टाप पर पहुंचा, तो नौ बज चुके थे. पीछे से वह जिस बस से आया था, उसे शांतिवन के पास लगभग पन्द्रह मिनट रुकना पड़ा था. खबर थी कि एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष देसी नेताओं के साथ रजघाट पहुंचने वाले हैं. जब तक वे पहुंच न जाएगें, बस रुकी रहेगी. बाहर दोनों ओर फुटपाथों पर तैनात पुलिस दोनों देशोम के नेताओं की सुरक्षा का भार वहन करने की कल्पना से गौरवान्वित अनुभव करती दिखाई दे रही थी और बस के अन्दर यात्री दफ्तर पहुंचने में हो रहे विलम्ब के लिए व्यवस्था को कोस रहे थे. कुछ खुलकर तो कुछ मन ही मन. वह भी उनमें शामिल था और मन ही मन ;सोच रहा था आज निश्चित ही उसके हाजिरी के कोष्ठक में प्रशासनिक अधिकारी निर्ममतापूर्वक लाल स्याही से ’एल’ यानी ’लेट’ ;आनी ’विलम्ब’ लगा देगा और विलम्ब से पहुंचने के उसके कारण को अनुसुना कर बनैले सुअर की तरह उसे घुड़कते हुए ’इनीशियल’ के नीचे समय डाल देने के लिए कहेगा. प्रशासन महीने मेम दो विलम्ब तो प्रार्थना करने पर माफ कर देता है, लेकिन दो से ऊपर होने पर ’आकस्मिक अवकाश’ की कटौती शुरू कर देता है. "पांच दिन का सप्ताह करने का निर्णय व्यक्तिवादी और एक्पक्षीय है---पत्थरों की ऊंची दीवारों के अन्दर बैठकर जीवन की तमाम निश्चितंताओं को भो़गते हुए ऎसे अव्यावहारिक निर्णय लेने वालों को क्या पता कि कर्मचारियों का जीवन अब मात्र  दफ्तर में ही सिमटकर रह गया है. सुबह पांच बजे से रात आठ बजे तक का समय वह दह्तर के लिए खर्च कर देता है, शेष में से कितना समय वह दे पाता है अपने परिवार को----." "ऊपर से खाज की कोढ़ की तरह ’पे कमीशन’ की रपट के लिए बनी ’रिव्यू कमेटी’ की सिफारिश पर आधा घंटा समय और बढ़ाकर सरकार ने अपनी बौद्धिक कुशलता का परिचय दिया है. नौकरी देकर सरकार ने जो उपकार आप सब पर किया है उसके बदले बैठो दफ्तर में सुबह से शाम छः बजे तक----काम भले ही न करोम लेकिन बैठना पड़ेगा--- क्योंकि राष्ट्र की प्रगति आपके जिम्न्मे है---" "और मौजमस्ती उनके जिम्मे----टूर प्रोग्राम के नाम पर करोड़ों उड़ा रहे हैं----." हा---हा----हा---एक ठहाका उससे आगे सीट अप्र गूंजा तो वह चौंक उठा.  "यह भी कोई कहने की बात है. अगर तौफीक हो तो दस-बीस लाख रुपए खून करके ---दस-पन्द्रह की हत्या करवाकर आप भी उनके बीच क्यों नहीं पहुंच जाते----पांच साल तो मस्ती लोगो ही----बाद में पेंशन---किसने कहा था बाबूगिरी करने के लिए." "देखो, कोई कुछ भी कहे----मैं तो यह मानता हूं कि नए चोले में सामन्तशाही शासन-व्यवस्था आज भी कार्यरत है---नहिं तो इस प्रकार के निर्ण्रय का शिकार आम आदमी क्यों होता रहता." "अरे भाई----आप अब इक्कीसवीं सदी में जा रहे हैण न---! "एक और ठहाका. "इद्दीसवी में जाने के बजाए अठरहवी में जा पहुंचेगे----सोचने की बात है----आप में कितने ही ऎसे हैं जो दिल्ली मं ही रहकर साढ़े नौ बजे दफ्तर पहुंचने के लिए सुबह साढे़ छः बजे घर से निकलते हैं और रात साढ़े आठ -नौ बजे घर वापस पहुंचते हैं. न तो सुबह बच्चों को समय दे पाते हैं और न शाम. काम काजी महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है---शनिवार और अरविवार के दिन घरेलू कामों और थकान मिटाने में खर्च हो जाते हैं----आप बच्चों की ओर ध्यान नहीम दे पाते---- उन्हें पढ़-लिखा नहीं सकते---वे पढ़ने में कमजोर होते जाएगें. ---आवारा होंगे और जब एक समग्र पीढ़ी बौद्धिक रूप से पंगु हो जाएगी तब देश कहाम जाएगा---बीस प्रतिशत लोगों के बच्चों के बल पर इक्कीसवीं सदी में पहुंचने की कल्पना करना बौद्धिक दिवालिएपन के अतिरिक्त कुछ नहीं है." एल ने लंबा भाषण दे डाला तो क्षण भर के लिए बस में सन्नाटा छा गया. "भाई साहब, यह सब पूंजीवाद बनाम नेतावाद और अफसरवाद का एक नियिजित षड्यंत्र है----वे आम आदमी को इतना व्यस्त रखना चाहते हैं, जिससे वह उनकी कारगुजारियों के बारे में सोच न सके---क्योंकि यदि उसे सोचने का वक्त मिलता है तो उसके सोच का दूरगामी परिणाम क्या हो सकता है----इसे ’वे’ भली-भांति जानते हैं---- इसीलिए उसे रोटी, कपड़ा आदि जरूरत की चीजें जुटाने---खा-पीकर सो जाने में ही वे व्यस्त रखना हितकर समझते हैं." "लेकिन भावी पीढ़ी का---." "अरे, आप इतना भी नहीं समजते---" एक ने बीच में ही उसे टोका, "यह तो उनकी प्रारंभिक नीति ही है कि बाबू का बेटा बाबू ही बने---- और पिता की तरह ही जीवन से जूझता हुआ अपने बेटे को बाबू बनाने के साधन जुटाता रहे---तभी तो संगमरमरी दीवारों के भव्य भवनों में सदियों तक वे और उनकी संतानें सुरक्षित रंगरेलियां मनाती रह सकती हैम----दरअसल हम सब अभिशप्त हैं उनके हाथ का खिलौना बनने  के लिए." "शायद आप ठीक कह रहे हैं---नहीम तो विदेशों में भी पांच दिन का सप्ता है, लेकिन वहां कार्य के घंटे इतने अधिक नहीं----अपरान्ह के बाद सभी अपना समय अपने ढंग से व्यतीत करते हैं ---अधिक समय दफ्तर में बैठाकर अधिक काम नहीं करवाया जा सकता." "हाई, वे इस मनोवैज्ञानिक सत्य को झुठलाने की कोशिश कर अरहे हैं कि अपनी कार्यक्षमता से अधिक कोई भी काम नहीं कर सकता---." अचानक लोग शाम्त हो गए. बाहर वाहनों की चीख-पुकार शुरू हो गयी थी. राष्ट्राध्यक्षा शायद राजघाट पहुंच चुके थे. बस धीरे-धीरे रेंगने लगी तो उसे भी कुछ राहत महसूस हुई थी. ****आई.टी.ओ. पहुंचकर उसने समज लिया कि अब वह समय पर दफ्तर नहीख्म पहुंच सकता. फिर भी यह उसकी इस माह की दूसरी ’लेट’ होगी, सोचकर बस की प्रतीक्षा करने लगा. बार-बार घड़ी पर उसकी नजर चली जाती और तेज चलती सेकंड की सुई के साथ ही उसकी बेचैनी भी तीव्र हो उथती. नौ बजकर दस मिनट के लगभग बस आती दिखाई दी. भीड़ में धक्कम-धक्का शुरू हो गया. भैंस की तरह हांफती हुई बस आकर रुकी तो वह लोगों को धकियाता हुआ लपका. बस इतनी भरी हुई थी कि लोग पहले से ही डंडे पकड़े लटक रहे थे. एक बार उसकी इच्छा हुई कि छोड़ दे उस बस को---दूसरी से चला जाए. अधिक देर होगी तो आधी सी.एल. ले लेगा. लेकिन तत्क्षण याद आया कि ’सी.एल." भी तो एक ही है और अभी शेष हैं दो महीने. किसी प्रकार एक पैर टिकाकर वह भी एक डंडे के सहारे लटक गया. बस किसी गर्भवरी महिला की भांति धीरे-धीरे रेंगने लगी तो उसे लगा कि लटककर जाना जोखिम भरा है---अभी भी वक्त है--- या तो वह कूद जाए या ऊपर हो ले. बस गति पकड़ती जा रही थी, इसलिए कूदना संभव न था. वह एक हाथ से गेट पर खड़े लोगों को अन्दर की ओर धकियाने लगा, जिससे वह कुछ ऊपर हो सके. लेकिन लोग इस तरह ठुंसे थे कि कोई हिल तक न रहा था. इसी प्रक्रिया में वह सन्तुलन खो बैठा---और---और सड़क पर जा गिरा. उसके बाद उसे होश नहीं रहा . "डॉक्टर कह रहे थे , आपके दोनों पैरों में फ्रैक्चर हो गया है---ठीक होने में दो महीने लग जाएगें." नमिता उसके सिर पर हाथ फेरती हुई कह रही थी.  वह कुछ नहीं बोला. केवल नमिता की ओर देखता रहा  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;(१९८७)  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; ******         &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-7161855684170848433?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/7161855684170848433/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=7161855684170848433&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/7161855684170848433'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/7161855684170848433'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='कहानी-३२'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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खेतों की मेड़ों से गुजरती वह पगडंडी गड़हा नाला पार कर हिरनगांव स्टेशन तक जाती थी । स्टेशन बंबे से बमुश्किल एक मील था ।&lt;br /&gt; पगडंडी पर उतरने से पहले कुछ देर पुल पर खड़ा सोचता रहा था , 'पगडंडी से जाना ठीक होगा या सड़क के रास्ते ।' खतरा दोनो ही ओर हो सकता था । 'वह' कब कहां टकरा जाए , कहना कठिन था । पुल के नीचे बंबा जहां विराम लेता था , तीन आदमी फावड़ों से कुचिला मिट्टी इकट्ठा कर रहे थे । पगडंडी से कुछ हटकर बैलगाड़ी खड़ी थी । नहर में पानी नहीं था और सड़ी मछलियों और कूड़े की गंध से नथुने फटने लगे थे । सोचा , उन लोगों से पूछ लेना चाहिए.... कोई गया तो नहीं पगडंडी के रास्ते , लेकिन मैं अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहता था । चुप रहा ।&lt;br /&gt;रज्जू के बाग के पास पतली नाली थी, जिससे बहकर बंबे का पानी पांडुनदी में जाता था । नाली के दोनों ओर शीशम के पेड़ थे । पेड़ों के तनों से सटी झाड़ियों के झुरमुट थे । बाग के बीच खिरनी का बूढ़ा पेड़ था । बचपन में उसकी पीली खिरनियां चोरी करते कितनी ही बार हमने रज्जू से डंाट खाई थी । मौसम होने पर भी पेड़ खाली फल रहित किसी पादरी की भांति खड़ा था । अभी सुबह के नौ ही बजे थे , किन्तु गर्मी की तपिश महसूस होने लगी थी । खिरनी के पेड़ के पास रुककर पसीना पोंछा । चारों ओर नजर दौड़ाई । कोई आता-जाता नहीं दिखा । दूर-दूर तक नंगे खेत खडे थे । सड़क के किनारे एक खेत में कुछ जानवर ठूठियां चिंचोड़ते दिखे । मेरी दृष्टि शीशम के पेड़ों के पास झाड़ियों की झाुरमुट पर फंस गई । सिर को झटका--'कितने पुराने हैं ये शाीशम के पेड़....तपस्वियों की भांति मौन-निर्द्वंद्व खड़े ।' मन को भयमुक्त करने के लिए ध्यान को शीशम के दरख्तों पर केन्द्रित करना चाहा , किन्तु रह-रहकर आंखें झाड़ियों के अंदर कुछ टटोलने लगतीं । पैर आगे बढ़ने से इनकार करने लगे । लगा खतरा मात्र दस कदम दूरी पर है । एक बार फिर इधर-उधर देखा , इस आशा से कि शायद कोई राहगीर दिखाई दे जाए , लेकिन सर्वत्र सन्नाटा । लगा , सभी ने पहले से ही खतरे को पहचान लिया था । अपने पर कोफ्त हुई । 'मुझे क्या पड़ी थी खेत देखने आने की और वह भी जून की प्रचंड तपिश में.... जब खेत खाली थे ।' लेकिन , शहर से चलते समय ही मन में एक योजना थी .... आने वाली बरसात में गड़हा नाले के साथ के खेतों को सममतल करवाकर मेड़ें बंधवाने की । अभी देखकर काम और खर्च का आकलन आवश्यक था । बटाईदार की सूचना पर भरोसा नहीं था । गांव से उखड़कर शहर में जा टिकने वाले मुझ जैसे लोगों की यह विवशता होती है .... जब अवसर पाया गांव आए और एक-दो दिन टिककर खेत-खलिहान का हिसाब निबटाया , बटाईदार को काम सौंपा और फिर चार-छह महीनों के लिए गायब । न गांव का मोह त्याग पाते हैं और न शहर की जिंदगी । त्रिशंकु की भांति बंटी जिंदगी जीते लोग.... गांव आते ही कम समय में अधिक काम निबटा लेने की चिंता से ग्रस्त ।&lt;br /&gt;क्षण मात्र के लिए झाड़ी से हटा दिमाग उसमें हो रही हलचल से फिर वहीं स्थिर हो गया । लगा 'वह' मुझे ही निशाना बनाकर पोजीशन ले रहा है । हो सकता है , बीच का जामुन का पेड़ उसके लिए व्यवधान बन रहा हो । मुझे इस बात का लाभ उठाना चाहिए । खिरनी के पेड़ की ओट में जाकर नाक की सीध में गंगुआ तेली के बगीचे की ओर से सड़क की ओर भाग लेना चाहिए । सड़क पर तो लोग आ-जा रहे ही होंगे । सब मेरी तरह मूर्ख थोड़े ही हैं । अब यही एक उपाय था कि मैं उसके संभावित हमले से अपने को बचा सकता था । झाड़ी में अभी भी खुरखुराहट जारी थी और मेरा मस्तिष्क तीव्र गति से निर्णय के लिए सक्रिय हो उठा था , लेकिन तभी एक चित्तकबरा कुत्ता झाड़ी से सिर उचकाता दिखाई दिया । दिमाग ठहर गया , लेकिन मन आश्वस्त नहीं हुआ ।&lt;br /&gt;'उसकी कोई चाल हो सकती है ।'&lt;br /&gt;मेरे बटाईदार गणपत ने गांव में घुसते ही उसके विषय में जो कुछ बताया था , वह थर्रा देने वाला था ।&lt;br /&gt;'अपने शिकार पर' , गणपत ने कहा था  , 'जिस पर वार करता है उसे 'वह' शिकार ही कहता है .... और अपने शिकार पर वह इस खूबसूरती से झपटता है , जैसे तेंदुआ .... बचाव के लिए समय तक नहीं देता । आदमी सोच भी नहीं सकता कि दुबला-पतला , मरियल-सा दिखने वाला 'वह' इतना खतरनाक हो सकता है ।'&lt;br /&gt;'पेशेवर है ?'&lt;br /&gt;'न भइया ....भले घर का भला लड़का .... लेकिन....।'&lt;br /&gt;'लेकिन क्यों ?'&lt;br /&gt;गणपत चुप रहा तो मैंने टोका , 'चुप क्यों हो गए !'&lt;br /&gt;मेरी ओर देखता हुआ वह बोला , 'वही हर गांव की एक ही कहानी .....फूलत-फलत घर अउर पढ़त -लिखत लड़का गांव के खुड़पेंची लोगन की आंखन मा चुभेै लागत है । उई चाहत हैं कि सबै उनकी तरह गंवार-पिछड़े रहैं .... बस , यही बात ओहके साथै भई । ऊ लड़का गांव-वालेन के षडयंत्र का शिकार हुआ अउर अब .... ओह उनके खातिर खरनाक होई गवा है । हिरनगांव के पांच लोगन को निशाना बना चुका है ।'&lt;br /&gt;मैं सोचने लगा था गांवों के बदलते चरित्र के विषय में । चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले का गांव आंखों के समक्ष उभरने लगा था । वीरभद्र तिवारी का बड़ा बेटा हरीश जब आठवीं की बोर्ड परीक्षा में जिले में तीसरा स्थान पाकर उत्तीर्ण हुआ तो सारे गांव ने उसे सिर माथे पर बैठाया था । हरीश आठवीं से आगे पढ़ने वाला गांव का पहला लड़का था । तिवारी गरीब ब्राम्हण थे .... कथा-पत्रा बांच गुजारा करने वाले । बेटे को भी अपनी भांति ही बनाना चाहते थे , किंतु गांव वालों ने उन्हें वैसा नहीं करने दिया था । जगत सिंह ने हरीश का बारहवीं तक का खर्य ओढ़ लिया था । गांव पंचायत ने भी खर्च उठाने का जिम्मा ले लिया था । दो वर्ष तक हरीश ने सहायता ली , उसके बाद उसने टयूशन कर ली थी । हरीश पढ़कर इनकमटैक्स अधिकारी बना तो, गांव के हर घर को लगा था कि उनके घर का ही कोई लड़का अफसर बना है । उस दौरान हरीश से प्रेरण ले कई लड़के आगे आए थे और शहर जाकर अच्छी नौकरियों से जुड़े थे , लेकिन कुछ वर्षों तक ही चला था यह सिलसिला ।&lt;br /&gt;'अब तो 'वह' हर उस आदमी पर झपटने लगा है , जेहके पास कुछ होंय की उम्मीद होती है ।' गणपत बोला तो मै अचकचाकर उसकी ओर देखने लगा । 'आप आए हौ तो खेतन की तरफ जरूर जइहौ ।'&lt;br /&gt;मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया । &lt;br /&gt;'संभल के जायो भइया....।'&lt;br /&gt;'क्यों मुझे उससे क्या खतरा ! वह तो मुझे जानता भी नहीं....फिर ?'&lt;br /&gt;'बतावा न ....।' कुछ रुका गणपत, 'अब सही-गलत की समझ नहीं रही ओहका । अउर लरिका ही तो ठहरा । उमिर ही का है ओहकी.... अठारह-उन्नीस । शुरू मां अपने गांव के उन लोगन को ही निशाना बनाया उसने, जिनके कारण ओहका यो राह पकड़ैं का पड़ी । पर ऊ सब ठहरे काइयां .... कई सरकि गए इधर-उधर । कुछ ते उसने मोटी रकमें उगाही .... पर अब ....अब  रुपिया की कीमत अउर मौज-मस्ती की आदत....कुछ दिन ते उसने कई अपरिचितन पर भी हमला बोला ....मझगांव के ओहकी उमिर के तीन लरिका अब ओहके साथ मिलि गए हैं । ऊ तो पहले ते ही बदमाश रहैं ... अब ओहके साथ उनकी नफरी अधिकौ बन रही है । लेकिन ,दिन मां 'वो' रहत अकेले ही है अउर वारदात भी अकेले ही करत हैं ....।'&lt;br /&gt;कुत्ता झाड़ी से निकलकर पगडंडी पर स्टेशन की ओर चल पड़ा था । मुझे ऐसा लगा ,जैसे कोई बड़ा हादसा होते-होते टल गया है । दिल की धड़कन धीमी होने लगी थी । शीशम के पेड़ के नीचे की झाड़ियां शांत दिखीं--स्थितप्रज्ञ । बंबे के पुल पर उन तीनों आदमियों का शोर सुनाई पड़ा । कुचिला मिट्टी से भरी बैलगाड़ी पुल पर चढ़ नहीं पा रही थी । दो आदमी पीछे से गाड़ी को धकिया रहे थे और तीसरा बैलों को औगी से हांक रहा था और बैल कंधे झुकाए पूरी ताकत लगाकर एक कदम आगे बढ़ाते तो दो कदम पीछे खिसक जाते ।&lt;br /&gt;सामने ठुंठियाये खेतों पर नजर डाली । दूर-दूर तक खाली मैदान दिखा । गर्मी का प्रभाव बढ़ गया था और खेतों पर लहलहाती धूप आंखों में चुभ रही थी । हवा सनाका साधे हुए थी ।&lt;br /&gt;पगडंडी पर निर्द्वंद्व बढ़ता कुत्ता आंखों से ओझल होता जा रहा था । पास के आम के पेड़ पर&lt;br /&gt;कोयल कूक रही थी और मैं खेतों पर जाने-न-जाने के उहापोह में अभी भी फंसा हुआ था ।&lt;br /&gt;'उसका' भय मन में घर कर चुका था । खतरा टला नहीं था ।&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;हिरनगांव के जिस घर का था 'वह' , गणपत के बताते ही उस घर के सदस्यों के चेहरे मेरी आंखों के सामने तैरने लगे थे । तीन भाइयों का परिवार था वह । शीतल ,शिवमंगल और शिशुपाल पांडे । हिरनगांव में ही नहीं आस-पास के दस गांवों में वह 'पांडे परिवार' के नाम से जाना जाता था । उनके खेत स्टेशन से लगे हुए थे और उनमें अच्छी पैदावार होती थी । शीतल पांडे बजाजी करते थे और सप्ताह में दो बार पुरवामीर की बाजार में दुकान लगाते थे । मेरे घर के कपड़े उन्हीं की दुकान से आते थे और इसी कारण मैं उनके परिवार के विषय में जानता था । शीतल ने छोटे स्तर पर बजाजी शुरू की थी । साइकिल पर कपड़े लादकर बाजार आने वाले पांडे ने व्यावसायिक कुशलता और व्यहवार के कारण कुछ ही वर्षों में तांगा खरीद लिया था । व्यापार चल निकला था, लेकिन शीतल नि:संतान थे । इसका उन्हें दु:ख भी नहीं था , क्योंकि उनके दूसरे भाई शिवमंगल के दो लड़कियां थीं । शिशुपाल के भी लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई थी । शिवमंगल की लड़कियां सभी की संतानें थीं ।&lt;br /&gt;शिवमंगल पांडे दुधाई करते अैर शिशुपाल खेती । शिवमंगल सुबह फतेहपुर -कानपुर शटल से दूध  लेकर कानपुर जाते और शाम आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से लौट आते । कुछ देर शिशुपाल के साथ खेतों में काम करवाते और दोनों भाई शाम ढलते घर लौटते । विवाह के लगभग पंद्रह वर्ष पश्चात शिशुपाल के पुत्र हुआ । घर मे इकलौता बेटा । सभी की नजरें उसी पर । एकमात्र वंशबेल । कोई कमी न रहे पालन-पोषण से लेकर शिक्षा तक और संजय ने भी उन्हें निराश नहीं किया । इसी वर्ष इंटरमीडिएट में उसने जो सफलता प्राप्त की, वह आशा से कहीं अधिक थी और गांव के कुछ लोगों को उसकी यही सफलता चुभने लगी । उन्होंने उसके जीवन में जहर घोल दिया ।&lt;br /&gt;वैसे तो पांडे परिवार की संपन्नता ही गांव के कुछ लोगों की आंखों की किरकिरी बनी हुई थी । गांव में सफल और संपन्न जीवन जीने के लिए जो बातें आवश्यक हो गई हैं , पांडे लोग उनसे कोसों दूर थे । वे सीधी-सादी जिंदगी जी रहे थे । वह नहीं भांप पाए लाला अमरनाथ श्रीवास्तव के मनोभावों को । लाला कुछ वर्षों से राजनीति में सक्रिय थे । ग्राम प्रधान का चुनाव हुआ तो लाला भी प्रत्याशी थे । समर्थन के लिए पांडे के दरवाजे गए थे हाथ जोड़कर । चार लठैत साथ थे । लाला जानते थे कि जिसको पांडे का समर्थन मिलेगा, वहीं जीतेगा , क्योंकि पांडे परिवार की गांव में पुरानी प्रतिष्ठा शेष थी और आज भी लोग उनकी बात मानते थे । &lt;br /&gt;लाला अमरनाथ के पिता हिरनगांव के जीमंदार अयोध्या सिह के कारिंदा थे । जमींदार कानपुर में रहता था और गांव में एक प्रकार से लाला के पिता की ही जमींदारी चलती थी । उनकी नीतियों के कारण गांव वालों के मन में वह कभी नहीं चढ़े । जमींदारी खत्म हुई तो वह महाजन बन गए । सूद पर रुपया देकर मनमाना वसूलने लगे । लाला बड़े हुए तो पिता के व्यवसाय को आगे बढ़ाया । गरीब किसानों को लूटकर धन कमाया तो दर्ुव्यसनों के शिकार होना स्वाभाविक था । सूद का व्यवसाय एक दिन बंद हुआ तो लाला अमरनाथ ने आटा चक्की लगा ली । खुलकर खर्च करने वाले लाला सीमित आय में फड़फड़ाने लगे । उनकी नजर ग्राम प्रधानी पर जा टिकी, जिसका दोहन वह कर सकते थे । लेकिन उसके विरोध में कल्लू चमार प्रत्याशी बन गया । गांव में हरिजनों के आधे से अधिक वोट थे । &lt;br /&gt;'मंडल' के बाद हरिजनों में जो चेतना आई थी , उससे वे अपने अधिकार पहचानने लगे थे । कल्लू को पांडे परिवार का मौन समर्थन है , यह खबर लाला अमरनाथ को थी । अनेक बार मिलने पर भी लाला को जब पांडे परिवार से समर्थन का स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला , तब एक दिन मन के असंतोष को शब्द देते हुए वह बोला था ,''पंडित जी, इस बात को याद रखूंगा ।' &lt;br /&gt;चुनाव में कल्लू चमार जीता । पांडे के प्रति मन में गांठ पड़ गई थी लाला के । लेकिन पांडे परिवार लाला की मन की गांठ को भांप नहीं पाया । वे सहज थे -- निश्चिंत-निर्द्वंद्व । तभी वह घटना घटी थी । संजय एक शाम लाला की चक्की पर गेहूं पिसवाने गया । हिंगवा बौरिया भी ज्वार पिसवाने आया था ।  लाला उसे दो किलो आटा कम तोल रहा था । हिंगवा को दी पर्ची में लाला ने दो किलो कम लिखा था । हिंगवा अड़ गया । लाला ने उसके पिसान की बोरी सड़क पर फेंक दी और उस पर पिल पड़ा । &lt;br /&gt;संजय से बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने लाला को पीछे से दबोच लिया और हिंगवा को उससे मुक्त किया । संजय की मजबूत पकड़ से लाला तिलमिलाकर रह गया था । संजय पर आग्नेय दृष्टि डाल लाला चीखा था ,'पांडे पुत्र तुमने मुझे पकड़कर अच्छा नहीं किया....।'&lt;br /&gt;'चाचा गरीब पर हाथ चलाना मर्दानगी नहीं ?'   &lt;br /&gt;'कल का छोकरा मुझे बताएगा कि मर्दानगी क्या होती है ...तू मूझे बताएगा ।' लाला का चेहरा क्रोध से विकृत हो उठा था ।&lt;br /&gt;लाला चीख ही रहा था कि दिन भर उसकी चक्की पर पत्ते खेलने और ठर्रा पीने वाले पांच लोग लाठी थामे आ धमके थे ।&lt;br /&gt;'का हुआ लाला....काहे चीख रहे हो ?' सभी ने एक स्वर में कहा ।&lt;br /&gt;'होना क्या है ...यो पांडे पुत्र ने अच्छे नंबरों से इंटर क्या पास कर लिया, अभी से अपने को कलक्टर समझने लगा है ......जानता नहीं कि लाला एक दिन में कलक्टरी पीछे के रास्ते निकाल देता है ।'&lt;br /&gt;'अरे मुंह तो हिलाओ लाला ....कहो तो अबहीं......।'&lt;br /&gt;'नहीं .....हम खुद ही देख लेंगे ।' लाला साथियों का बल पा अहंकार भरे स्वर में बोला ।&lt;br /&gt;संजय चुप रहा और अपना पिसान हिंगवा को देकर घर चला गया था ।&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;और संजय ने जो नहीं सोचा था, वह हुआ था । किसी काम से वह नरवल जा रहा था साइकिल से कि बीच रास्ते में पुलिस ने उसे रोका था । इंस्पेक्टर के साथ तीन सिपाही थे । संजय ने उस इंस्पेक्टर को कई बार लाला अमरनाथ की चक्की पर देखा था । उसे थाने ले जाकर 'लॉकअप' में डाल दिया गया था । केस बनाया गया था उसके पासे से स्मैक बदामद होने का । खबर मिलने पर सिर पीट लिया था पांडे परिवार ने । तीनों भाइयों के लिए यह हिला देने वाली खबर थी । 'क्या उनका संजय ऐसा कर सकता है ?' वे नहीं सोच पा रहे थे । उन्हें गत दिनों लाला के साथ संजय के विवाद की भनक भी न थी । संजय ने लाला की धमकी को गंभीरता से नहीं लिया था । वह भी इसलिए कि एक सप्ताह बाद वह पढ़ने के लिए शहर जाने वाला था । उसने सोचा था कि लाला का गुस्सा उसके गांव से जाते ही ठंडा हो जाएगा , लेकिन....।&lt;br /&gt;कल्लू चमार के साथ तीनों पांडे थाने गए थे । पांच हजार देने के बाद संजय छूट पाया था । संजय का इतनी जल्दी छूट जाना लाला अमरनाथ के लिए चुनौती थी । उसे थानेदार को दिए अपने दो हजार रुपए व्यर्थ होते दिख रहे थे । वह दौड़ा गया था थाने और दोबारा मुट्ठी गरमा आया था थानेदार की । पुलिस आ धमकी थी गांव में तीसरे दिन ही । इस बार संजय पर केस बना था रिवाल्वर रखने और पड़ोसी गांव में रात पड़ी डकैेती में शामिल होने का । संजय तीन दिन बंद रहा थाने में । यातना भी दी गई थी उसे लगातार । इस बार दस हजार डकार गया था थानेदार । संजय को छोड़ते समय उसने शर्त लगाई थी कि वह एक महीने तक गांव छोड़कर कहीं नहीं जाएगा और सप्ताह में दो बार थाने में हाजिरी देगा ।&lt;br /&gt;'हुजूर उसकी साल भर की पढ़ाई...।' तीनों पांडे गिड़गिड़ाए थे ।&lt;br /&gt;'मैंने जो कहा.... अगर आपने नहीं सुना तो बताइए ...! ' खुंखार हो उठा था थानेदार ।&lt;br /&gt;संजय को चुप ले आए थे पांडे ।&lt;br /&gt;उसी रात लाला की चक्की पर गांव के कुछ लोग इकट्ठा हुए थे । मुर्र्गे कटे थे और बोतलें खुली थीं ।&lt;br /&gt;'अच्छा सबक दिया स्साले को तुमने लाला ....बड़ा बनता था ।' ठहाकों के साथ जाम टकराए थे और जुबानें लड़खड़ाई थीं । &lt;br /&gt;और उसी रात संजय ने अपना पहला निशाना साधा था लाला अमरनाथ के भतीजे पर । रिवाल्वर खाली कर दी थी । आंखों के समक्ष पसरे अंधेरे भविष्य ने उसे विचलित कर दिया था । वह जान चुका था कि गांव में पुलिस अब उसे चैन से न बैठने देगी । और अपनी दुर्दसा के लिए जिम्मेदार लोगों के लिए वह रात के अंधेरे में घर से निकल पड़ा था । &lt;br /&gt;संजय लाला की चक्की तक पहुंचता इससे पहले ही भतीजे की खबर मुर्गा चीथते-बोतलें खाली करते लोगों तक पहुंच गई थी । हड़कंप मच गया था । लोग भाग निकले थे, लेकिन तब भी दो को निशाना बना ही लिया था उसने । उन्हें घायल छोड़ वह लाला को ढूंढ़ता रहा था । लाला पुआल के नीचे छुप गया था । &lt;br /&gt;उसके बाद लाला अमरनाथ और उसके साथियों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था संजय । पुलिस ने पांडे परिवार को संजय की ओट में जमकर लूटा , किंतु उसे संजय हाथ नहीं आया । पता चलने पर पुलिस संजय को स्टेशन की ओर खोजने जाती , जबकि संजय गांव में लाला के किसी साथी पर निशाना साध रहा होता । पुलिस लौटती तब तक संजय गायब हो चुका होता ।&lt;br /&gt;गणपत ने कहा था , 'दो महीने से लुका-छुपी का खेल चल रहा है भइया । गांव की राजनीति ने पांडे को तो तबाह ही कीन्हेसि अउरो घर बर्बाद हुई गए । अउर....।' लंबी सांस खींची थी उसने , 'बदले की आग मा संजय ने जो किया सो तो समझ मा आवत है भइया ....पर राह चलत लेगन को लूटि लेहिसि ...यो ठीक न करी...।' गणपत  का स्वर विचलित था ।&lt;br /&gt;'जब आदमी गलत काम करने लगता है....वह धीरे-धीरे विवके खोता चला जाता है । संजय के साथ भी ऐसा ही हुआ है ।' &lt;br /&gt;गणपत मेरी ओर देखता रहा था ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;रज्जू पासी के बाग से कुछ कदम आगे बढ़ा ।  दिमाग में विचार तीव्र गति से दौड़ रहे थे और उतनी ही तीव्र गति से नजरें खेतों में कुछ खोज रही थीं । रह-रहकर पीछे मुड़कर देख लेता था । एक पक्षी सामने से तेजी से उड़कर निकला तो अचकचा गया । पैर मेड़ से फिसल गया । गिरते बचा । संभला , पसीना पोंछा और धाीरे-धाीरे कदम धसीटने लगा । तभी देखा वह चित्तकबरा कुत्ता वापस लौटा आ रहा था । &lt;br /&gt;'अवश्य आगे कुछ खतरा है । कुत्ता उस संजय को देख वापस लौट पड़ा है । जानवर खतरा भांप लेते हैं ।'&lt;br /&gt;कुछ देर खड़े सोचता रहा । आगे बढ़ना कठिन लगा । तभी पीछे शीशम के नीचे झाड़ियों में खुरखुराहट हुई । क्षण भर सोचा , फिर गांव की ओर मुड़कर कुछ देर सधे पैेरों चला । रज्जू पासी का बाग पार हेते ही दौड़ पड़ा । घर पहुंचकर ही राहत मिली । &lt;br /&gt;दोपहर बाद  गणपत ने  आकर बताया , 'भइया दोपहर पुलिस के साथ मुठभेड़ मा संजय मारा गया । स्टेशन के पास खेतन मा हुई मुठभेड़....भइया बड़ा बुरा हुआ पांडेन के साथ ।' गणपत दुखी था ।&lt;br /&gt;गणपत की  बात का  उत्तर न देकर मैं सोचने लगा था कि अब खेतों की ओर जाना निरापद रहेगा ।&lt;br /&gt;*****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-3724345801552203062?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/3724345801552203062/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=3724345801552203062&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3724345801552203062'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3724345801552203062'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2010/01/blog-post_16.html' title='कहानी-३१'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S1GmRHhbfwI/AAAAAAAAAOU/WVmirELkZ9Q/s72-c/b%27ful+pic+4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-477337875270803032</id><published>2010-01-15T20:03:00.001-08:00</published><updated>2010-01-15T20:08:47.826-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी-३०</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S1E6vVjv1zI/AAAAAAAAAN8/vlZ48OpQnvI/s1600-h/100_2172.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5427183610873501490" style="WIDTH: 115px; 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'' आजाद भारत की प्रति युवक से लेती हुई शालिनी बोली और युवक को दरवाजे पर खड़ा छोड़ दरवाजा बंद कर लिया .&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;वह चुप हैं और चुप होने का कारण पूछने पर भी उन्होंने शालनी को नहीं बताया . &lt;br /&gt;एक और समय वह चुप रहने लगे थे , लेकिन बिल्कुल चुप नहीं थे ।  तब  उनके स्कूटर ने उनके अंदर उथल-पुथल मचा रखा था . चार वर्षों से वह उनके गैराज में खड़ा था . बेटे के लिए उसे खरीदा गया था . बेटा उससे कॉलेज जाता ....दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग , जहां से वह इंजीनियरिंग कर रहा था . इंजीनियरिंग कर वह चार साल पहले एम.एस. करने अमेरिका चला गया और एम.एस. कर वहीं नौकरी करने लगा . बेटे के जाने के बाद स्कूटर को गैराज में बंद करने के बाद न उन्हें गैराज खोलने की आवश्यकता अनुभव हुई और न ही स्कूटर का खयाल आया . दरअसल बेटे के लिए उन्होंने नहीं शालिनी ने उसे खरीद दिया था . उनके यहां स्कूटर है यह अनुभूति उन्हें तब होती जब कभी -कभार उसे वह गेट के बाहर खड़ा देखते . वैसे होता यह था कि जब वह सुबह नौ बजे सोकर उठते बेटा कॉलेज के लिए जा चुका होता था . शालिनी विदेश मंत्राालय में सहायक निदेशक राजभाषा थी और वह भी कार्यालय जा चुकी होती थी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुशांत , जिनका पूरा नाम शुशांत राय था , उठते , अंगड़ाई लेते , खिड़की से झांककर सड़क की आमद-रफ्त का जायजा लेते हुए दाढ़ी पर हाथ फेरते , जिसकी वह बहुत साज-संवार करते थे , फिर बिस्तर छोड़ किचन में जाते , जहां शालिनी थर्मस में उनके लिए चाय बनाकर रख जाती थी .&lt;br /&gt;चाय पीते हुए वह दिन के अपने कार्यक्रम पर विचार करते . अखबार पर सरसरी दृष्टि डालते और विशेषरूप से दुर्घटनाएं , हत्या , बलात्कार और लूट-पाट की खबरें पढ़ते . ये खबरें उन्हें चिन्ता में डाल देतीं . वह अपने को असुरक्षित अनुभव करते ....और घर , शालिनी और बेटे अखिल को लेकर चिन्तित हो उठते .&lt;br /&gt;बलात्कार शब्द पर उनकी नजरें अधिक देर तक टिकतीं . उस समाचार को वह गौर से पढ़ते और मन में विचलन अनुभव करते रहते . विचलन अनुभव करते हुए उन्हें बरबस सुहासिनी की याद हो आती  . याद तब अधिक आती जब उससे मिले उन्हें दो-तीन सप्ताह बीत चुके होते .&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;सुहासिनी उनकी छात्रा थी .... उनके निर्देशन में पी-एच.डी कर रही थी . उसके रजिस्ट्रेशन के बाद उन्होंने उसकी इस प्रकार उपेक्षा की कि एक दिन वह रो पड़ी थी . वह काम करके लाती . वह देखते ..... देखते नहीं बल्कि गंभीरतापूर्वक देखने का अभिनय करते और कुछ देर बाद रजिस्टर उसकी ओर सरका देते , ''बात बनी नहीं सुहास ...... दोबारा लिखो ....'' और वह कुछ पुस्तकों के नाम बता देते , ''इन्हें पढ़ो . दिशा मिल जाएगी  .''&lt;br /&gt;एक -एक चैप्टर को पांच-छ: बार उन्होंने उससे लिखवाया . दो वर्षों में सुहासिनी केवल तीन चैप्टर ही लिख पायी . समय समाप्ति की ओर तेजी से बढ़ रहा था और यही वह चाहते थे . चौथे चैप्टर को जब पांचवीं बार उन्होंने रिजेक्ट किया सुहासिनी के धैर्य का बांध टूट गया और वह फफक पड़ी ,''सर , मैं पी-एच.डी. नहीं करूंगी .''&lt;br /&gt;''च्च....च्च....ऐसा नहीं सोचते सुहास .''सोफे पर उसकी ओर खिसक गए थे वह और अपनी उंगलियों से सुहासिनी के आंसू पोछते हुए बोले थे ,'' तुम प्रतिभाशाली हो..... समझदार भी .... लेकिन पता नहीं क्यों नासमझी करती जा रही हो..... अब तक कब की थीसिस सबमिट हो चुकी होती . कहीं एडहॉक पढ़ा रही होती .''&lt;br /&gt;सुहासिनी का रोना बंद हो गया था . वह सोचने लगी थी , ''क्या सच ही वह प्रतिभाशाली है ... लेकिन सर ने कहा....अभी कहा  ....''&lt;br /&gt;सुहासिनी सोच में डूब गयी ....वह कुछ और परिश्रम करेगी.....उसे प्राध्यापक बनना है .... वैसा ही करेगी जैसा शुशांत सर कहेंगे ....''&lt;br /&gt;और उसको वही करना पड़ा जैसा शुशांत राय ने कहा . शालिनी दफ्तर जा चुकी थी और बेटा कॉलेज.... तब से सुहासिनी को अकेले में वह सहवासिनी कहकर पुकारने लगे थे  .&lt;br /&gt;सुहासिनी ने पी-एच.डी की और एक कॉलेज में उनके सहयोग से एडहॉक पढ़ाने लगी . उसे रेगुलर होना है और वह सोचती है कि उसके सर यानी शुशांत सर .. .. उसके रेगुलर होने में भी सहायक होंगे . इसीलिए वह दस-पन्द्रह दिनों में उनके घर आती है ... कॉलेज जाते समय ..... . शालिनी के कार्यालय जाने के बाद . लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ . शालिनी को ज्वर था . वह कार्यालय नहीं गई थी  .&lt;br /&gt;सुहासिनी घर आए और शुशांत अपने को नियंतित्रत रख लें , संभव नहीं था . चार वर्षों बाद उन्हें गेैराज की याद आयी थी . बमुश्किल से चाबी खोज पाए थे वह . ज्वर के कारण शालिनी अर्ध्दचेतनावस्था में थी  .&lt;br /&gt;शुशांत कठिनाई से गैराज का ताला खोल पाए , क्योंकि उसमें जंग लग चुकी थी . गैराज में जमी धूल की पर्त और दीवारों में लगे जालों ने एक बार तो उन्हें हतोत्साहित किया था , लेकिन उसका विकल्प उन्होंने खोज लिया था . 'चटाइयाें का आविष्कार शायद ऐसे अवसरों के लिए ही हुआ था ' उन्होंने उस समय सोचा था . लेकिन स्कूटर बाधक बन गया था . छोटे-से गैराज का अधिकांश स्थान उसने घेर रखा था . उतावलेपन के उस क्षण उस बाधा से मुक्ति आवश्यक थी  . मुक्ति उसे हटा देने से ही संभव थी . लेकिन चार वर्षों से एक ही जगह अड़े स्कूटर को हटाना उनके लिए किसी पहाड़ को हटाने जैसा था .  भले ही उन्होंने  दुनिया को चलाया था ,लेकिन स्कूटर चलाना तो दूर आने के बाद उसे हाथ भी नहीं लगाया था , उसे हटाने से शालिनी के उठ आने का खतरा भी था . उसे खिसकाकर उन्होंने धूल और जालों की परवाह न कर धूलभरी फर्श पर किसी तरह आधी-अधूरी चटाई बिछा ली थी . ऐसे अवसरों में असुविधाओं में सुविधा खोज लेना उनकी फितरत थी . &lt;br /&gt;लेकिन स्कूटर उनके दिमाग में अटक गया था . वह सड़क पर दौड़ने के बजाय उनके दिमाग में दौड़ने लगा था . उसे घर से बाहर कर देने का निर्णय उन्होंने कर लिया  था . उसे बेच दें या किसी को दे दें इस द्वन्द्व में वह कई दिनों तक फंसे रहे थे . बेचने से अधिक  किसी को दे देना उन्हें अनेक दृष्टिकोण से उपयुक्त लगा था .  लेकिन कुछ मुफ्त देना उनके सिध्दाांत के विरुध्द था . मुफ्त पाने वाले की आदतें खराब हो जाती हैं . वह श्रम से बचने लगता है .... इससे न उसका विकास होता है और न देश  का . 'मुफ्त' देने-पाने की नीति उनके प्रगतिशील विचारों के  विरुध्द थी . अपने प्रगतिशील विचारों के प्रतिपादन के लिए उन्होंने अपने कुछ सिध्दांत तय किए थे और उन सिध्दान्तों का वह कठोरता से पालन करते थे .   &lt;br /&gt;सोच-विचारकर उन्होंने 'जनाधार लेखक संघ' से जुड़े अपने एक छात्र को स्कूटर देने का निर्णय किया . संध की परिकल्पना में उनकी भी भूमिका रही थी , जिससे उनके कुछ छात्र भी उससे जुड़े हुए थे . समय-समय पर वे संघ की ओर से धरना-प्रदर्शन कर लेते - - -जंतर-मंतर पर सरकार के विरुध्द नारे लगा लेते . संघ से जुड़े लोग प्रसन्न हो लेते कि वह सरकार की दुर्नीतियों के विरुध्द आवाज बुलंद कर रहे थे जबकि संघ के पदाधिकारी इससे सरकारी तंत्र पर दबाव बनाकर अपने हित साध लेने से प्रसन्न होते थे .&lt;br /&gt;एक दिन राजीव प्रसाद नामके उस युवक को उन्होंने घर बुलाया . उसकी पढ़ाई , समस्याओं आदि की चर्चा कर कहा , ''राजीव तुम्हे एक प्रोजेक्ट पर काम करना है  .''&lt;br /&gt;'' कैसा प्रोजेक्ट सर ?''&lt;br /&gt;''स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यासों में स्त्री विमर्श'' विषय पर कुछ काम करना है  .''&lt;br /&gt;'' सर .....''  राजीव के स्वर में कंपन था .&lt;br /&gt;''मैं तुम्हारी सहायता करूंगा . यही कोई दो-ढाई-सौ पृष्ठों की पुस्तक ........ पर्याप्त पारिश्रमिक मिलेगा . पांच दशकों के महत्वपूर्ण उपन्यासों की सूची मेैं लिखवा दूंगा . प्रत्येक दशक के आधार पर पांच अध्याय और छठवां अध्याय उपसंहार  .''&lt;br /&gt;''सर- - - मैं- - - .''&lt;br /&gt;''अरे घबड़ाते क्यों हो ? मैं हूं न ! '' दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए शुशंांत राय बोले ,'' इसके लिए कुछ परिश्रम करना होगा ... कुछ पुस्तकालयों की खाक भी छाननी होगी ..... उसके लिए तुम मेरा यह स्कूटर ले जाओ . केवल कार्य करने तक के लिए ही नहीं..... इसे मैं तुम्हें दे रहा हूं  .''&lt;br /&gt;राजीव उनके चेहेरे की ओर देखने लगा तो वह बोले ,'' ऐसे क्यों देख रहे हो ! भई मुफ्त में नहीं दे रहा हूं...... काम करवा रहा हूं . तुम प्रतिभाशाली हो और प्रतिभाशाली लोग मुझे प्रिय हैं . मैं उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता हूं .....''&lt;br /&gt;''सर.....'' राजीव कसमसाया . वह सोच रहा था कि उसके लिए अपनी एम.फिल. का शोध प्रबंध ही भारी पड़ रहा है , ऊपर से इतना भारी-भरकम काम ..... कैसे कर पाएगा वह !''&lt;br /&gt;''इसे दो महीनों में पूरा करना है ....फिर अपने एम.फिल का काम करते रहना .... अभी उसके लिए पर्याप्त समय है .'' और उन्होंने राजीव की ओर स्कूटर की चाबी उछाल दी थी . चाबी वह नहीं थाम पाया तो दाढ़ी में मुस्कराते हुए वह बोले ,'' कैच करने में कमजोर हो  ?''&lt;br /&gt;राजीव के घर से स्कूटर घसीटकर बाहर निकालते ही उन्होंने गेट बंद कर लिया था . उसके बाद उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि चार वर्षों में पिचक चुके टायरों और पथरा चुकी पेट्रोल की टंकी की रबड़ ने उसे कितना दुखी किया था . मेकेनिक ने उसकी जेब से पांच सौ रुपए निकलवा लिए थे , जो कि उसके पास नहीं थे .उसने एक साथी से रुपए उधार लेकर मेकेनिक को दिए थे  .&lt;br /&gt;लेकिन जिन्दगी में पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ कि सोची-समझी योजनानुसार किए गए कार्य में उन्हें असफलता मिली थी . राजीव प्रसाद नामक छात्र द्वारा तैयार पुस्तक उनके नाम से प्रकाशित हानी थी . उसने एक दशक के उपन्यासों पर एक चैप्टर लिखकर उन्हें दिखा भी दिया था , लेकिन उसके बाद वह गायब हो गया था . उन्हें ज्ञात हुआ कि  बंगलौर की एक बहुराष्ट्रीय बैंक में उसे नौकरी मिल गयी थी और वह पढ़ाई छोड़ गया था . उन्हें इस बात का अफसोस  था कि उन्होंने पहली बार गलत घोड़े पर दांव लगाया था .  &lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;लेकिन अब उनके चुप होने का यह कारण नहीं था  .&lt;br /&gt;हुआ यह कि दो दिन पहले लंबे समय के बाद सुहासिनी उनके यहां आयी . शालिनी दफ्तर जा चुकी थी . सुहासिनी को देख वह प्रसन्न हुए . प्रसन्न इसलिए कि उसके आने के लिए कितनी ही बार उन्होंने उसके मोबाइल पर फोन कर उससे आग्रह -अनुग्रह किया था . उसे प्रेम भरे एस.एम.एस. किए थे . &lt;br /&gt;सुहासिनी का उन्होंने ऐसे स्वागत किया मानों वर्षों बाद मिले थे . लेकिन सुहासिनी में उन्हें न वह उत्साह दिखा और न औत्सुक्य . घर में प्रवेश करते ही वह हिमखण्ड की भांति सोफे पर ढह गयी थी . वह देर तक उसकी ओर ताकते रहे थे चुप फिर पूछा था , ''सुहास तुम चुप क्यों हो ? तुम्हारी चुप्पी मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही .''&lt;br /&gt;सुहासिनी उन्हें घूरती रही अपनी बड़ी-बड़ी तीक्ष्ण आंखों से . उन्होंने फिर जब टोका , वह रो पड़ी  . उन्हें उसके साथ का पहला दिन याद हो आया . तब भी वह ऐसे ही रोयी थी और सोफे पर उसके निकट खिसक उन्होंने उसके आंसू पोछे थे . उन्होंने उसी प्रकार उसके आंसू पोछने चाहे तो सुहासिनी ने उनका हाथ झिटक दिया , ''आपने मुझे बर्बाद कर दिया .'' वह चीखी  .&lt;br /&gt;''मैं ऽ ऽ ने ....?''&lt;br /&gt;''हां .....आपने.....मैं गर्भवती हूं ......''&lt;br /&gt;''तुम .....तुम .....'' उनकी जुबान लड़खड़ा गयी थी . किसी प्रकार अपने को संभाल वह बोले ,      '' इसमें परेशान होने की क्या बात.....मैं तैयार होता हूं.....किसी डाक्टर के पास......''&lt;br /&gt;''नहीं.....''&lt;br /&gt;''फिर .....'' वह भौंचक थे  .&lt;br /&gt;''आप शालिनी जी को तलाक दें और मुझसे विवाह........''&lt;br /&gt;''तुम होश में तो हो न सुहासिनी....?''&lt;br /&gt;''पूरे.....होश-ओ-हवाश में कह रही हूं......''&lt;br /&gt;''क्या प्रमाण है कि यह मेरा ही गर्भ है  ?'' वह भड़क उठे थे  .&lt;br /&gt;'' प्रमाण क्या हैं ....यह आपको भी पता है........'' सुहासिनी ने सधे स्वर में कहा .&lt;br /&gt;वह धप से सोफे पर बैठ गए थे सिर थामकर . उनके सामने डॉ. विप्लव त्रिपाठी का चेहरा घूम गया था.... राजनीतिशास्त्र विभाग के डॉ. विप्लव त्रिपाठी.... । उनकी एक एम.फिल. की छात्रा ने ऐसा ही आरोप लगाते हुए उनके द्वारा उसे मोबाइल पर भेजे गए एस.एम.एस. के प्रमाण विश्वविद्यालय प्रशासन और इन्क्वारी कमीटी के समक्ष प्रस्तुत किए थे और आरोप सिध्द होने के बाद डॉ. त्रिपाठी को प्रोफेसर पद से विश्वविद्यालय ने बर्खास्त कर दिया था  .&lt;br /&gt;सुहासिनी जा चुकी थी ..... कब उन्हें पता नहीं चला था .&lt;br /&gt;और तभी से वह चुप हैं .&lt;br /&gt;******&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-477337875270803032?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/477337875270803032/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=477337875270803032&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/477337875270803032'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/477337875270803032'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html' title='कहानी-३०'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S1E6vVjv1zI/AAAAAAAAAN8/vlZ48OpQnvI/s72-c/100_2172.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-3053888733316762601</id><published>2010-01-04T01:19:00.000-08:00</published><updated>2010-01-04T01:25:53.725-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी-२९'/><title type='text'>कहानी-२९</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S0Gy9UyirKI/AAAAAAAAANM/IWqjQ4caFdc/s1600-h/1912200812235.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S0Gy9UyirKI/AAAAAAAAANM/IWqjQ4caFdc/s200/1912200812235.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5422812192953248930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; "&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:180%;"&gt;वह चेहरा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;मध्य दिसम्बर का एक दिन . सुबह की खिली-खिली धूप और लॉन में पड़ी बेंचें . बेंचों पर बैठे कई चेहरे ..... धूप में नहाये चेहरे .... धूप सेकते चेहरे . खिड़की का पर्दा उन्होंने थोड़ा-सा खिसका दिया था , जिससे लॉन का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था . उनकी नजर  एक चेहरे पर टिक गयी और वह गौर से उसे देखते रहे . चेहरे पर उम्र की लकीरें स्पष्ट थीं .  उन्होंने कुर्सी एक ओर खिसकाई और खिड़की पर जा खड़े हुए .... निर्निमेष उस चेहरे को देखते हुए .  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'वही हैं ......लेकिन यहां क्यों ? ' मस्तिष्क में तंरगें दौड़ने लगीं . कुछ क्षण खिड़की पर खड़े रहकर वह कमरे में टहलने लगे सोचते हुए , 'मैं कैसे भूल सकता हूं उस चेहरे को . ढल गया है .... ढलना ही था . पचास से अधिक सालों की लंबी यात्रा .... पचीस साल जैसा कौन रहता है ! शरीर में स्थूलता भी है ....अपने को देखो तपिश .... तुम क्या उतने ही स्लिम-ट्रिम हो .... बढ़ती उम्र में सभी के आकार-प्रकार - चेहरे बदलते ही हैं ........'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह एक बार पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए और देखने लगे. इस समय वह चेहरा किसी युवती से बातें कर रहा था . ...युवती , जो पचीस -छब्बीस के आसपास थी ....उस चेहरे से मिलता -सांवला चेहरा , नाक नोकीली , होंठ पतले और आंखें छोटीं . लंबाई भी उतनी ही .....वह भी तो उस युवती जितनी लंबी थीं , लेकिन तब उनके नितंब छूते बाल थे , जैसे कि उस युवती के हैं , लेकिन अब वह बॉब्ड थीं .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'निेश्चित ही यह वही हैं .....' वह अपनी टेबल के चारों ओर कमरे में कुछ क्षण तक टहलते रहे , ' क्या उन्हें मेरे बारे में जानकारी नहीं ? या उनकी स्मृतिपटल से मेरा नाम सदा के लिए मिट चुका है . लेकिन ऐसा संभव नहीं . हम दो बार मिले थे .... कितने ही पत्र लिखे थे एक-दूसरे को .' वह पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए , 'यह मेरा भ्रम नहीं....यह वही हैं  .' &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;दरवाजे पर दस्तक हुई  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कम इन '' वह तेजी से पलटे और कुर्सी की ओर ऐसे बढ़े मानो चोरी करते हुए पकड़े जाने का भय था  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 प्रवीण राय ने आहिस्ता से प्रवेश किया .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यस प्रवीण .... इज एवरीथिंग फाइन !''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जी सर . एक्सपर्ट्स डॉ0 श्रेयांष तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह आ गए हैं . ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''और हेड साहब....डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष थे और विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज में शिक्षक के किसी भी पद के साक्षात्कार में उनका होना अनिवार्य था . यह  विश्वविद्यालय का नियम था .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' उनके पी.ए. का फोन आया था सर कि वह कुछ देर पहले ही कार्यालय से निकले हैं ......उन्हें पहुंचने में कम से कम आध घण्टा का समय लगेगा .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हुंह......'' कुछ सोचने के बाद वह बोले , '' हेड साहब के आने तक प्रतीक्षा करना होगा .... डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह को मेरे यहां ले आओ.......''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर मैंने पहले ही उन्हें आपके यहां के लिए कहा था लेकिन दोनों सीधे गेस्ट रूम में जाते हुए बोले कि वहां उन्हें कोई कष्ट नहीं.....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''ओ. के. ...'' प्रवीण राय को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए वह बैठ गए और बोले ,  ''इन दोनों की जोड़ी जहां भी जाती है अपने कंडीडेट के लिए दबाव बनाते है ....''क्षणभर चुप रहे ,  '' दरअसल हेड साहब सीधे व्यक्ति हैं ..... वह सब कुछ जानते हैं , लेकिन नहीं मालूम किन कारणों से प्राय: इन दोनों को एक साथ विशेषज्ञ के रूप में रिकमेण्ड कर देते हैं .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , मुझे जहां  तक जानकारी है .... जब भी डॉ. तिवारी से पूछा जाता है विशेषज्ञ के रूप में किसी कॉलेज में जाने के लिए उनकी शर्त होती है कि उनके साथ दूसरा विशेषज्ञ डॉ. निकिता सिंह होंगी तभी.... विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ जाने की शक्ति किसी में नहीं है . हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक हैं ... . सत्ता में पैठ है और वी.सी. भी उन्हें मानते हैं  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह मुस्कराते रहे .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , निकिता सिंह का कोई छात्र है ....सुना है .... उनके  निर्देशन में पी-एच.डी. कर रहा है और 'नेट' भी उत्तीर्ण है .....हो सकता है .....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन्होंने प्रवीण की बात आधी-अधूरी सुनी . उस क्षण उनकी नजरें खिड़की से बाहर बेंच पर अखबार में झुके उस चेहरे पर टिकी हुई थीं . युवती अब वहां नहीं थी  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'युवती भी शायद अभ्यर्थी है .' उन्होंने सोचा .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , फिर.....'' प्रवीण के टोकने से वह अचकचा गए  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हुंह.....यह हो सकता है . लेकिन डॉ. तिवारी दो अपने रखते हैं तब कहीं एक वेकेंसी निकिता सिंह को देते हैं . ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर ''.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''प्राय: महिला अभ्यर्थी ही उनकी कंडीडेट होती हैं . उनके निर्देशन में पी-एच.डी करने वाली सभी लड़कियां ही हैं ..... एकदम समाजवादी हैं डॉ. तिवारी . निकिता ने भी उनके निर्देशन में पी-एच.डी की थी ..... उनके आलोचक इसे उनकी कमजारी मानते हैं तो मानते रहें . '' चुप होकर प्रवीण की ओर देखने के बाद वह खिड़की से बाहर लॉन की ओर देखने लगे . वह चेहरा उन्हें वहां नजर नहीं आया . 'कहां गई ? ' क्षणांश के लिए वह विचलित हुए , लेकिन तभी सामने बैठे अपनी ओर ताकते प्रवीण पर दृष्टि डाली और बोले , ''लेकिन हम क्या करें प्रवीण  ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' क्या सर  ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''आपको बताया था .... मिनिस्ट्र्री से आए फोन के बारे में .... मंत्री जी किसी निरंजन प्रसाद में  इंटरेस्टेड हैं .... मंत्री जी के मुंह लगे ज्वाइण्ट सेक्रेटरी का फोन था . दोनों ही बिहार के हैं . जे.एस. ने संकेत में यह भी कहा था कि निरंजन मंत्री जी का दूर का रिश्तेदार है .......''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , हमें डॉ. तिवारी से पहले ही बात कर लेनी चाहिए और अपनी समस्या डॉ. पाण्डे को भी बता देना चाहिए  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''प्रवीण , आप जानते हैं कि डॉ. तिवारी का कंडीडेट नहीं तो किसी का नहीं ......उन पर मंत्री-संत्री का प्रभाव नहीं पड़ने वाला ....... ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , वेकेंसी भी एक ही है....एडहॉक भी नहीं ....वर्ना डॉ. तिवारी के लिए एडहॉक का ऑफर दे सकते थे  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''प्रवीण, '' वह कुछ गंभीर हो उठे , ''आपको नहीं लगता कि यह सब कितना अनफेयर है .... मंत्री के कंडीडेट की बात हो या डॉ. तिवारी या डा. निकिता की या किसी अन्य के कंडीडेट की .... जो अभ्यर्र्थी दूर से आते हैं और कितनी ही बार उन्हें दूर शहरों में असफल साक्षात्कार के लिए जाना होता है....... उनके विषय में सोचो . अधिकांश बेकार और साधारण हैसियत के युवक .... ये तिवारी या मंत्री जैसे घड़ियाल उनकी नौकरियां निगल जाते हैं .....'' उनका चेहरा लाल हो उठा .  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर '' प्रवीण ने चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि वह स्वयं भी सिफारिश से नियुक्त हुआ था  . लेकिन वह जानता था कि उसके सामने बैठे डॉ0 तपिश .... उसके प्राचार्य एक मेरीटोरियस व्यक्ति थे और उन्होंने सिफारिश से नहीं अपनी योग्यता से प्राध्यापकी पायी थी और विश्वविद्यालय - कॉलेज की राजनीति के  बावजूद वह इस पद पर पंहुचे थे ... अपनी योग्यता के बल पर ....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह के लिए जलपान की व्यवस्था .....''  अपनी बात अधूरी छोड़ दी उन्होंने .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर डॉ0 अनिरुध्द शुक्ल उनकी सेवा में हैं .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''ओ.के. ....'' उन्होंने पुन: लॉन की ओर देखा . बेंचों पर बैठे अन्य लोग भी इधर'उधर जा चुके थे .... केवल एक वृध्द पुरुष को छोड़कर  . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''डॉ0 पाण्डे के आते ही मुझे सूचित करना . उनके आते ही इंटरव्यू प्रारंभ कर देना है..... तब तक आप डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह का खयाल रखें ..... ''  वह पुन: कुर्सी से उठ खड़े हुए और कमरे में टहलने लगे .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;****** &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'लोग रिसेप्शन में बैठे होंगे ....धूप में गर्मी बढ़ गयी  होगी . मुझे रिसेप्शन की ओर जाना चाहिए .'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'लेकिन क्यों ?'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'शायद वह वहां मिल जांए . '&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'मिल भी जाती हैं तो क्या तुम उनसे बात कर सकते हो इस समय . वह लड़की उनकी बेटी होगी .... यह तो अनुमान लग ही गया है . एक अभ्यर्थी की मां से बात करना....तपिश तुम प्राचार्य हो इस कॉलेज के.....'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'प्राचार्य क्या इंसान नहीं ! उसके परिचितों के बच्चे साक्षात्कार में नहीं बैठ सकते ? बात कर लेने से ही मैं उनकी लड़की का फेवर करने लगूंगा ? मुझे उस लड़की का नाम भी मालूम नहीं .... जबकि मंत्री जी की तोप इन्हीं बच्चों के बीच कहीं समायी होगी .... तिवारी और निकिता सिंह की गन भी होगी कहीं ...... इण्टरव्यू करने उधर से जाते हुए मैं उन्हें भलीभांति देख सकूंगा ..... जरूरी नहीं कि वह मानसी ही हों .... हों भी तो वह मुझे पहचान लेंगी यह आवश्यक नहीं है  .'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'फिर तुम उधर से जाना ही क्यों चाहते हो ?' अंदर से आवाज आयी . 'पहचान लिए जाने के लिए ही न ! लेकिन क्या बात मात्र इतनी ही है ! क्या यह सच नहीं कि उनके पहचानने से तुम्हारा आहत स्वाभिमान संतुष्ट होगा . तुम उन्हें यह अहसास नहीं करवाना चाहते कि तुम इस कॉलेज के प्रिसिंपल हो ?'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'नहीं , ऐसा नहीं है .....इतनी पुरानी बात ....तीस साल पुरानी ....मैं तो भूल ही गया था ..'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'नहीं तपिश....तुम उसे एक दिन ...बल्कि एक पल के लिए भी नहीं भूले....भूल सकते भी नहीं थे .... वह पुन: खिड़की पर खड़े हो गए और बाहर देखने लगे . लॉन की एक बेंच पर वही अकेला वृध्द व्यक्ति बैठा था और बेंच से कुछ हटकर एक कुत्ता अपना पेट , टांगें और मुंह ऊपर उठाये पीठ के बल निश्चल लेटा  हुआ था . तभी दरवाजे पर नॉक हुआ  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यस !'' वह पलटे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'सर , हेड साहब आ गए हैं ....सीधे कांफ्रेंस रूम में .....आप भी......''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''ओ.के.'' अभ्यर्थियों के नामों का फोल्डर टेबल से उठा वह डॉ0 प्रवीण के पीछे हो लिए थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*******&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन दिनों वह दिल्ली में विदेश मंत्रालय में अनुवादक थे . अपने को पी-एच.डी. के लिए पंजीकृत करवाने में दो बार असफल हो चुके थे . यह उन दिनों की बात है जब दूसरी बार विश्वविद्यालय ने उनके शोध विषय को खारिज किया था . वह परेशान थे और यह बात मानसी को बताना चाहते थे  . बताना इसलिए चाहते थे क्योंकि पिछली मुलाकात में मानसी ने पहले विषय के खारिज होने के कारणों पर गहरी रुचि प्रदर्शित की थी और उसके हर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक ही बात कही थी कि विश्वविद्यालय ने विषय के खारिज होने का कोई कारण उन्हें नहीं बताया ....केवल सूचना भेजी थी . मानसी उद्विग्न थी और तब उन्होंने अनुभव किया था उनके शोध से शायद उसकी भविष्य की आकांक्षाएं जुड़ी हुई थीं . लेकिन 'संभव है यह मेरी अपनी सोच हो.... वह ऐसा न सोचती हो .' उन्होंने सोचा था .' यदि शोध नहीं कर सके और प्राध्यापक नहीं बन पाए तो क्या  .  जो नौकरी वह कर रहे हैं .... उसका भविष्य प्राध्यापक जितना आकर्षक न सही लेकिन बुरा भी नहीं . डिप्टी डायरेक्टर तो वह बन ही जाएगें .'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'लेकिन मानसी को बताना आवयक है . पिछले एक वर्ष से कभी एक बहाने तो कभी दूसरे वह शादी टालती जा रही थी . वह दूरदर्शन में प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव थी और प्रारंभ में उसका बहाना था कि वह दिल्ली में थे और दिल्ली में उसका स्थानांतरण कठिन था क्योंकि वहां पहले से ही अतिरिक्त प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव्स बैठे हुए थे , जबकि उनका लखनऊ स्थानांतरण संभव नहीं था . मानसी के स्थानांतरण के विषय में वह कमलेश्वर जी से मिले थे . कमलेश्वर जी उन्हीं दिनों दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर नियुक्त हुए थे . मुस्कराते हुए कमलेश्वर जी ने कहा था , ''तपिश जी ..... यह बड़ा काम नहीं है . शादी करो....स्थानांतरण की जिम्मेदारी मेरी .'' कमलेश्वर जी ने उनकी आंखों में देखा , फिर मुस्कराये ....एक मीठी मुस्कान और बोले थे , ''भाई , पता कर लो ....आपकी मंगेतर की कोई दूसरी समस्या तो नहीं ....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''ऐसा नहीं लगता सर....उसे दोनों के अलग-अलग शहरों मे रहने का भय ही सता रहा लगता है .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''उन्हें बता दो कि मैंने आश्वस्त किया है ....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;कमलेश्वर जी की बात बताने के बाद मानसी ने खत में लिखा , ''तपिश , आपने पहले यह क्यों नहीं बताया था ... अब एक साल के लिए मैं बंध गई हूं . मैंने यहां विश्वविद्याालय में मार्निंग शिफ्ट में उर्दू सार्टीफिकेट कोर्स में प्रवेश ले लिया है . एक जमाने से मैं उर्दू सीखना चाहती रही हूं ....  एक वर्ष की ही बात है .....कमलेश्वर जी तो अभी आए ही हैं .... अभी रहेगें ही ..... भले ही आई.ए.एस . लॉबी उनके खिलाफ है.......तो क्या आप एक वर्ष रुक नहीं सकते ?''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं तो रुका हुआ हूं ही..... लेकिन मेरे घरवाले....उनका धैर्य चुका जा रहा है  .'' उन्होंने मानसी को लिखा था  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैंने अपने डैडी से बात की है. वह आपके डैडी को मेरी समस्या से अवगत करवा देंगे .'' मानसी ने इस पत्र में आगे लिखा , ''समय निकालकर आकर मिल लें ......पत्रों में बातें हो नहीं पातीं .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कोशिश करूंगा .'' उन्होंने उसे लिख तो दिया था लेकिन लखनऊ जाने का प्रयास नहीं किया और न ही मानसी का उसके बाद कोई पत्र आया . शोध के अपने नये विषय की तैयारी और रूपरेखा प्रस्तुत करने की चिन्ता में वह इतना डूबे कि वह उसे पुन: पत्र  लिख नहीं पाए . इस बार विषय प्रस्तुत करते ही निर्णायक समिति की बैठक हुई और उनका विषय पुन: खारिज कर दिया गया . विश्वविद्यालय का पत्र थामें वह कितनी ही देर तक यह सोचते रहे थे कि उन्हें मानसी को यह सूचना देना ही चाहिए . और उन्होंने उसे अंतर्देशीय पत्र लिख दिया था .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;पन्द्रह दिन के अंदर ही उत्तर आया , ''आपका मिलना आवश्यक है  . जितनी जल्दी संभव हो ....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन्होंने उसके ऑफिस के पते पर पत्र लिख दिया कि वह अमुक तिथि को अमुक ट्रेन से लखनऊ पहुंचेंगे....सुबह दस बजे उसके कार्यालय में मिलेंगे  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कार्यालय नहीं.....इंडियन कॉफी हाउस ....ग्यारह बजे .... मेरे कार्यालय के निकट ही है ....सुबह ग्यारह बजे  ....मिस नहीं करेंगे  .'' मानसी ने तुरंत लिख भेजा था  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;******&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;निश्चित तिथि को ठीक ग्यारह बजे सुबह वह कॉफी हाउस में थे . पांच मिनट ही हुए थे उन्हें वहां पहुंचे कि उन्होंने एक युवक के साथ सड़क पार करते हुए मानसी को देखा . टेबल पर बैठने के लिए उन्होंने कुर्सी को हाथ लगाया ही था कि रुक गए और बाहर निकल आए .  उनकी दृष्टि युवक पर टिकी हुई थी , मानसी जिससे हंसकर कुछ कह रही थी . युवक लंबा....पांच फीट आठ इंच के लगभग.....स्लिम ...गोरा ....एक वाक्य में ... सुन्दर था  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'ऑफिस का कोई कलीग होगा .' उन्होंने सोचा , 'कहीं जा रहा होगा .'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;लेकिन युवक कहीं नहीं गया . मानसी के साथ रहा . मानसी ने दूर से ही उन्हें देख लिया था और उनकी ओर हाथ का इशारा कर कुछ कहा . उन्होंने मानसी के संकेत के बाद युवक को हंसते देखा था  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सॉरी....मैं दस मिनट लेट हूं .'' उनके निकट पहुच मानसी बोली  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह चुप रहे  . उनकी नजरें युवक पर गड़ी थीं  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''ओह ! '' मानसी ने उनके भाव पढ़ लिए , ''यह हैं मनीष तिवारी ....आकाशवाणी में हैं ....प्रोग्रैम....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''एक्ज्यूक्यूटिव....'' मानसी से शेष शब्द मनीष तिवारी ने झटक लिया और उनकी ओर हाथ बढ़ा बोला , ''आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''थेैंक्स .'' मंद स्वर में वह बोले थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं चलता हूं मानसी.....आफ्टरनून आकर केस डिस्कस कर लूंगा....नो हरी.....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''अरे यार.....ऐसी भी क्या जल्दी है ! तपिश जी क्या सोचेगें ? एक कप कॉफी पीकर चले जाना  &lt;b&gt;'' &lt;/b&gt;मनीष की ओर देख मुस्कराती हुई मानसी बोली , ''अरे  हम लोग यहीं खड़े रहेगें या बैठेगें भी .....'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हां.....हां....क्यों नहीं ......'' और वह अंदर की ओर मुड़ गए तो मानसी और मनीष भी उनके पीछे हो लिए थे . जिस मेज पर वह बैठने जा रहे थे .... वह अभी भी खाली थी . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;बैठने के बाद उनके बीच देर तक चुप्पी पसरी रही  . चुप्पी को ताड़ती हुई  मानसी ने पूछा ,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कॉफी लेंगें  ?''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कॉफी हाउस में बैठे हैं तो वह तो लेना ही है........इस मुलाकात को  यादगार भी तो बनाना है .'' उन्हें अपनी बात अटपटी लगी , लेकिन बात जुबान से रपट चुकी थी . संभालने का प्रयत्न करते हुए उन्होंने तत्काल जोड़ा , '' मनीष जी का साथ होने से इसे यादगार मुलाकात ही कहूंगा ....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;मनीष के चेहरे पर मुस्कान तिर गयी  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हां , यह है . मनीष बहुत व्यस्त रहते हैं ....कभी पकड़ में नहीं आते . आकाशवाणी की नौकरी......नाटक लिखते हैं ....इनकी कई स्क्रिप्ट पर दूरदर्शन और आकाशवाणी ने नाटक तैयार किए  हैं  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हुंह  .'' उन्होंने मनीष की ओर पुन: हाथ बढ़ाया .''मेरा सौभाग्य . आप जैेसे कलाकार से मुलाकात का श्रेय मानसी जी को .... इनका भी आभार  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मानसी कुछ अधिक ही प्रशंसा कर रही हैं सर ! बस यूं ही कुछ उल्टा-सीधा लिख लेता हूें  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''तपिश जी ......ये संकोच करते हैं .....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हर बड़ा कलाकार अपने बारे में बताने या बताए जाने पर संकोच प्रकट करता है . बड़प्पन की यही निशानी है . '' वह अब पूरी तरह खुल चुके थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यू आर राइट तपिश जी .... मनीष जीनियस हैं , लेकिन मेैं जब कहती हूं तो यह चिड़चिड़ा जाते हैं .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन्होंने देखा अपने को 'जीनियस' कहे जाने पर मनीष का चेहरा खिल उठा था . वह चुप रहे . कुछ देर बाद मनीष बोला , ''मानसी की ज़र्रानवाजी सर .....लेकिन आप मुझे लेकर कोई गलतफहमी नहीं पालेंगे ..... मुझ जैसे कलाकार-लेखक गली-कूंचों में एक खोजेंगे -- अनेक मिल जाएगें  ....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''आपने देखा इनकी विनम्रता .'' तपिश की ओर देखते हुई मानसी बोली .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह तब भी चुप रहे .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यार मनीष , कुछ और तारीफ तभी करूंगी  .... जब कुछ पी लूंगी .'' मानसी बोली  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''बेयरे को आवाज दो .....दो चक्कर काट गया और हम लोग बातों में लगे रहे  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जाकर आर्डर कर आता हूं  .'' मनीष जाने के लिए उठा , दो कदम बेयरे की ओर बढ़ा , फिर रुककर उनसे पूछा  ,'' तपिश जी कुछ और लेगें  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''नो थैंक्स .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;******&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;कॉफी पीकर मनीष तिवारी चला गया .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''तपिश जी , आपको कहीं कोई दूसरा काम है ?'' मानसी ने पूछा   .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह अचकचा गए . सोचने लगे ,''इसने मुझे बुलाया और अब पूछ रही है कि.....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;कोई उत्तर दिए बिना वह मानसी की ओर देखने लगे थे  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सॉरी ,मैंने यूं ही पूछा . कभी-कभी ऐसा होता है ... लेकिन ....'' आगे कुछ न बोल वह कभी बेयरे की ओर देखती ओैर कभी गेट की ओर .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;तपिश को लगा कि शायद उसने किसी और को भी बुलाया हुआ है . कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने पूछ लिया ,''किसी को आना है  ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''नहीं....कौन आएगा ? '' मानसी फिर चुप थी और लगातार गेट कर ओर देखती जा रही थी . तपिश भी उधर ही देखने लगे . तभी बेयरा आ गया .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;मानसी का ध्यान गेट की ओर होने का लाभ उठा तपिश ने कॉफी के पैसे बेयरे को दे दिए  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''आपने क्यों दिए  ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मुझे नहीं देना चाहिए था  ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मेरा यह मतलब नहीं ....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''अगर आपको किसी की प्रतीक्षा नहीं तो हम उठें ....डेढ़ घण्टा हो चुका है .... ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हां.....लेकिन यहां तो लोग सुबह आकर शाम तक बैठे रहते हैं ....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हां.....आं....लेकिन हमें अभी बूढ़ा होने में बहुत वक्त है  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;मानसी मुस्करा दी . उन्होंने ध्यान दिया , उसकी मुस्कराहट में उत्साह -प्रफुल्लता नहीं थी  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उठ खड़े होते हुए उन्होंने पूछा , ''आपके पास अभी ओैर कितना वक्त है ....?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''लंच तक आपके साथ रह सकती हूं ... ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;बाहर फुटपाथ पर पहुंच वह बोले ,''फिर हम क्यों न हजरतगंज में चहल-कदमी करते हुए बातें करें ....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जी...श्योर ...''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;दो बजे तक मानसी उनके साथ हजरतगंज में एक छोर से दूसरे छोर तक उलट-&lt;br /&gt;फेर कर टहलती रही . उन्हें आश्चर्य था कि जिस उद्देश्य से उसने उन्हें तुरंत आ जाने का आग्रह किया था उस पर चर्चा करने से वह बचती रही . उन्होंने जब अपने शोध विषय के निरस्त होने की चर्चा छेड़ी... उसने केवल ,''ऐसा होता है ... वह कोई मुद्दा नहीं  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''फिर मुद्दा क्या है ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मुद्दा ....... कुछ है ही नहीं  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''फिर....?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''आपको लिखा था कि मैंने उर्दू कोर्स ज्वायन किया है .... उसे पूरा कर लेना चाहती हूं  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यह कोई आई.ए.एस. , पी.सी.एस.  जैसी  तैयारी तो नहीं . '' वह बोले  . उनका स्वर कुछ ऊंचा था  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''आप इतनी उतावली क्यों दिखा रहे हैं ?'' मानसी के स्वर में चिड़चिड़ाहट थी  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह हत्प्रभ थे . कारण वह पहले ही बता चुके थे . चुप रहे .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं समझती हूं ... रुकना हमारे हित में है . आपको शोध के लिए पंजीकृत होने में सुविधा रहेगी .... तब तक कुछ काम भी कर डालेगें ... मैं भी उर्दू में कुछ कर लेना चाहती हूं....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''हुह....'' सामने से आ रहे व्यक्ति से उन्होंने अपने को बचाया . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''क्या आप नहीं चाहते कि आप जैसे प्रतिभाशाली युवक का स्थान किसी डिग्री कॉलेज या विश्वविद्यालय में है .... बुरा नहीं मानेगें .... आपने बताया था कि अच्छे अंको से आपने प्रथम श्रेणी पायी थी  एम.ए. में  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जी .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''फिर अनुवाद में प्रतिभा का क्षरण क्यों ...?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह निरुत्तर रहे  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''अरे दो बज रहे हैं  ? ढाई से मेरे एक कार्य का लाइव टेलीकॉस्ट है ....मैं चलूं ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''श्योर  .'' उदासीन स्वर में वह बोले थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;मानसी ने बॉय किया और तेजी से दूरदर्शन केन्द्र की ओर लपक गयी . वह देर तक खड़े उसे जाता देखते रहे थे . मानसी तो चली गई थी लेकिन उनके अंदर एक उद्वेलन छोड़ गयी थी ....&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन्होंने रिक्शा पकड़ा और होटल लौट गए थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उनके पिता पारंपरिक सोच के थे और अपनी बढ़ती उम्र से चिन्तित . एक दिन वह दिल्ली आ पहुंचे  और उन्हें धमकाने के अंदाज में बोले , ''तपिश , मैं उस रिश्ते को तोड़ने जा रहा हूं.... हद ही हो गयी . तय हुए डेढ़ साल से ऊपर हो चुका है .... उनके बहानों का अंत ही नहीं .... मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''क्या ?'' धीमे स्वर में उन्होंने पूछा  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''यही कि वे लोग किसी आई.ए.एस. -पी.सी.एस. के चक्कर में हैं . वहां से उन्हें स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा होगा .... और तुम्हें उन्होंने स्थानापन्न के रूप में रखा हुआ है .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं भी जल्दी में नहीं हूँ . '' उन्होंने उत्तर दिया था .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''तुम्हें जल्दी क्यो होगी  ? तुम्हारी छोटी बहन छब्बीस की हो रही है ... तुम्हें यह पता नहीं होगा....? लेकिन मुझे उसकी चिन्ता भी करनी है .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''डैडी ...आप विपाशा की शादी की चिन्ता करें .... मैं फिलहाल शोध की चिन्ता करूंगा....''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' शोध-बोध...शादी के बाद भी होता रहेगा .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' रजिस्ट्रेशन होने तक मेरे मामले को स्थगिेत कर देंगे तो मेरे हित में होगा .'' उनके स्वर की निरीहता ने शायद पिता को सोचने के लिए विवश किया था . हथियार डालते हुए वह मरे-से स्वर में बोले थे ,''तपिश , शादी की भी एक उम्र होती है ... उसके बाद फिर समझौते ही होते हैं  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह चुप रहे थे   .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;पिता गए तो वह शोध के लिए नये विषय के पंजीकरण की तैयारी में लग गए थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;तीसरी बार शोध निर्णायक मंडल की बैठक छ: माह बाद हुई . उस बार उनका विषय पंजीकरण के लिए स्वीकृत हो गया था . जिस दिन यह बताने के लिए दफ्तर में उनके गाइड का फोन आया  उसी दिन शाम घर पहुंचने पर डाक से आया उन्हें एक निमंत्रण पत्र मिला , जिसपर नजर पड़ते ही वह चौंके थे . उस पर 'मानसी और मनीष के नाम लिखे थे . कार्ड खोलने का मन न होते हुए भी उन्होंने उसे खोला .... पढ़ा और एक ओर खिसका दिया . उसके दसवें दिन उन दोनों  का विवाह होना था . देर तक वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा सोफे पर अधलेटे से बैठे रहे थे . पिछली मुलाकात के दृश्य तेजी से उनकी आंखों के सामने घूमते रहे थे .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'मानसी ने उन्हें केवल मनीष से मिलवाने के लिए बुलाया था .... वह शायद इस विषय में बताना चाहती थी ...फिर कहा कयों नहीं... ' वह सोच रहे थे - 'कहना आवश्यक था ? यदि तुममें समझने की क्षमता ही नहीं तब कहकर भी क्या समझ लेते ? उसके परिवार वालों को भी इस बारे में जानकारी रही होगी . वे मनीष और उसके प्रेम संबधों के कारण उलझन में रहे होंगे  . लेकिन  मानसी ने उचित ही  किया . यदि अपने परिवार के दबाव में वह उनसे विवाह कर भी लेती तो भी क्या वह मनीष को भूल जाती  ! तब क्या स्थिति बनती.... नहीं उसने उचित कदम उठाया ....'' मुझे उसे बधाई देनी चाहिए .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;और अगले दिन उन्होंने मानसी को बधाई का टेलीग्राम भेज दिया था  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;******&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उसके बाद जीवन कुछ यूं बदला कि उन्हें पता ही नहीं चला . वह निरंतर सफलताओं के सोपान चढ़ते रहे ... पी-एच.डी. सम्पन्न होने से पहले ही उस कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए....और आज वह उस कॉलेज में ही प्राचार्य थे . उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा .... क्क्त भी नहीं था देखने का ...वक्त शादी करने के लिए भी नहीं निकाल सके....काम-शोध...और उसी दौरान दो वर्षों के लिए वह हिमाचल विश्वविद्यालय के वी.सी.  भी रहे .... केवल दो वर्षों के लिए... दो वर्षों बाद पुन: अपने पद पर वापस लौटे . उन्हें कभी किसी की कमी खटकी भी नहीं . अपने अधीनस्थों और विद्यार्थियों को अपना परिवार समझा और सभी के लिए दरवाजे खुले रखे . आज वह दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्राचार्य के रूप में जाने जाते हैं .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;लेकिन मानसी उन्हें कभी याद नहीं आयी ऐसा नहीं था . काम के बीच कभी अचानक खाली होते तो सोच लेते....मानसी उनके जीवन में आयी पहली और अंतिम लड़की थी .... भले ही उसके पिता ने उसे खोजा था और बाकायदा उनकी 'रिंग' सेरेमनी हुई थी . उसके बाद वह उससे दो बार ही मिले थे.... कुछ पत्राचार हुआ था .... तब वह उसके विषय में ही सोचते रहते थे .... सपने बुनते रहते थे . अकेले रहते थे ... दफ्तर के बाद मानसी उनके साथ हाती थी ... लेकिन जब सब समाप्त हुआ उन्होंने अपने को इतना समेटा कि मानसी भूले-भटके कभी उनके मानस पटल पर विचरण कर जाती और तब वह - ''आपने उचित निर्णय लिया था मानसी '' अपने को उसकी स्मृति से मुक्त कर लेते , 'लेकिन उसके जाते-जाते यह भी कहते , ''यदि आपने वह निर्णय न किया हेता मानसी तो मैं आज जो कुछ हूं वह नहीं होता  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;******&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;साक्षात्कार प्रारंभ होने से पूर्व उन्होंने अभ्यर्थियों के नामों पर दृष्टि डाली और अभीप्सा तिवारी , लखनऊ पर अटक गए . सब कुछ उलटता-पलटता नजर आया . 'हर अभ्यर्थी को जानकारी होती है कि जिस कॉलेज में वह साक्षात्कार के लिए जा रहा है वहां का प्राचार्य , विभागाध्यक्ष और विश्वविद्यालय का विभागाध्यक्ष कौन है . अभीप्सा यदि मानसी की बेटी है तब मानसी को भी ज्ञात होगा ,फिर उसने मुझे एप्रोच क्यों नहीं किया ? करती तो क्या तुम उसके लिए कुछ कर देते  ! डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता और मंत्रालय..... क्या वह इतना आसान होता .' उन्होंने सोचा 'आवश्यक नहीं मानसी को पता ही हो .... मेरे नाम के कितने ही लोग हो सकते हैं . फिर उसने तो यही सोचा होगा कि मैं सरकारी बाबू था .... आज भी कुछ पदोन्नतियों के बाद वहीं होऊंगा .... ' क्षणांश के लिए रुककर पुन:  सोचा , ''यह भी संभव हेै वह मानसी हो ही न.... ' &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;वह कुछ और सोचते कि अभ्यर्थियों को बुलाये जाने के  लिए प्रवीण ने पूछा और उनसे पहले डॉ0 पाण्डे ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;अभीप्सा तिवारी को जब बुलाया गया तब वह कुछ विचलित हुए . एक बार उनके मन में आया कि वह उससे कुछ न पूछकर केवल उसके पेरेण्ट्स के विषय में पूछें , लेकिन तत्काल अंदर से आवाज आयी ,'' डॉ0 तपिश ....क्या मूर्खतापूर्ण बात सोचने लगे .... इतना भावुक होकर अपने पद की गरिमा क्यों घटाने पर तुले हुए हो  ?''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;अभीप्सा ने चयन बोर्ड के सभी सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर दिए और सही -बेहिचक . लखनऊ विश्वविद्यालय से उसने प्रथम श्रेणी में एम.ए.  किया था , नेट उत्तीर्ण थी और पी-एच.डी.  कर रही थी . अभीप्सा एक हलचल थी उनके अंदर . उसके अतिरिक्त दो अभ्यर्थी और भी थे जिन्होंने सभी के प्रश्नों के सही उत्तर दिए थे . लेकिन उन दोनों के बजाय घूमफिर कर उनके दिमाग में अभीप्सा की नियुक्ति घूम रही थी . 'अभीप्सा ही क्यों  ?' मन के  एक कोने से प्रश्न उठा  ,'दूसरे अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय के छात्र हैं ..... उनमें कोई कमी भी नहीं है .... फिर तपिश तुम अभीप्सा के बारे में ही क्यों सोच रहे हो ! मानसी से जुड़ा अतीत तुम्हें परेशान कर रहा है ?'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt; उन्होंने विश्वविद्यालय के विभागाध्यसक्ष और डॉ0 तिवारी की ओर दृष्टि डाली . डॉ0 तिवारी साक्षकार समाप्त हो जाने के बाद डॉ0 निकिता सिंह से फुसफुसाकर कुछ कह रहे थे और वह स्वीकृति में सिर हिला रही थी . कांफ्रेंसरूम में सन्नाटा देर तक चहलकदमी करता रहा . बीच-बीच में कुछ कागजों की सरसराहट की आवाज हो जाती . तभी उन्होंने धण्टी बजायी  . वह सन्नाटे को तोड़ना चाहते थे  . गेट पर तैनात चपरासी दौड़ता हुआ आया  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''चाय ''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जी सर  .'' चपरासी के मुड़ते ही वह बोले  , ''किसके नाम पर विचार किया डॉ0 तिवारी  ? '' उन्होंने विभागाध्यक्ष और डॉ0 निकिता सिंह की ओर देखा .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'' रंजना श्रीवास्तव .....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''डा0 साहब रंजना आधे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं दे पायी थी.....'' डॉ0 प्रवीण राय विनम्रतापूर्वक बोले .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;उन्होंने पुन: विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष की ओर देखा . वह चुप थे  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर.... डॉ0 प्रवीण ठीक कह रहे हैं .'' डॉ0 शुक्ल की आवाज थी . डॉ.  शुक्ल ने कुछ अधिक ही प्रश्न किए थे रंजना श्रीवास्तव से . उन्होंने उससे यह भी पूछा था कि पी-एच.डी. के उसके निर्देशक कौन थे ! प्रश्न सुनकर पहले तो रंजना अचकचाई थी , फिर डॉ0 तिवारी की ओर देखती रही थी . वे यह देखकर उलझन में थे कि वह उनकी ओर क्यों देख रही थी . जब डॉ0 शुक्ल ने अपना प्रश्न दोहराते हुए कहा , ''रंजना श्रीवास्तव , आप डाक्टर साहब की ओर क्यों देख रही हैं  ? मेरे प्रश्न का उत्तर दें  .''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''जी , डाक्टर साहब मेरे निर्देशक थे .'' डॉ0 तिवारी की ओर इशारा करती हुई रंजना बोली थी .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;अब वह समझ पा रहे थे कि डॉ0 शुक्ल ने सोच-समझकर उस लड़की से वह प्रश्न किया था . शुक्ल को पहले से ही जानकारी रही होगी और बोर्ड के सभी सदस्यों को इस प्रकार वह इस बात से अवगत करवाना चाहते होगें . शायद उन्हें यह भी जानकारी रही होगी कि डॉ0 तिवारी रंजना श्रीवास्तव का ही चयन करना  चाहेगें .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;अभीप्सा के नाम का प्रस्ताव करने का विचार उन्हें त्यागना पड़ा था , क्योंकि डॉ. तिवारी डॉ. शुक्ल पर बरस पड़े थे . प्रवीण शुक्ल के पक्ष में बोल रहे थे और उनके तर्क थे कि जब रंजना श्रीवास्तव से अच्छे और उससे अधिक योग्य अभ्यर्थी हैं तब उसका चयन क्यो किया जाए ! &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;डॉ0 तिवारी और निकिता सिंह रंजना के पक्ष में अड़ गये . लगभग दो घण्टे तक बहस चलती रही . चाय के दो दौर समाप्त हो चुके थे  . निष्कर्ष के लिए शुक्ल और प्रवीण उनकी और हेड की ओर देखने लगे थे . हेड ने पूरी तरह मौन धारण किया हुआ था . शायद उन्हें पहले से ही यह ज्ञात था कि तिवारी अपने कंडीडेट के लिए सदैव की भांति अड़ेंगे . तिवारी के आड़े आना उन्हें उचित नहीं लगा . उन्होंने चुप का विकल्प चुन लिया था . तपिश बहुत देर तक अपने प्राध्यापकों और डॉ0 तिवारी के बीच छिड़ी बहस को सुनते रहे थे . उन्होंने विभागाध्यक्ष की ओर पुन: देखा . वह स्थितप्रज्ञ थे . अंतत: उन्होंने कहा , ''डॉ0 तिवारी , रंजना इस कॉलेज के लिए उपयुक्त नहीं रहेगी .... उसके बजाय आप किसी अन्य के नाम पर विचार करें तो अच्छा होगा  .''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं किसी और के नाम की संस्तुति नहीं करूंगा . यदि आप लोग करना भी चाहेगें तो मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा . ''डॉ0 तिवारी ने उबलते हुए कहा .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''मैं भी नहीं करूंगा  .'' डॉ0 निकिता सिंह के स्वर में भी उत्तेजना थी  .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;और बोर्ड निरस्त कर दिया गया था . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;जब कांफ्रेंस रूम से वह बाहर निकले अंधेरा हो चुका था . चपरासी , सेक्शन अफसर , दो क्लर्कों के अतिरिक्त चौकीदार ही वहां थे . टयूबलाइट्स और पीले बल्बों की रोशनी कॉलेज परिसर में फैेली हुई थी . किसी से बिना कुछ कहे वह रिशेप्शन की ओर बढ़ गए . प्रवीण उनके पीछे लपके  , लेकिन दूर से ही सूना पड़े रिशेप्शन को देख वह उल्टे पांव लौट पड़े थे अपने चैप्बर की ओर .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''सर , मैंने आपसे पहले ही कहा था  .... हमें दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा सर  ..... छ: महीने लग जाएगें ... लेकिन.....''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;'हुंह....'' विचारमग्न स्वर में वह बोले , ''तो सभी चले गए ?''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कौन सर ?'' प्रवीण ने उनके पीछे चलते हुए पूछा .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;''कोई नहीं .'' &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;और वह तेजी से अपने चैम्बर की ओर बढ़ गए थे  .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:100%;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-3053888733316762601?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/3053888733316762601/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=3053888733316762601&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3053888733316762601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3053888733316762601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='कहानी-२९'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S0Gy9UyirKI/AAAAAAAAANM/IWqjQ4caFdc/s72-c/1912200812235.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-5801912709524367616</id><published>2009-11-11T22:02:00.001-08:00</published><updated>2009-11-11T22:02:34.487-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-5801912709524367616?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/5801912709524367616/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=5801912709524367616&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/5801912709524367616'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/5801912709524367616'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/11/blog-post_2139.html' title=''/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' 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title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=4536442789589409771&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/4536442789589409771'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/4536442789589409771'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/11/blog-post_5815.html' title='कहानी के बारे में'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-516549028874787977</id><published>2009-11-04T08:53:00.000-08:00</published><updated>2009-11-04T09:07:24.859-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी -२८'/><title type='text'>कहानी - २८</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGxvcoQ5pI/AAAAAAAAAJY/pUnnPgaUoRA/s1600-h/cflowers1465.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400292856890975890" style="WIDTH: 107px; CURSOR: hand; HEIGHT: 90px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGxvcoQ5pI/AAAAAAAAAJY/pUnnPgaUoRA/s200/cflowers1465.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;दरिन्दे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;रूपसिंह चन्देल &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;आप भले ही यह सोचें कि यह किसी विश्वविद्यालय के किसी प्रोफेसर की कहानी है , जिसकी अधीनस्थ अधिकारी ने उसके विरुध्द यौन प्रताड़ना की लिखित शिकायत वाइस चांसलर से लेकर ऐसे मामलों के लिए गठित शिखर समितियों से की ; लेकिन वे लंबे समय तक कान में तेल डाले बैठे रहे और प्राफेसर साहब अपने मित्रों और परिचितों से शिकायतकर्ता पर दबाव डलवाते रहे कि वह शिकायत वापस लेकर अपनी नौकरी की रक्षा करे , क्योंकि उसकी नौकरी एडहॉक है । &lt;div&gt;&lt;br /&gt;मेरी कहानी न किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बनर्जी , चटर्जी , मुखर्जी , बाली , कमाली , सिंह , शर्मा की है और न ही वहां की किसी अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी मिस मोनिका या मीनाक्षी की । यह कहानी एक विशुध्द क्लर्क की है , जो एक सरकारी दफ्तर में काम करती थी . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;मैं जानता हूं कि पूरी कहानी सुनने के बाद आप यह कहेगें कि मेरी पात्रा विमला रस्तोगी ओैर प्रोफेसर के विरुध्द शिकायत दर्ज करवाने वाली उसकी अधीनस्थ अधिकारी अर्पिता वर्मा की कहानी में साम्यता है । आप यह भी कहेंगे कि विमला रस्तोगी को सताने वाला महानिदेशक वेणु कामथ और अर्पिता वर्मा से ' तुम्हारे पास बहुत कीमती.....' और 'सट जा या हट जा ' जैसे शब्द कहने वाले प्रोफेसर प्रद्योत सेन में कोई अंतर नहीं है . लेकिन दोनों में कुछ अंतर है ....... अर्पिता वर्मा की प्रताड़ना की कहानी एक पत्रकार को ज्ञात हुई , उसने उसे समझा और अपने राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित कर दिया . विश्वविद्यालय प्रशासन में कुछ सुगबुगाहट हुई . मेजें हिलीं , कुर्सियों में फुसफुसाहट हुई . वाइस चांसलर ने शिकायत न मिलने , कहीं डाक स्तर में पड़ी होने को लेकर मलाल व्यक्त किया . लेकिन बड़े विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का दिल बड़ा होता है . उन्होंने कहलवाया कि पीड़िता को शिकायत लिख भेजने के बजाय सीधे उनसे मिलकर पीड़ा व्यक्त करनी चाहिए थी . आखिर वह भी प्रोफेसर थे ...... अभी भी हैं . एक प्रोफेसर के विरुध्द एक अदने अधिकारी की शिकायत सुनना उनके कर्तव्य क्षेत्र में आता है . दण्ड-व्यवस्था बाद की बात है . शिकायत उन तक पहुंचनी चाहिए . पन्द्रह दिन बाद भी नहीं पहुंची तो शिकायतकर्ता को दुखी नहीं होना चाहिए . अर्जी कहीं अटक गई है .  सभी पर काम का बोझ है . फाइलों के बोझ तले अर्पिता वर्मा की अर्जी कहीं दबी होगी . शिक्षा के मंदिर का छोटा-बड़ा हर पुजारी बहुत व्यस्त है . लेकिन अर्जी का दम घुटने न पाएगा . अंतिम सांस तक वह निकलेगी और उन तक पहंच ही जाएगी . लेकिन वह सहृदय हैं ..... दयालु हैं और अर्पिता वर्मा को उन्होंने स्वयं आकर मिलने का संदेश दिया . वह गई और शिकायत ले ली गई . कृपालु वी.सी. ने दम साधकर प्रोफेसर प्रद्योत सेन के विरुध्द शिकायत सुनी और अर्पिता वर्मा के अपने चैम्बर से बाहर निकलने के बाद पत्रकार को दिल खोलकर कोसा जो छोटे-बड़े मसलों को एक-सा मानकर मनमाने ढंग से रिपोर्ट छाप देते हैं . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मित्र , विमला रस्तोगी किससे शिकायत करती ! तब तक यौन प्रताड़ना के विषय  में कोर्ट का सख्त आदेश न था और होता भी तब भी सरकारी दफ्तर , जहां अफसरों की तानाशाही किसी राजशाही ढंग से कार्यरत है , विमला रस्तोगी को मीडिया तक जाने का साहस न दे पाता । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;हां , आप ठीक कह रहे हैं । विश्वविद्यालयों में भी प्रोफेसरो की तानाशाही सरकरी अफसरशाही से कम नहीं है . पी-एच.डी. से लेकर नियुक्तियों तक .....सर्वत्र अराजकता व्याप्त है . आपकी सलाह महत्वपूर्ण है कि देश के सभी केन्दीय विश्वविद्यालयों की नियुक्तियां यू.पी.एस.सी. द्वारा संयुक्त विज्ञापन के आधार पर की जाएं   और प्राध्यापक से लेकर प्राफेसर तक के पद स्थानातंरणीय हों . शायद तब शिक्षा के मंदिरों में होने वाले भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लग सके . वर्ना प्रोफेसरों के कच्छे ढीले होने की  कहानियों पर विराम संभव नहीं और न ही अपने चहेतों की नियुक्तियों पर रोक . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;आपकी चिन्ता वाज़िब है । शिखर समितियां भी शिकायतों के बोझ से दबी हुई हैं . वर्षों पुरानी शिकायतों का निस्तारण वे नहीं कर पातीं . उनकी भी समस्याएं हैं . चार समितियां हैं और चारों के अधिकार क्षेत्र अलग हैं . चारों यही निर्णय नहीं कर पातीं कि कौन-सी शिकायत किसके अधिकार क्षेत्र की है ....हैं बेशक सभी यौन-प्रताड़ना से संबन्धित . किसी महिला प्राध्यापक को उसके सहयोगी ने प्रताड़ित करने का प्रयत्न किया तो किसी छात्रा को उसके प्रोफेसर ने . सभी शिकायतकर्ता अर्पिता वर्मा जैसी भाग्यशाली नहीं कि उन्हें वी.सी. बुला लेते या कोई पत्रकार तक उनकी पीड़ा पहुंच पाती . वी.सी. अति व्यस्त व्यक्ति ....देश-देशांतर के सेमीनारों आदि में उन्हें भाग लेना होता है . किस-किस की सुनें . अर्पिता वर्मा को सुन लिया यह क्या कम है ! &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;आप ठीक कह रहे हैं । अर्पिता वर्मा जैसी लड़कियां उगंलियों में गिनने योग्य हैं . लेकिन हैं .... कम से कम शिक्षा के मंदिरों में ऐसी लड़कियां हैं . यदि न होतीं तो शिखर समितियों के पास शिकायतों का जो पुलिन्दा पड़ा है , वह न होता . आप यह भी  कह सकते हैं कि यह पुलिन्दा पड़ा ही क्यों है ? भई , यह प्रश्न न्यायालय के संदर्भ में भी उठ सकता है . वहां न्याय पाने के लिए जिन्दगी ही गुजर जाती है . पहले ही कहा , इसका सीधा कारण काम के बोझ से है . शिखर समितियों के पास कितना काम है ..... इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते . लेकिन आप इस बात से दुखी क्यों हैं कि अपराधी उन्मुक्त घूमते हैं , दूसरों को प्रताड़ित करने की जुगत खेजते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यदि कभी कुछ कार्यवाई हुई भी उनके विरुध्द तो उन्हें मात्र चेतावनी दी जाती है , या तीन इन्क्रीमेण्ट रोक दिए जाते हैं या ......केवल एक ही मामला है इस विश्वविद्यालय के इतिहास में कि यौन-प्रताड़ना प्रकरण में एक प्रोफेसर साहब को नौकरी गंवानी पड़ी थी . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन विमला रस्तोगी एक सरकारी दफ्तर में नौकरी करती थी , जहां किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत करना अपराध था । उसकी सजा नौकरी से बर्खास्तगी या स्थानांतारण था . आप कहते हैं कि बर्खास्तगी विश्वविद्यालय में भी होती है . बताया न कि इस विश्वविद्यालय के इतिहास में केवल एक ही प्रोफेसर को नौकरी से हटाया गया . हां , नौकरी जाती है उन्हीं की जो अनुबन्ध पर या एडहॉक होते हैं . नियमित की बर्खास्तगी आसान नहीं . आपने ही बताया कि वहां ' यूनियन ताकतवर है '..... . आप सही कहते हैं . शिक्षकों की यूनियन ताकतवर है . उनकी मांगों के सामने सरकार तक घुटने टेक देती है . वह हड़ताल की धमकी देती है और सरकार दुम हिलाती नजर आती है . लेकिन मित्र , कर्मचारी यूनियन यदि ताकतवर होती तो स्थिति ही कुछ और होती . मुझे लगता है कि इस यूनियन में अवसरवादी बैठे हैं जो अपने निजी लाभ के लिए उच्चाधिकारियों के विरुद्ध आवाज उठाना पसंद नहीं करते . और यदि करते हैं तो केवल अपने हित साधन के लिए . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैं चाहता हूं कि अब आप चुप रहें . विमला रस्तोगी की चर्चा चलते ही यदि आप अर्पिता वर्मा या विश्वविद्यालय के प्रसंग छेड़ते रहे तो मैं विमला रस्तोगी की बात आप तक नहीं पहुंचा पाऊंगा , जिसे मैं ही पहुंचा सकता हूं क्योंकि मैं उसका सहयोगी जो था .&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;विमला रस्तोगी ने बी।ए. किया ही था कि उसके पिता की मृत्यु हो गयी . उन दिनों कर्मचारी की मृत्यु पर परिवार के किसी सदस्य , पत्नी या बच्चे को , अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल जाती थी . विमला रस्तोगी पिता के स्थान पर क्लर्क बनकर महानिदेशालय कार्यालय में आयी . उन्हीं दिनों यू.डी.सी. के रूप में मैं भी उस कार्यालय में नियुक्त हुआ . विमला को मेरे ही अनुभाग में टाइपिगं के काम में लगाया गया . तीखे नाक-नक्श की सुन्दर लड़की थी वह , जिसके बाल कमर से नीचे तक लटकते रहते थे , जिनमें वह दो बेड़ियां गूंथतीं थी . और जब वह चलती तब दोनों चोटियां सर्पिणी की भांति नितम्बों पर हिलती-डुलती रहतीं थीं . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;महानिदेशक कार्यालय का यह नियम था , हो सकता है उस विश्वविद्यालय में भी हो , कि जो भी नया व्यक्ति वहां नियुक्त होकर आता , दो-चार दिन में उसकी पेशी महानिदेशक वेणु कामथ के सामने अवश्य होती । मेरी भी हुई और मैंने पाया कि वेणु कामथ बहुत मधुर ओर सौम्य स्वभाव का व्यक्ति था . साक्षात्कार के दोरान मेरी टांगे और आवाज कांप रही थीं , क्योंकि अनुभाग वालों ने कहा था कि दबकर ही उत्तर दूं ..... साहब नाराज न हों , खयाल रखूं  . इससे मैं भयभीत था . शायद कामथ ने यह समझ लिया था और साहस देते हुए कहा था कि ईमानदारी से अपना काम करूं और यदि कोई पेरेशानी अनुभव करूं तब पी.ए. के माध्यम से उनसे मिलकर बताऊं .  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;महानिदेशक के कमरे से बाहर आया तब मैं कुछ और ही था . भय जा चुका था , क्योंकि कामथ ने मुझसे प्रेम से बात की थी और जब विमला रस्तोगी की पेशी हुई , उसे मुझसे भी अधिक प्यार-दुलार से कामथ ने समझाया. विमला भी गदगद थी . वह मित-भाषी थी . अधिकतर अपनी ही सीट पर चिपकी रहने वाली . कभी बात भी करती तो मुझसे , क्योंकि मैंने उससे एक सप्ताह पहले  ज्वाइन किया था .&lt;br /&gt;महानिदेशक कार्यायल में उन दिनों दस और महिलाएं थीं । लंच के समय वे एक साथ लंच करतीं . उनके आग्रह पुनराग्रह से विमला उनके साथ लंच करने लगी थी . मेरे परिचितों का दायरा भी बढ़ने लगा था . मैं भी लंच में दो-चार बाबुओं के साथ घूमने जाने लगा . एक दिन एक सहयोगी बोला , ''छ: महीने बीतने को आए , कामथ ने विमला रस्तोगी को याद नहीं किया ?'' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;''क्यों ?'' मैंने पूछा । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;सहयोगी के चेहरे पर व्यंग्य मुस्कान थी , ''तुझे कुछ नहीं मालूम ?'' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;''क्या ऽऽऽ ?''  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;''शिकार ।'' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;''कैसा ?'' मैं चौंका था । सहयोगी , जो तीन थे , ठठाकर हंसे थे . हम आईसक्रीम वाले के पास थे . आईसक्रीम ली गई और बात आई गई हो गई थी . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;और ठीक उसके अगले सप्ताह सुबह दस बजे प्रशासनिक अनुभाग पांच  , जिसका काम अफसरों और उनके बीबी-बच्चों और बंगलों का खयाल रखना था , का अनुभाग अधिकारी विमला रस्तोगी के पास झुका हुआ कुछ फुसफुसा रहा था  । विमला  रस्तोगी एक सादा कागज और पेन लेकर उसके पीछे हो ली थी . अनुभाग के बाबुओं ने आंखों ही आंखों में एक-दूसरे से कुछ बातें की थीं . मेरा अनुभाग अधिकारी फाइल पर सिर झुकाए कोई नोट तैयार कर रहा था . उसका चेहरा लाल हो उठा था और उसका हाथ कांप रहा था . सच यह था कि अनुभाग के सभी बाबुओं के चेहरों पर तनाव था . उन्हें लग रहा था कि अनुभाग पांच का अनुभाग अधिकारी उनकी मांद में घुसकर बकरी उठा ले गया था और वे विवश थे कि अपना विरोध भी न जता सके थे . क्षणभर बाद ही सभी के सिर गर्दनों पर यों लटक गए थे मानों वे मुर्दा थे . मैं भौंचक एकाधिक बार उन्हें देख काम करने का प्रयत्न करने लगा था .  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;बीस मिनट भी न बीते थे कि विमला रस्तोगी दरवाजे पर प्रकट हुई । उसका चेहरा पीला और आंसुओं से भीगा हुआ था . सीट पर बैठते ही उसने टाइप राइटर पर सिर रख लिया और सुबक-सुबक कर रोने लगी . उसके आते ही मेरा अनुभाग अधिकारी फाइल दबा कमरे से बाहर निकल गया . अनुभाग के अन्य चारों बाबू क्रमश: एक-एक कर मुझसे यह कहकर चले गए कि वे चाय पीने जा रहे थे . मैं विमला रस्तोगी से कुछ पूछना चाहता था , लेकिन पूछ नहीं सका . भय , जुगुप्सा और आंशका के मिले-जुले भाव ने मुझे घेर लिया और मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा बैठा रहा . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक घण्टा बीत गया । इस बीच अनुभाग अधिकारी फाइल दबाए दबे पांव कमरे में प्रकट हुआ . उसका चेहरा अभी भी लाल था . बिना बोले नयी फाइल पर सिर झुका वह कुछ पढ़ने लगा था . मैं समझ रहा था कि वह पढ़ नहीं रहा था केवल पढ़ने का बहाना कर रहा था . अनुभाग अधिकारी के बाद एक-एक कर चारों बाबू आ गए और अपनी सीटों पर सिर झुकाकर बैठ गए . विमला रस्तोगी अभी -भी टाइपराइटर पर सिर रखे थी . कमरे में मृत्यु -सा सन्नाटा व्याप्त था . सन्नाटा प्रशासनिक अनुभाग दो के अनुभाग अधिकारी के आने से टूटा . उसके हाथ में एक आदेश की तीन प्रतियां थीं . उसने दरवाजे से ही आवाज दी , ''विमला रस्तोगी ऽऽऽ!''    &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;वह एक दक्षिण भारतीय था .....संभवत: तमिल । उसे हिन्दी नहीं आती थी . विमला ने सिर नहीं उठाया . अनुभाग अधिकारी की आवाज कुछ ऊंची और तीखी हो उठी , ''आपको दफ्तर का डिसिप्लिन नईं मालूम ?'' अंग्रेजी में वह बोला . विमला ने सिर उठाया . आंसुओं की लकीरें उसके मुर्झाए चेहरे पर स्पष्ट थीं . आंखें सूजी हुई थीं . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;''ये आपका ट्रांसफर आर्डर है । रिसीव करें .....'' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;विमला का चेहरा फीका पड़ गया । वह शायद नहीं समझ पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए . तभी सामने खड़ा व्यक्ति तमिल लहजे में अंग्रेजी में चीखा , '' जल्दी कीजिए और इसे लेकर तुरंत दफ्तर से चली जाइए . डी.जी. साहब का आदेश है . शुक्र है नौकरी नई गई . अभी प्रोबेशन पर है ..... और नखरे तो देखो.....'' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;वह क्षणभर के लिए रुका , ''दस दिन का ज्वाइनिगं टाइम दिया है । आपको चेन्नई के निदेशक कार्यालय में रिपोर्ट करना मांगता . ओ.के......ऽऽ '' &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;विमला ने कांपते हाथों ट्रांसफर आर्डर ले लिया । प्रशासन दो का अनुभाग अधिकारी मेरे अनुभाग अधिकारी से उसी कड़क स्वर में बोला , ''मिस्टर सिंह , एक कॉपी आपके लिए .....'' और रिसीव करने के लिए उसने तीसरी प्रति सिंह के आगे बढ़ा दी . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;विमला रस्तोगी झटके से उठी । रूमाल से चेहरा पोछा . एक दृष्टि सब पर डाली . मुझे लगा शायद उस समय वह कहना चाह रही थी , ''तुम सब कापुरुष हो ....सब ........'' संभव है वह कुछ और ही कहना चाह रही हो . यह भी संभव है कुछ कहना ही न चाहती हो . बहरहाल , वह पर्स झुलाती कमरे से बाहर निकल गई थी किसी से कुछ कहे बिना  . उस समय उसकी चाल में शिथिलता न थी ..... समर्पण के बजाए उसने सजा स्वीकार कर ली थी . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;विमला रस्तोगी पर अपने दो छोटे भाइयों और मां का बोझ था , लेकिन वह चेन्नई नहीं गयी थी . पता चला उसने त्याग पत्र दे दिया था .&lt;br /&gt;******* &lt;br /&gt;आपकी बात सही है कि अर्पिता वर्मा प्रकरण ने आज मुझे सहसा विमला रस्तोगी की याद दिला दी . लेकिन मित्र , इस देश में हजारों -हजारों अर्पिता वर्मा और विमला रस्तोगी हैं , जिन पर न किसी पत्रकार की दृष्टि पड़ी न किसी लेखक की और दरिन्दों का खेल बदस्तूर जारी है .&lt;br /&gt;******&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-516549028874787977?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/516549028874787977/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=516549028874787977&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/516549028874787977'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/516549028874787977'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/11/blog-post_04.html' title='कहानी - २८'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGxvcoQ5pI/AAAAAAAAAJY/pUnnPgaUoRA/s72-c/cflowers1465.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-6821517153558994390</id><published>2009-11-04T08:12:00.000-08:00</published><updated>2009-11-04T08:16:29.500-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी -२७'/><title type='text'>कहानी-२७</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGoOfQfCqI/AAAAAAAAAJI/68ccyarnD-M/s1600-h/bloomroses16.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400282395056212642" style="WIDTH: 113px; CURSOR: hand; HEIGHT: 95px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGoOfQfCqI/AAAAAAAAAJI/68ccyarnD-M/s200/bloomroses16.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरण के संबन्ध में उसे इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में वक्तव्य देना था। हारवर्ड विश्वविद्यालय से 'पर्यावरण प्रबन्धन ' की उपाधि लेकर जब एक साल पहले वह स्वदेश लौटा, सरकार के पर्यावरण विभाग ने उसकी सेवाएँ लेने के लिए कई प्रस्ताव भेजे। लेकिन स्वयं कुछ करने के उद्देश्य से उसने सरकारी प्रस्तावों  पर उदासीनता दिखाई। वह जानता है कि ऐसी किसी संस्था से बँधने से उसकी स्वतंत्रोन्मुख सोच और विकास बाधित होंगे। वह स्वयं को अपने देश तक ही सीमित नहीं रखना चाहता, बावजूद इसके कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ देश के लिए देना चाहता है।&lt;br /&gt;पर्किंग से गाड़ी निकालते समय पिता ने पूछा, ''अमि, (उसका पूरा नाम अमित है ) कब तक लौट आओगे?''''दो घण्टे का सेमीनार है बाबू जी।.... नौ तो बज ही जाएँगे।'' पिता चुप रहे, लेकिन वह सोचे बिना नहीं रह सका, 'अवश्य कोई बात है, वर्ना बाबू जी उसके आने के विषय में कभी नहीं पूछते।' गेट से पहले गाड़ी रोक वह उतरा और 'कोई खास बात बाबू जी?'' पूछा।''हाँ....आं.....'' बाबू जी मंद स्वर में बोले, ''मेरा मित्र अमृत है न!..... उसकी बेटी की शादी है।...रोहिणी में....''''सेमीनार खत्म होते ही निकल आऊँगा।''&lt;br /&gt;''तुम परेशान मत होना। मैं ऑटो ले लूँगा।....'' बाबू जी ने सकुचाते हुए कहा।&lt;br /&gt;''कार्यक्रम आठ बजे समाप्त हो जाएगा। लोगों से बिना मिले निकल आऊँगा..... यहाँ पहुँचने में एक घण्टा तो लग ही जाएगा, लेकिन आप ऑटो के चक्कर में नहीं पड़ेंगे.....मैं आ जाऊँगा।'' उसने पिता को बॉय किया और गाड़ी स्टार्ट कर सड़क पर उतर गया।&lt;br /&gt;******  &lt;br /&gt;अमित जब हारवर्ड पढ़ने गया था, माँ जीवित थीं। पिता रेल मंत्रालय से निदेशक पद से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। माँ-बाप का वह इकलौता बेटा था। उन लोगों ने कभी अपनी इच्छाएँ उस पर नहीं थोंपीं, लेकिन उसने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। हारवर्ड जाने के एक वर्ष बाद ही माँ का निधन हो गया। पिता अकेले रह गये। पटेल नगर के तीन सौ वर्ग गज के उस मकान में नितांत एकाकी। उसने वापस लौटने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन पता ने पहली बार उसे सख्त आदेश सुनाया, ''मेरे लिए लौटने की बात तुम्हारे दिमाग में आयी कैसे अमि.... अपनी शिक्षा पूरी करो।... '' कुछ देर तक चुप रहे थे बाबू जी और वह सिर झुकाए उनके सामने बैठा रहा था। तब वह माँ के दसवें पर आया था।&lt;br /&gt;''तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना चाहिए।....अलग बनना चाहिए। मेरे लिए अगले दस वर्षों तक तुम्हें सोचने की आवश्यकता नहीं है। नौकरी से अवकाश ग्रहण किया है।... शरीर और मन से नहीं। वंदना।...तुम्हारी माँ थी तो अधिक बल था, लेकिन।...'' पिता फिर चुप हो गए थे। अतीत में खो गए थे वह। कुछ देर की चुप्पी के बाद वह धीमे स्वर में फिर बोले, ''तुम्हें कुछ ऐसा करना है, जिससे देश-समाज....देशान्तर को लााभ पहुँचे।....नौकरी सभी कर लेते हैं, लेकिन दुनिया उससे आगे भी है.....''&lt;br /&gt;अमित चुपचाप पिता की ओर देखता रहा था।&lt;br /&gt;पढ़ाई समाप्त कर लौटने के बाद पिता ने केवल एक बार पूछा, ''क्या करना चाहते हो?''&lt;br /&gt;''फिलहाल नौकरी नहीं।...अपना कुछ करने के विषय में सोच रहा हूँ।''&lt;br /&gt;''अपना।....?''&lt;br /&gt;''पर्यावरण सम्बन्धी एक संस्था स्थापित करना चाहता हूँ.......''&lt;br /&gt;''हुँह ।'' कुछ देर की चुप्पी के बाद।....कुछ सोचते हुए पिता बोले, ''अच्छा विचार है।''&lt;br /&gt;संस्था को लेकर उसने देश के पर्यावरणविदों से सलाह करना प्रारंभ कर दिया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने पहले उसे अपने सेमीनारों में श्रोता के रूप में, फिर वक्ता के रूप में बुलाना प्रारंभ कर दिया था । &lt;br /&gt;*******   &lt;br /&gt;सेमीनार खत्म होते ही वह निकलने लगा। चाहता था कि कोई उसे देखे, टोके-रोके, उससे पहले ही वह गाड़ी में जा बैठे, लेकिन वैसा हुआ नहीं। वह हाल से बाहर निकला ही था कि सामने दिल्ली के प्रसिध्द पर्यावरणविद डॉ. मुरलीधरन टकरा गए।&lt;br /&gt;''क्या खूब बोलते हो नौजवान!'' पकी दाढ़ी और सफेद बोलों में स्पष्ट वैज्ञाानिक दिखनेवाले मुरलीधरन बोले, डॉ. सुनीता नारायण को तुम जैसे युवकों से परामर्श लेना चाहिए। ''&lt;br /&gt;''सर, वह बहुत विद्वान हैं।.... विश्व में उनकी पहचान है। मैं तो अभी।...''&lt;br /&gt;''यही न कि अभी कम उम्र - कम अनुभवी हो!'' ठठाकर हंसे मुरीधरन तो वह संकुचित हो उठा।&lt;br /&gt;दोनों देर तक चुप रहे। अंतत: कुछ सोचकर, शायद यह भांपकर कि उसे चलने की जल्दी है, मुरलीधरन बोले, ''ओ। के। यंगमैन, हम फिर मिलेंगें। ''&lt;br /&gt;''जी सर।'' वह गाड़ी की ओर बढ़ा यह सोचते हुए कि अनुभवी लोग चेहरे से ही अनुमान लगा लेते हैं कि कोई क्या सोच रहा है।'&lt;br /&gt;******  &lt;br /&gt;वह सामान्य गति से गाड़ी चला रहा था। कभी तेज गाड़ी चलाता भी नहीं वह। दिल्ली की सड़कें और ट्रैफिक की अराजकता।.... वह पैंतालीस-पचास तो कहीं -कहीं बीस-तीस की गति से चला रहा था। तालकटोरा स्टेडियम के पास गोल चक्कर पर टै्रफिक कुछ अधिक था। उसकी गाड़ी रेंग-सी रही थी। तभी उसके बगल में हट्टा -कट्टा लगभग बत्तीस वर्ष के युवक ने अपनी पल्सर रोकी और चीखता हुआ बोला, ''गाड़ी चलानी नहीं आती? गाड़ी (मोटरसाइकिल)  को टक्कर मार देता अभी।''&lt;br /&gt;वह भौंचक था, क्योंकि उसकी जानकारी में कुछ हुआ ही नहीं था। उसने धीमे और सधे स्वर में, जैसा कि उसका स्वभाव था, कहा, ''टक्कर लगी तो नहीं! ''&lt;br /&gt;वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही मोटर साइकिल सवार ने मोटर साइकिल आगे बढाकर उसकी कार के आगे लगा दी। वह गोल चक्कर पारकर शंकर रोड चौराहे की ओर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था। उसने गाड़ी रोक दी। मोटरसाइकिल सवार युवक उसकी ओर झपटा। वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने उसे गाड़ी से बाहर खींचा और फुटपाथ की ओर घसीटने लगा।&lt;br /&gt;''बात क्या है।... आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?'' विरोध करता हुआ वह उसकी मजबूत पकड़ के समक्ष अपने को असहाय पा रहा था।&lt;br /&gt;''तेरी माँ की।....बताता हूँ कि बात क्या है।....मादर।...के कहता है कि लगी तो नहीं।...'' युवक का झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। वह लड़खड़ा गया। उसे चक्कर -सा आ गया। जब तक वह संभलता मोटर साइकिल सवार का दूसरा तमाचा उसके दूसरे गाल पर पड़ा।&lt;br /&gt;पैदल चलने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गयी। लेकिन कोई भी वाहन वाला नहीं रुका। भीड़ मूक दर्शक थी और मोटर साइकिल सवार युवक दरिन्दे की भांति उस पर लात-घूँसे बरसा रहा था। लगभग अधमरा कर उसने उसे छोड़ दिया और फुटपाथ से नीचे उतरकर घूरकर उसे देखने लगा। अमित फुटपाथ पर पसरा हुआ था।... निस्पंद। भीड़ में कुछ लोग अपनी राह चल पड़े थे। कुछ खड़े थे।..... लेकिन उनमें अभी भी साहस नहीं था कि वे अमित को उठा सकते, क्योंकि मोटर साइकिल सवार वहीं खड़ा था अमित को घूरता हुआ।&lt;br /&gt;लगभग दस मिनट बाद उसने आँखें खोलीं और किसी प्रकार उठकर बैठा। बैठते ही उसका हाथ मोबाइल पर गया। उसका दिमाग, जो सुन्न था, अब काम करने लगा था। पिता को यह बताने के लिए कि पहुँचने में उसे कुछ देर हो जाएगी, वह उनका नम्बर मिलाने लगा। उसे नम्बर मिलाता देख मोटर साइकिल सवार झपटकर फुटपाथ पर चढ़ा और उससे मोबाइल छीनते हुए उसके जबड़े पर मारकर चीखा, ''धी के..... पुलिस को फोन करता है।....स्साले इतने से ही सबक ले।... शुक्र मना कि बच गया।...'' उसने अमित का फोन अपनी जेब के हवाले किया, मोटर साइकिल स्टार्ट की और अमित के इर्द-गिर्द खड़े लोगों को हिकारत से देखता हुआ तेज गति से शंकर रोड चौराहे की ओर मोटर साइकिल दौड़ा ले गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अमित फिर फुटपाथ पर लेट गया। भीड़ फुसफुसा रही थी ''अस्पताल ले जाना चाहिए....''  ''कैसा दरिन्दा था! रुई की तरह धुन डाला.....''''पुलिस को फोन करना चाहिए।''''पुलिस के लफड़े में पड़ना ठीक नहीं।''''वह कोई गुण्डा था!''''दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।....''''दिल्ली गुण्डों।.......बाइकर्स के आंतक में जी रही है और पुलिस असहाय है।''''भाई पुलिस वालों के वे साले जो लगते हैं।...हफ्ता पुजाते हैं। असहाय-वसहाय कुछ नहीं है..... जिसने हफ्ता नहीं दिया..... हवालात उसके लिए है।'' एक दूसरी आवाज थी।''राम सेवक....तुम्हें गाड़ी चलानी आती है न! '' किसी ने अपने साथी से पूछा।''आती है।''''फिर हम दोनों इन्हें राममनोहर लोहिया अस्पताल ले चलते हैं।...इन्हीं की गाड़ी में।...''अमित सभी को सुन रहा था। उसने आंखें खोलीं। दो लोग उसके ऊपर झुके हुए थे। दूसरे कुछ हटकर खड़े थे।''बाबू।...हम आपको अस्पताल पहुँचा देते हैं।''अमित चुप रहा।&lt;br /&gt;''हाँ, आपकी ही गाड़ी से।....''''धन्यवाद।'' अमित फुसफुसाकर बोला, ''आप लोग कष्ट न करें।...मैं ठीक हूँ।''&lt;br /&gt;रामसेवक और उसका साथी एक-दूसरे के चेहरे देखते कुछ देर खड़े रहे, फिर बिड़ला मंदिर की ओर मुड़कर चले गए। दूसरे ने पहले ही जाना प्रारंभ कर दिया था।&lt;br /&gt;लगभग पन्द्रह मिनट बाद अमित ने साहस बटोरा और उठ बैठा। सिर अभी भी चकरा रहा था। उसे चिन्ता हो रही थी उसकी प्रतीक्षा करते बाबू जी की। वह अपने को रोक नहीं पाया। आहिस्ता से फुटपाथ से नीचे उतरा, गाड़ी में बैठा और चल पड़ा। एक्सीलेटर, ब्रेक और क्लच पर पैर ढंग से नहीं पड़ रहे थे। फिर भी वह धीमी गति से गाड़ी चलाता रहा।&lt;br /&gt;******* &lt;br /&gt;राजेन्द्र नगर की रेड लाइट तक पहुँचने में उसे काफी समय लगा। चौराहा पार कर वह किसी पी.सी.ओ. से पिता को फोन करना चाहता था। लेकिन जैसे ही वह रेड लाइट के निकट पहुँचा, वहाँ का दृश्य देख उसे चक्कर-सा आता अनुभव हुआ। रेड लाइट से कुछ पहले बाईं ओर एक मोटर साइकिल पड़ी हुई थी और उससे कुछ दूर एक युवक के इर्द-गिर्द खड़े कई लोग पुलिस को कोस रहे थे।&lt;br /&gt;उसने सड़क किनारे गाड़ी खड़ी की।.... उतरा। कुछ देर पहले अपने साथ हुआ हादसा उसके दिमाग में ताजा हो उठा, ' तो यह उस युवक का नया शिकार था।' उसने सोचा और धीमी गति से आगे बढ़ा। चोट के कारण वह तेज नहीं चल पा रहा था।&lt;br /&gt;''टक्कर इतनी जबरदस्त थी।..... शुक्र है कि गाड़ी इसके ऊपर से नहीं गुजरी।'' भीड़ में कोई कह रहा था।&lt;br /&gt;''किस गाड़ी ने टक्कर मारी?'' कोई पूछ रहा था।&lt;br /&gt;'' ब्लू लाइन बस थी ।....मैंने देखा।....मैं उस समय उधर पेशाब कर रहा था '' कहने वाले ने हाथ उठाकर पेशाब करने की जगह की ओर इशारा किया। ''तेज आवाज हुई तो मैंने मुड़कर देखा।'' बोलने वाला क्षणभर के लिए रुका, ''बस ने टक्कर नहीं मारी भाई जान! मोटरसाइकिल इतनी तेज थी।....इतनी।... रहा होगा ये सौ से ऊपर की स्पीड में।...यही टकराया बस से और मोटर साइकिल इधर और यह उधर।...बच गया। लेकिन चोट बहुत है।''&lt;br /&gt;अमित आगे बढ़ा।&lt;br /&gt;''कितनी देर हुई? '' उसने एक व्यक्ति से पूछा।''यही कोई आध घण्टा।...''''आध घण्टा।...और आप लोग खड़े इसे देख रहे हैं? पुलिस को किसी ने सूचित किया?'' वह यह कह तो गया लेकिन तत्काल सोचा कि अपरिचित राहगीरों से उसे इसप्रकार नहीं बोलना चाहिए था।&lt;br /&gt;अमित के प्रश्न पर मौन छा गया था। कुछ देर बाद किसी की बुदबुदाहट सुनाई दी, ''पी.सी.आर. वैन यहीं खड़ी रहती है।... आज नदारत है।''''पुलिस को फोन करके कौन मुसीबत मोल ले।'' भीड़ में कोई और बुदबुदाया।&lt;br /&gt;अमित चुप रहा। वह घायल युवक के पास पहुँचा और उसे देख भोंचक रह गया। वह वही युवक था जिसने कुछ देर पहले अकारण ही बुरी तरह उसे पीटा था।&lt;br /&gt;' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँ? ' अमित के  मन में विचार कौंधा।'कदापि नहीं।' लेकिन तभी अंदर से एक आवाज आयी, ' अमित, तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना है।....अलग बनना है,' यह पिता की आवाज थी।' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँगा।...राम मनोहर लोहिया अस्पताल पास में है।' उसने निर्णय कर लिया और वहाँ एकत्रित लोगों से बोला, ''आप लोग इतनी सहायता करें कि इसे उठाकर मेरी गाड़ी में पीछे की सीट पर लेटा दें। इसे अस्पताल ले जाऊँगा।''''मैं भी आपके साथ चलता हूँ।'' एक व्यक्ति बोला।''आप परेशान न हों।...केवल गाड़ी में इसे लेटा दें....बस।....''&lt;br /&gt; ******  &lt;br /&gt;अस्पताल में जिस समय एमरजेंसी के सामने उसने गाड़ी रोकी मोटर साइकिल सवार को होश आ गया। उसे देख कराहते हुए वह चीखा, ''तुम.....तुम....sss '' और वह फिर बेहोश हो गया था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-6821517153558994390?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/6821517153558994390/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=6821517153558994390&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/6821517153558994390'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/6821517153558994390'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='कहानी-२७'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SvGoOfQfCqI/AAAAAAAAAJI/68ccyarnD-M/s72-c/bloomroses16.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-3634306886196321010</id><published>2009-10-21T07:34:00.001-07:00</published><updated>2009-10-21T07:44:41.656-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी - २६</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/St8cVXdLIrI/AAAAAAAAAI4/FUrBYuWj1Sk/s1600-h/Avadesh-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395062032012354226" style="WIDTH: 142px; CURSOR: hand; HEIGHT: 138px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/St8cVXdLIrI/AAAAAAAAAI4/FUrBYuWj1Sk/s200/Avadesh-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;खण्डित स्वप्न&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;     &lt;br /&gt;  &lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;कॉलेज में आज भी मीटिंग देर से समाप्त हुई . जब वे घर पहुंची , साढ़े जीन बज रहे थे . दरवाजा खोलते ही नौकरानी पूछ बैठी , ‘‘बीबीजी , आज फिर देर कर दी .....’’ लेकिन उसकी बात का उत्तर दिए बिना उससे जल्दी खाना लगा देने के लिए कहकर बिना कपड़े बदले ही वह बाथरूम चली गयीं और जब बाहर निकलीं , उनके चेहरे से दिन भर की थकान के चिन्ह मिट चुके थे .&lt;br /&gt;पेट में चूहों को धमाचैकड़ी करते दो घंटे से अधिक हो चुके थे . वे सीधे डाइनिंग रूम में जा पहुंचीं . रोजाना की भांति रामकली ने टेबुल पर खाना सजा दिया था .वे खाना शुरू ही करने वाली थीं कि रामकली ने उन्हें एक लिफाफा पकड़ा दिया . बोली , ‘‘मुआ डाकिया  लिफाफा दे ही नहीं रहा था . कहता था मेम सा‘ब के नाम है , मैं उन्हीं को दूंगा . बड़ी मुश्किल से माना .’’ कहकर वह उनकी प्रतिक्रया जानने के लिए उनकी ओर देखने लगी . लेकिन दीपाली ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की . वे उलट-पलटकर लिफाफे को देखती रहीं .&lt;br /&gt;आखिर उन्होंने लिफाफा खोल डाला . उसमें जो कुछ था , उसे देख उनका मन उद्वेलित हो उठा , मानो सरोवर के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया गया हो .उन्होंने कागजों को मेज पर रख दिया और रामकली को वहां से जाने के लिए कहा . उसके जाने के बाद सिर को कुर्सी से टिकाकर वे सोचने लगीं , ‘तो विजय के साथ संबन्धों की यही अंतिम परिणति होनी थी .... इतने दिनों में ही सब कुछ बेमानी हो गया --- प्रेम...रिश्ते....इंसानियत....’ और वे धीरे-धीरे अतीत की अंधेरी गुफाओं में धंसती चलीं गयीं .&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;उन दिनों वे एम. ए. फाइनल में थीं . प्रतिवर्ष की भांति उस वर्ष भी कॉलेज के वार्षिकोत्सव के अवसर पर छात्र संघ की ओर से एक नाटक मंचित होना था . नाटक था ‘आभिज्ञान शाकुन्तल’ . छात्रसंघ के सामने एक गंभीर संमस्या पैदा हो गयी -- शकुन्तला की भूमिका को लेकर . कॉलेज की कोई भी छात्रा उस भूमिका के लिए तैयार न थी . वार्षिकोत्सव के दिन निकट आते जा रहे थे , रिहर्सल शुरू हो चुकी थी , लेकिन शकुन्तला का स्थान रिक्त था . तभी एक दिन छात्र संघ के अध्यक्ष महेन्द्र के साथ विजय उनके पास आए  . काफी देर तक वे शकुन्ला के अभिनय के लिए उन्हें समझाते रहे  . उन्होंने दूसरे दिन अपना निर्णय बताने के लिए कहकर उन्हें टाल दिया था .&lt;br /&gt;लेकिन कॉलेज से घर वापस जाते समय पूरे रास्ते वे सोचती रही  कि वे शकुन्तला का अभिनय कर सकती हैं या नहीं .... और घर तक पहुंचते-चहुंचते इस निर्णय पर पहुंची कि वे यह अभिनय कर सकेंगी . और दूसरे दिन महेन्द्र और विजय को उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी थी .&lt;br /&gt;वार्षिकोत्सव के दिन नाटक मंचित हुआ . दुष्यन्त का अभिनय विजय कर रहे थे . नाटक बहुत सफल रहा था . नगर में दोनों के अभिनय की चर्चा थी . समाचारपत्रों ने विशेष प्रशंसात्मक टिप्पणियों के साथ उन दोनों के चित्र प्रकाशित किये थे . नाटक की सफलता के बाद वे और विजय अनायास ही एक-दूसरे के निकट आ गये थे . विजय उनके सहपाठी थे और उसके बाद प्रायः ही उनके घर आने लगे थे . धीरे-धीरे वे महसूस करने लगी थीं कि वे वास्तव में ही शकुन्तला हैं और विजय दुष्यन्त .एक दिन वे फूलबाग में टहल रहे थे . टहलते हुए अचानक विजय रुक गये और दोनों कन्धों के पास उन्हें पकड़कर बोले , ‘‘दीपा , मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रहा था . ’’&lt;br /&gt;‘‘कहो .’’ उन्होंने जिज्ञासा-भरी नजरें विजय के चेहरे पर गड़ा दी थीं .&lt;br /&gt;‘‘यह , मैं नहीं जानता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो , लेकिन सच मानों तुम्हें लेकर मैं तमाम स्वप्न ....’’ आगे वह कुछ बोल न पाये थे .&lt;br /&gt;वे भी उस क्षण भावुक हो उठी थीं . बिना बोले ही विजय की आंखों में कितनी ही देर तक देखती रही थीं और उन्होंने  उन आंखों में साकार होने के लिए मचलते हजारों स्वप्न देखे थे .&lt;br /&gt;क्षणभर बाद उन्हें झकझोरते हुए विजय ने पूछा था , ‘‘पागलों की तरह क्या देख रही हो , दीपा ?’’&lt;br /&gt;‘‘कुछ नहीं .... अच्छा , अब चला जाये . बहुत देर हो गयी ..’’&lt;br /&gt;और दोनों चल पड़े थे .&lt;br /&gt;*****      &lt;br /&gt;उस दिन के बाद विजय का अधिकांश समय उनके साथ ही बीतने लगा था . विजय के प्रस्ताव पर उन्होंने ‘कम्बाइंड स्टडी’ शुरू कर दी थी . कॉलेज से वह सीधे उनके घर आ जाते और रात देर तक पढ़ने के पश्चात घर जाते . समय तेजी से खिसकात रहा और परीक्षा सिर पर आ गयी . और एक दिन वह भी सम्पन्न हो गयी . परीक्षा के अंतिम दिन घर लौटते हुए विजय उन्हें एक रेस्टारेण्ट में ले गये . कॉफी पीते हुए उन्होंने सीधे शादी का प्रस्ताव रख दिया . वे उस समय फिर क्षणभर के लिए कहीं खो-सी गयी थीं . कप में पड़ी कॉफी ठंडी हो गयी . विजय भी कॉफी पीना भूलकर निर्निमेष उनके चेहरे पर आ-जा रहे भावों को देखते रहे थे . जब बेयरे ने आकर पूछा , ‘‘साब , और कुछ चाहिए ? ’’ तब दोनों की तन्द्रा दूर हुई थी .&lt;br /&gt;‘‘अरे , कॉफी तो ठंडी हो गयी . तुमने पी क्यों नहीं ?’’‘‘‘आपने भी तो नहीं पी ....’’&lt;br /&gt;‘‘अरे हां ....’’ फिर बेयरे को दो और कॉफी का आर्डर देकर विजय बोले , ‘‘दीपा , तुमने कोई उत्तर नहीं दिया .’’ &lt;br /&gt;‘‘कया उत्तर देना इतना आसान है ?’’&lt;br /&gt;‘‘यह सब कुछ तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है . यदि तुम चाहोगी ....’’&lt;br /&gt;‘‘लेकिन विजय , क्या हमारे मां-बाप इतनी आसानी से तैयार हो जायेंगे ?’’&lt;br /&gt;‘‘मैं तुम्हारे ममी-पापा के विषय में नहीं बता सकता , लेकिन मेरे ममी-पापा को कोई आपत्ति न होगी .’’&lt;br /&gt;वे कुछ सोचती रह गयी थीं . तभी बेयरा आ गया था . थोड़ी देर के लिए उत्तर देने से वे बच गयी थीं . लेकिन बिल चुकता करने के बाद जब दोनों रिक्शा पर सवार हुए विजय ने  पुनः पूछ लिया , ‘‘क्या सोचा तुमने , दीपा ?’’&lt;br /&gt;‘‘कुछ दिन सोचने दो .’’&lt;br /&gt;‘‘ठीक है .’’&lt;br /&gt;*****    &lt;br /&gt;लेकिन विजय के प्रस्ताव को वे अधिक दिनों तक टाल न सकीं थीं . विजय के असीम प्यार प्रदर्शान ने उन्हें स्वीकृति के लिए विवश कर दिया था . विजय को पा जाने की लालसा उनके अन्दर तीव्रतर हो उठी थी . उन्होंने अपना निर्णय ममी-पापा को बता दिया . लेकिन जैसी कि आशा थी , वही हुआ . विजय के साथ विवाह करना उन लोगों को स्वीकार न था . दो पीढि़यों के मध्य विचारों की टकराहट शुरू हो गयी थी . जैसे-जैसे ममी-पापा उनकी गतिविधियों को प्रतिबन्धित करते जा रहे थे , उनके मन में विजय के साथ विवाह करने का निश्चय दृढ़ होता जा रहा था .&lt;br /&gt;और एक दिन लावा फूट ही पड़ा था . पापा का रुद्र रूप उन्होंने उस दिन पहली बार देखा था . उलटा-सीधा कहने के बाद उस दिन अंत में वे बोले थे , ‘‘दीपू , अगर तूने उसके साथ शादी की तो इस घर के दरवाजे तेरे लिए सदैव के लिए बन्द हो जायेंगे .’’ हथियार तो उन्होंने डाल दिए थे , किन्तु रूढि़वादी ऐंठ उनमें तब भी शेष थी .&lt;br /&gt;जिस दिन परीक्षाफल घोषित हुआ , विजय दौड़ते हुए उन्हें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की बधाई देने आए थे . लेकिन उस समय पापा ने विजय का जो अपमान किया , उससे वे बौखला उठी थीं , किन्तु किसी प्रकार अपने को संयत किये रही थीं . उस क्षण उन्होंने उस घर को शिघ्र ही छोड़ देने का निर्णय किया था और उसके ठीक बीसवें  दिन उन्होंने विजय के साथ ‘कोर्ट मैरिज’ कर ली थी .&lt;br /&gt;विजय उन दिनों समाचारपत्रों में रिक्त स्थान देखने लगे थे . कई जगह आवेदन भी किया लेकिन कहीं से काई उत्तर नहीं आया . वे स्वयं पी-एच.डी. करने के विषय में सोचने लगी थीं . एक दिन जब परिवार के सब लोग शाम की चाय ले रहे थे , उन्होंने दबी जुबान अपनी इच्छा जाहिर की . उनकी बात सुनते ही विजय के ममी-पापा एक साथ बोल उठे थे , ‘‘बहू , हमारी सामर्थ्य न तो अब विजय को आगे पढ़ाने की है और न ही तुम्हे .’’&lt;br /&gt;पापा तो इतना ही कहकर चुप हो गये थे , किन्तु ममी आगे बोली थीं , ‘‘हां , अगर तुम्हारे पापा चाहें तो तुम्हें पढ़ा सकते हैं . उनके पास धन की कोई  कमी भी तो नहीं .....’’&lt;br /&gt;‘‘लेकिन ममी , अब उनसे कुछ भी अपेक्षा करना क्या उचित है ?’’&lt;br /&gt;‘‘क्या बात कह रही हो , बहू ? मां -बाप आखिर मां-बाप ही होते हैं . थोड़े दिनों बाद बच्चों को माफ कर देते हैं . उन्हें कितनी सरलता से मेरा हीरा जैसा बेटा दामाद के रूप में मिल गया है .वह भी बिना दहेज . सोच बहू , अगर वे तुम्हारी शादी कहीं और करते तो .... खैर , तू तो खुद ही समझदार है , पढ़ी-लिखी है .’’&lt;br /&gt;‘‘छोडिए भी ममी इन बातों को , ’’ कहकर विजय उठकर वहां से चले गये थे . वे भी रुक न पायी थीं . कमरे में जाकर बेड पर ढह गयी थीं . रात विजय की आहट पाकर उनकी नींद खुली थी . लेकिन उनसे बिना कोई बात किए बत्ती बुझाकर वह भी लेट गये थे .&lt;br /&gt;उस दिन के बाद उस घर का वातावरण तनावपूर्ण हो उठा था . विजय के अतिरिक्त सभी उनसे कम बातें करने लगे थे  और विजय को भी उनसे बात करने का वक्त कहां मिलता था . वह सुबह के निकले शाम को घर में प्रवेश करते थे . घर में सबके होते हुए एकाकीपन उन्हें डसता रहता था . शादी के बाद पूरे आठ महीने हो चुके थे विजय को भटकते हुए , लेकिन कहीं भी नौकरी नहीं मिली थी . एक सुबह अखबार में रिक्त स्थान देखते हुए वह उछल पड़े थे . डी.ए.वी. में लेक्चरर की पोस्ट निकली थी . उनके कन्धे झकझोरते हुए वह बोले थे , ‘‘दीपा , तुम आवेदन कर दो . तुम्हें यह पोस्ट मिल सकती है .’’&lt;br /&gt;घर के वातावरण ने उन्हें उबा दिया था . विजय की ममी का व्यवहार उनके प्रति दिन-प्रतिदिन अत्यधिक रूखा और कड़वा होता जा रहा था . छोटी-छोटी’-सी बात में वह उन्हें प्रताडि़त करने लगती थीं . उन दिनों वास्तव में वे भयंकर मानसिक तनाव में जी रही थीं . यह उनके लिए एक सुखद अवसर था . उन्होंने आवेदन किया और साक्षात्कार में बिना किसी सिफारिश के चुन ली गयीं . लेकिन उनका नौकरी करना भी विजय के ममी-पापा को पसन्द नहीं आया . एक दिन उनके कॉलेज से लौटते ही उन लोगों ने स्पष्ट घोषणा की थी , ‘‘नौकरीपेशा बहू के लिए इस घर में कोई जगह नहीं है . यदि नौकरी करनी है तो जाकर रहो अपने पिता के घर .’’&lt;br /&gt;एक ओर था भविष्य और दूसरी ओर था वर्तमान का कलहपूर्ण जीवन . उन्होंने विजय से बात की . लेकिन विजय ने कोई उत्तर नहीं दिया . आखिर कई दिनों की कलह के बाद उन्होंने विजय से स्पष्ट कह दिया , ‘‘अब वे उस घर में नहीं रह सकतीं . अलग मकान की व्यवस्था करेंगी .’’ विजय फिर भी चुप रहे थे .&lt;br /&gt;लेकिन वे निर्णय कर चुकी थीं अलग रहने का . आखिर विजय को झुकना पड़ा . ब्रम्हनगर में दो कमरों की जगह किराये पर लेकर उस घर को भी उन्होंने एक दिन छोड़ दिया . किराये के मकान में आने के बाद उन्होंने विजय को आई. ए.एस. में बैठने के लिए प्रोत्साहित किया . उनकी सलाह विजय को पसन्द आयी और वह आई.ए.एस. की तैयारी में जुट गये . उस मकान में आने के चार महीने पश्चात विजय और उनके प्रेम का प्रतीक विभु पैदा हुआ . उन दिनों विजय आई.ए.एस. की परीक्षा देने गये हुए थे . कितनी परेशानियां उठानी पड़ी थीं उन्हें . दोनो घरों के दरवाजे उनके लिए बन्द थे . असहाय-सी उन्होंने पड़सी की कुण्डी खटखटाई थी . उस दिन उन्हें पहली बार एहसास हुआ था कि कभी-कभी गैर अपनों से अच्छे होते हैं .&lt;br /&gt;पड़ोसी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया था जहां रातभर उसकी पत्नी उनके साथ रही थी . पैदा होने के बाद विभु पर प्रथम दृष्टि पड़ते ही चीखकर उन्होंने आंखें बन्द कर ली थीं और नर्स से बोली थीं ‘‘सिस्टर , इस मांस के लोथड़े को ले जाइये . यह मेरा बच्चा नहीं है .... नहीं ...’’ और वे बेहोश हो गयी थीं .&lt;br /&gt;लेकिन होश आने पर नर्स और पड़ोसिन के समझाने के बाद विभु को गोद में लेकर न जाने कितनी देर उसे देखती रही थीं . विभु का नीचे का भाग अपंग था . उसे अपनी छाती से लगाकर वे फूट-फूटकर रोती रही थीं .&lt;br /&gt;दूसरे दिन विजय लौट आए थे . सीधे अस्पताल पहुंचकर उन्होंने पहले विभु को देखना चाहा था , लेकिन , उन्होंने केवल ऊपर  का भाग ही उन्हें दिखया था . काफी देर तक बातें करने के बाद जब विजय उनके लिए फल और दूध लेने के लिए चलने लगे , उसी समय नर्स आ गयी और विभु की सफाई करने के लिए जैसे ही उसने ऊपर से कपड़े हटाए , विजय की दृष्टि विभु के  पर पड़ी थी . विजय के मुंह से भी एकदम चीख निकल गयी थी , ‘‘दीपा , यह क्या है ?’’&lt;br /&gt;‘‘तुम्हारे घर में मुझे मिली मानसिक यन्त्रणा का परिणाम ....’’ वे फूट-फूटकर रोने लगी थीं . नर्स ने विभु को संभालने के लिए उन्हें डपट दिया था और आंसू पोंछकर वे उसे गोद में उठाने लगी थीं . विजय कब चले गये , उन्हें पता नहीं चला था .&lt;br /&gt;*****   &lt;br /&gt;विजय आई.ए.एस. में सिलेक्ट हो गये थे . प्रशिक्षण के लिए उन्हें मसूरी जाना था . जाने से  एक दिन पहले बोले , ‘‘दीपा , तुम अकेले विभु और नौकरी दोनों कैसे संभाल पाओगी ?’’&lt;br /&gt;‘‘मैं कल एक आया के लिए बात कर आयी हूं . वह दिनभर विभु की देखभाल किया करेगी . तुम चिन्ता न करों . थोड़े दिनों की बात है . जब तुम्हारी कहीं पोस्टिंग हो जायेगी तब मैं नौकरी छोड़ दूंगी .’’&lt;br /&gt;विजय कुछ सोचने लगे थे .  &lt;br /&gt;‘‘तब तक विभु भी कुछ बड़ा हो जायेगा . तब हम दिल्ली या कहीं और इसका इलाज करवायेंगे . इसके इलाज के लिए भी तो पैसों की जरूरत होगी . विभु ठीक हो जाएगा .... ठीक हो जाएगा न , विजय . ’’ विजय की छाती से लगकर उन्होंने पूछा था .&lt;br /&gt;‘‘क्यों नहीं ठीक होगा . इससे अधिक खराब केसेज ठीक हो जाते हैं .’’&lt;br /&gt;‘‘विजय , उस दिन की कल्पना करो जब तुम किसी दफ्तर के इन्चार्ज होगे , हम सब एक साथ रह रहे होंगे . विभु स्कूल जाया करेगा और रात में हम तीनों एक साथ बैठकर भोजन किया करेंगे . कितना अच्छा होगा तब ....’’ आंखें बन्द किये वे बोली थीं .&lt;br /&gt;‘‘बहुत अच्छा लगा करेगा दीपा , लेकिन तुम अधिक कल्पनाएं मत किया करो . ’’ उनके कान में चिकोटी काटते हुए विजय ने कहा था . ‘‘मेरी तैयारी की भी चिन्ता करोगी या बातें ही करती रहोगी .’’&lt;br /&gt;वे विजय की तैयारी में जुट गयी थीं .&lt;br /&gt;******   &lt;br /&gt; मसूरी पहुंचकर विजय ने कई पत्र लिखे , जिनमें अपने प्रशिक्षण तथा प्रशिक्षणार्थियों के विषय में ही विस्तार से चर्चा की . वे भी हर पत्र का उत्तर देती रहीं और अपनी तथा विभु की चिन्ता न करने के विषय में उन्हें लिखती रहीं . कभी-कभी विजय के पत्र आने में देर हो जाती तब वह लगातार कई पत्र  लिखकर उन्हें लापरवाही की याद भी दिला देती थीं .&lt;br /&gt;एक बार लगभग पन्द्रह दिन तक उनका कोई पत्र नहीं आया . उन्होंने भी सोच लिया कि इस बार वे तब तक पत्र नहीं लिखेंगी जब तक विजय का पत्र नहीं आता . आखिर एक दिन उनका पत्र आया , जिसमें माफी मांगते हुए उन्होंने लिखा था , ‘‘दीपा , आजकल पढ़ाई तथा अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण तुम्हें पत्र  नहीं लिख पाया . मैं जानता हूं तम्हें अवश्य बुरा लग रहा होगा . भविष्य में ऐसा कभी नहीं होगा . ....यहां मेरे साथ लखनऊ की नीतासिंह भी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहीं हैं . मेरी अच्छी मित्र बन गई हैं . कभी अवसर मिलने पर तुमसे मिलवाऊंगा . तुम उन्हें अव्श्य पसन्द करोगी .’’&lt;br /&gt;उस पत्र में न तो विजय ने यह पूछा था कि वे कैसी हैं और न ही विभु के विषय में एक शब्द लिखा था . उन्हें यह अच्छा न लगा . उन्होंने कई दिनों बाद पत्र का उत्तर दिया . लेकिन विजय उनसे दस हाथ आगे निकले . उन्होंने एक महीने बाद उनके पत्र का उत्तर दिया . वह भी केवल चार पंक्तियों में . इन्हीं दिनों विभु बीमार हो गया , उसकी बीमारी में वे इस कदर उलझीं कि विजय को लिख नहीं पायीं . शहर के अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाने के बाद भी वे विभु को बचा न सकीं . विभु उन्हें छोड़कर चला गया . विभु की मृत्यु ने उन्हें अन्दर से तोड़ दिया .&lt;br /&gt; विभु की मृत्यु का समाचार  विजय को देते हुए उन्होंने लिखा कि वह चाहे एक दिन के लिए घर आएं , किन्तु आएं अवश्य . लेकिन विजय नहीं आये . काफी दिनों बाद उनका पत्र आया जबलपुर से . उनकी वहां पोस्टिंग हो गयी थी . लेकिन उसमें उन्होंने केवल अपनी पोस्टिंग की सूचना ही दी थी . विभु की मृत्यु के विषय में एक शब्द भी न लिखा था . वही विजय का अंतिम पत्र था . उनका मन विजय से मिलने के लिए परेशान था . लेकिन विश्वविद्यालय की परीक्षाएं निकट थीं , जिससे वे उनसे मिलने भी नहीं जा सकती थीं .&lt;br /&gt;******  &lt;br /&gt;समय तेजी  से गुजरता जा रहा था . उनकी परेशानी भी बढ़ती जा रही थी . जबलपुर के पते पर विजय को लिखे उनके अनेक पत्र अनुत्तरित रहे थे . और एक दिन उन्होंने निर्णय किया कि न तो वे विजय को पत्र लिखेंगी और न ही उनसे मिलने जाएंगी . उन्होंने अपने को पूरी तरह अध्ययन और अध्यापन में लगा दिया . दो वर्ष का समय कब और कैसे बीत गया , पता नहीं चला . दो वर्ष बाद उन्हें जो कुछ मिला , वह उनके सामने था  तलाक के कागजातों के रूप में , जिसके साथ विजय का संक्षिप्त पत्र था , जिसमें उन्होंने कागजातों को हस्ताक्षर करके तुरंत लौटा देने का मात्र अनुरोध किया था .&lt;br /&gt;उन्होंने एक नजर सामने रखी खाली प्लेटों पर डाली , जिसे ठीक उनके सामने नित्यप्रति की भांति रामकली ने सजा रखा था .&lt;br /&gt; ‘रामकली कितना खयाल रखती है मेरी भावनाओं का .’ वे सोचने लगीं , ‘यही तो था उनका स्वप्न . मेज के एक ओर वे होंगी , एक ओर विजय और एक ओर विभु.....’ लेकिन वह स्वप्न तो कब का खण्डित हो चुका .&lt;br /&gt;उन्होंने पेन उठाया और तलाक के कागजातों पर हस्ताक्षर करने लगीं .&lt;br /&gt;(1987)  &lt;br /&gt;*******    &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-3634306886196321010?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/3634306886196321010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=3634306886196321010&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3634306886196321010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3634306886196321010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='कहानी - २६'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/St8cVXdLIrI/AAAAAAAAAI4/FUrBYuWj1Sk/s72-c/Avadesh-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-8600417381089877811</id><published>2009-09-25T08:43:00.000-07:00</published><updated>2009-09-25T08:52:55.066-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी - २५</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#663300;"&gt;भेड़िये&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;ठंड कुछ बढ़ गई थी। बौखलाई-सी हवा हू-हू करती हुई चल रही थी. उसने शरीर पर झीनी धोती के ऊपर एक पुरानी चादर लपेट रखी थी, लेकिन रह-रहकर हवा के तेज झोंके आवारा कुत्ते की तरह दौड़ते हुए आते और चादर के नीचे धोती को बेधते हुए बदन को झकझोर जाते. वह लगातार कांप रही थी और कांपने से बचने के लिए उसने दोनों हाथ मजबूती से छाती से बांध लिए थे; और दांतों को किटकिटाने से बचाने के लिए होठों को भींच रखा था.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;‘भिखुआ आ जाता तो, कितना अच्छा होता.’ वह सोचने लगी –’किसी तरह छिप-छिपाकर दोनों उस शहर से दूर चले जाते, जहां वे उन्हें ढूंढ़ न पाते. आज चौथा दिन है उसे गए— न कोई चिट्ठी , न तार, जबकि जाते समय उसने कहा था कि तीसरे दिन वह जरूर आ जाएगा. बापू की तबीयत अगर ज्यादा खराब हुई तो उन्हें साथ लेता आएगा.’&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मेनगेट के पास खड़े पीपल के पेड़ से कोई परिंदा पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ा, तो बिल्डिंग के अंधेरे कोने में छिपे कई चमगादड़ एक साथ बाहर निकल भागे। वह चौंक उठी और उन्हें देखने लगी. क्षण-भर बाद वे फिर अंधेरे कोनों में जा छिपे. तभी उसे लगा, जैसे कोई आ रहा है. उसने इधर-उधर देखा, कोई दिखाई नहीं पड़ा.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;‘पता नहीं वह सिपाही कहां गुम हो गया— कह रहा था — अभी बुला लाता है थानेदार को। साहब सो रहे होंगे. रात भी तो काफी हो चुकी है. साहब लोग ठहरे—- आराम से उठेंगे, तब आएंगे—-’&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उसे इस समय भिखुआ की याद कुछ अधिक ही आ रही थी. ’उसे जरूर आ जाना चाहिए था. हो सकता है, बापू की तबीयत कुछ ज्यादा खराब हो गई हो. न वह उन्हें ला पा रहा होगा, न आप आ पा रहा  होगा. लेकिन उसे उसकी चिंता भी तो करनी ही चाहिए थी. जबकि उसने उस दिन उसे बता दिया था कि उनमें से एक — महावीरा को उसने सड़क के मोड़ वाली पान की दुकान पर खड़े देखा था.’&lt;br /&gt;“तू नाहक काहे कू डरती है रे। उनकी अब इतनी हिम्मत नाय कि तोको लै जांय. मुफ्त मा नाय लाया था तोको. पूरे पांच हजार गिने थे—ऊ का नाम —- शिवमंगला को. बाद में ’कोरट’ में अपुन ने रजिस्ट्री भी तो करवा ली थी. अब अपुन को कौन अलग करि सकत है ?” भीखू ने उसके गाल थपथपाते हुए कहा था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“तू कछू नाई जानत, भीखू, वो कितने जालिम हैं। शिवमंगला जो है न, यो सबते अपन को मेरा मामा बताउत है. वैसे भी यो मामा है, दूर-दराज का. मेरे बापू की लाचारी और मजबूरी का फायदा उठाकर इसी पापी ने मेरी पहली शादी करवाने का ढोंग किया था, बूढ़े बिरजू के साथ. खुद एक हजार लेकर, एक हजार बापू को दिए थे. और उसके बाद, मां और बापू के मरने के बाद, यो महावीरा के साथ मिलकर —- सातवीं बार तेरे हाथ मेरे को—–” वह रोने लगी थी.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“भूल भी जा अब पुरानी बातों को, सोनकी. अब कोई चिंता की बात नईं. मैं पुलिस-थाने को सब बता दूंगा. तू काहे को फिकर करती ?” उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता हुआ भीखू बोला, तो वह निश्चिंत हो सोचने लगी थी कि दुनिया में अब कोई तो है उसका, जो उसे चाहने लगा है. उससे पहले शिवमंगला ने जिसके साथ भी उसे बांधा, साल-डेढ़ साल से अधिक नहीं रह पाई थी वह उसके साथ.&lt;br /&gt;शिवमंगला पहले ही उससे कह देता, “साल-डेढ़ साल रह ले. जमा-पूंजी जान ले, कहां कितनी है. उसके बाद मैं एक दिन आऊंगा—तुझे लेने. सारी पूंजी बांध, चल देना. न-नुकर की, तो तड़पा-तड़पाकर मारूंगा.”&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;और वह चाबी-भरे खिलौने की तरह उसका कहना मानने को मजबूर होती रही सदैव. चौथे मरद के साथ जमना चाहा, तो पुलिस को साथ लेकर वह जा पहुंचा और उसको यह कहकर पकड़वा दिया कि वह उसकी इस अनाथ भांजी– सोनिया — को भगा लाया है. तब उसने चाहा था कि पुलिस को सब कुछ बता दे, लेकिन महावीरा ने कान के पास धीरे से कहा था, “अगर मुंह खोला—- तो समझ लेना—-.”&lt;br /&gt;वह उनके साथ घिसटती चली गई थी, पांचवें के पास जाने के लिए. एक शहर से दूसरे शहर भटकती रही है वह, क्योंकि कभी भी उन्होंने उसे एक ही शहर में दूसरी बार नहीं बेचा. हर बार, जब तक कोई ग्राहक उन्हें नहीं मिलता, शिवमंगला खुद हर रात उसके शरीर से खेलता रहता. कभी-कभी इस खेल में महावीरा को भी शामिल कर लेता. वह कराहती, तड़पती, लेकिन शिवमंगला भूखे भेड़िये की तरह उसके शरीर को नोचता रहता और तब वह उस यातना से मुक्ति पाने के लिए कुछ दिनों के लिए ही सही, किसी-न-किसी के हातों बिक जाना बेहतर समझती.&lt;br /&gt;***&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;खट—खट—खट  ! गेट की ओर कुछ कदमों की आहट सुनाई पड़ी। कोई ट्रक चिघ्घाड़ता हुआ सड़क पर गुजरा. उसकी रोशनी में उसने चार सिपाहियों को अपनी ओर आते देखा. वह कुछ संभलकर बैठ गई. सोचा, शायद थानेदार साहब आ रहे हैं.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“तू यहां किसलिए—-ऎं !” चारों उसके सामने खड़े थे। वह सिपाही, जो थाने पहुंचते ही उसे मिला था और जिससे उसने थानेदार को बुलाने के लिए कहा था, उनके साथ था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“हुजूर, मैं थानेदार साब को—- कुछ बतावन खातिर—-” कांपती हुई वह खड़ी हो गई।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“क्या बताना है ? इस समय वो कुछ नहीं सुनेंगे— सुबह आना।” लंबी मूंछोंवाला, जो आगे खड़ा था ओवरकोट पहने, गुर्राकर बोला.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“हुजूर, वो—वो– मेरे पीछे पड़े हैं। मैं –मैं…” उसकी जुबान लटपटा गई.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“तू उनके पीछे पड़ जा न—हा—हा—हा—हा—-।”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“दुबे, क्या इरादा है, मिलवा दिया जाए इसे थानेदार साब से ?” लंबी मूंछोंवाले के पीछे खड़े सिपाही ने, जिसके होंठ मोटे थे और उसने भी ओवरकोट पहन रखा था, बोला. शेष तीनों उसकी ओर देखने लगे. टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में चारों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और वापस मुड़ गए.&lt;br /&gt;“अभी बुलाकर लाते हैं थानेदार साब को। तू यहीं बैठ.” जाते-जाते एक बोला.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;चारों चले गए, तो वह आश्वस्त हुई थी कि थानेदार को जरूर बुला देंगे. वह फिर बैठ गई उसी प्रकार और सोचने लगी कि कैसे और क्या कहेगी वह थानेदार से. लेकिन जैसे भी हो, वह उसे सब कुछ बता देगी—- बचपन से अब तक क्या बीती है उस पर —- सब कुछ. धीरे-धीरे वह पुरानी स्मृतियों में खोने लगी. हवा का क्रोध कुछ शांत होता-सा लगा, लेकिन ठंड ज्यों-की-त्यों थी.&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बापू ने बहुत सोच-विचारकर उसका नाम रखा था — सोनिया। एक कहानी बताई थी उन्होंने कभी उसे– जिस दिन वह पैदा हुई थी, बाप को मालिक के खेत में हल जोतते समय सोने का कंगन मिला था.बापू ने चुपचाप वह कंगन मालिक को दे दिया था. उनका कहना था कि जिसके खेत में उन्हें कंगन मिला है, उस पर उसी का अधिकार बनता है. मालिक ने उसके बदले दस रुपये इनाम दिए थे बापू को. वह उसी से खुश था—-”बेटी भाग्यवान है. तभी तो सोना मिला था मुझे. मैं इसका नाम सोनिया रखूंगा.” और उस दिन से ही वह सोनिया और दुलार-प्यार में सोना हो गई थी.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बापू की कल्पना कितनी खोखली सिद्ध हुई थी। उसके जन्म के बाद घर की हालत और खस्ता होती चली गई थी. मां बीमार रहने लगी थी. काम करने वाला अकेला बापू– वह भी मजूर— और खाने वाले तीन. जब वह छः-सात साल की थी, तभी से बापू के साथ काम पर जाने लगी थी और जिन हाथों को पाटी और कलम-बोरकला पकड़ना था, वे खुरपी और हंसिया पकड़ने लगे थे. वह बड़ी होती गई—- मां चारपाई पकड़ती गई और बापू का शरीर कमजोर होता गया था. बापू उसे लेकर चिंतित रहने लगा था — उसके विवाह के लिए. कहां से लाएगा दहेज, जब खाने के लाले पड़े हों ! और तभी एक दिन मां की तबीयत अधिक बिगड़ गई थी.बापू इधर-उधर भटकता रहा था पैसों के लिए. उस दिन यही इसका दूर-दराज का मामा— शिवमंगला आया था बापू के पास और कुछ व्यवस्था करने का आश्वासन दे गया था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन वह बिरजू के साथा आया। कोठरी के अंदर कुछ गुपचुप बातें हुईं और फिर उसने देखा कि बिरजू बापू को सौ-सौ के दस नोट पकड़ा गया था. मां का इलाज शुरू हो गया था . वह कुछ ठीक भी होने लगी थी. लगभग पंद्रह दिन बीत गए कि बिरजू फिर आया, शिवमंगला के साथ. उस दिन बापू ने उसे बताया कि उन्होंने बिरजू के साथ उसकी शादी तय कर दी है. वह आज उसे लेने आया है.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आंखें छिपाते हुए बापू बोला था, “सोना बेटा, मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, जिसकी सजा मुझे भगवान देगा। लेकिन बेटा, यह पाप मुझे तेरी मां के लिए करना पड़ा है. तू मुझे माफ कर देना, बेटा.”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वह बापू से लिपटकर रोई थी फूट-फूटकर. बापू उसके सिर पर हाथ फेरता रहा था, फिर बिरजू से बोला था, “पाहुन, मेरी सोना अभी छोटी है. पंद्रह साल की है. बड़े कष्टों में मैंने इसे पाला है. इसे आप कष्ट न देना.”&lt;br /&gt;चलने से पहले बिरजू ने बापू को आश्वस्त किया था—&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जब तक सोना बिरजू के पास रही, मानसिक कष्ट तो उसे भोगने पड़े, लेकिन जीवन की सुख-सुविधा के तमाम साधन उसने जुट रखे थे उसके लिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दो साल वह उसके पास रही थी। इन्हीं दो वर्षों में पहले मां और बाद में बापू के चल बसने का समाचार उसे मिला था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;और दो वर्षों बाद— एक दिन शिवमंगला के धमकाने पर उसे बिरजू का घर छोड़ना पड़ा था। उसके बाद शुरू हो गया था उसके बसने और उजड़ने का सिलसिला.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भीखू को बेचते समय भी शिवमंगला ने उसे चेता दिया था कि डेढ़-दो साल से अधिक नहीं रहना है इसके पास। एक दिन वह आएगा और उसे ले जाएगा. शुरू में कुछ महीने वह यह सोचकर रहती रही कि एक दिन उसका साथ भी छोड़ना पड़ेगा. अधिक माया-मोह बढ़ाना ठीक नहीं समझा उसने, लेकिन भीखू का निश्छल प्यार धीरे-धीरे उसे बांधता चला गया और वह महसूस करने लगी कि वह भीखू को कभी छोड़ नहीं पाएगी. इतना प्यार उसे किसी ने न दिया था—चौथे ने भी नहीं. सभी उससे किसी खरीदे माल की तरह जल्दी -से-जल्दी, अधिक-से-अधिक कीमत वसूल कर लेना चाहते. भीखू को उसने सबसे अलग पाया था. जिस अपनत्व-प्यार के लिए वह तरसती आई थी, भीखू ने उसे दिया था. और इसलिए उसने उस दिन अपने अंधे अतीत का एक-एक पृष्ठ खोलकर रख दिया था उसके सामने.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सुनकर भीखू ने जो कुछ कहा था, उससे उसने महसूस किया था कि उसके कष्टों के दिन बीत गए। उसका जीवनतरु अब नई रोशनी में पल्लवित,विकसित और पुष्पित हो सकेगा. भावातिरेकवश वह भीखू के सामने झुक गई थी, उसकी चरणरज माथे से लगाने के लिए, लेकिन भीखू ने उसे पहले ही पकड़ लिया था, “सोना, मैं तुझ पर कोई एहसान थोड़े ही कर रहा हूं. अनपढ़-गंवार जरूर हूं, लेकिन हूं तो इनसान. इनसान होने के नाते उन भेड़ियों से तुझे बचाना मेरा फर्ज है. मेरे पैर छुकर तू मुझे महान मत बना. मैं बस, इनसान ही रहना चाहता हूं.”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्यार से आंसू उमड़ पड़े थे उसके—- उस क्षण उसने निर्णय किया था —- अब वह उनके डराने-धमकाने के सामने नहीं झुकेगी। भीखू को छोड़कर वह कभी नहीं जाएगी.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उस दिन पान की दुकान के पास दिखने के बाद महावीरा जब दोबारा उसे नहीं दिखा, तो वह कुछ निश्चिंत -सी हो गई थी। कुछ भय भीखू ने कम कर दिया था— और जब भीखू गांव जाने लगा, तब वह बोली थी, “मेरी ज्यादा चिंता न करना तुम. बापू को—-” बात बीच में ही रोक दी थी, क्योंकि डर तब भी उसके अंदर अपने पंजे गड़ा रहा था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“चिंता तो रहेगी ही, सोना। अगर कोई खतरा दिखे तो पुलिस-थाने की मदद ले लेना.”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शायद भीखू को भी इस बात का डर सता रहा था कि उसके जाने के बाद वे आ सकते हैं—-।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसे-जैसे एक-एक दिन भीखू के जाने के बाद बिना किसी संकट के कटते चले गए, सोना बिलकुल निश्चिंत होती गई। कोठरी का दरवाजा सांझ ढलने के साथ ही वह बंद कर लिया करती थी. आज भी दरवाजा बंद कर वह भीखू का इंतजार कर रही थी. शायद आखिरी बस से आ जाए—- और जब दरवाजे पर दस्तक हुई, तो दौड़कर उसने दरवाजा खोला. लेकिन भीखू नहीं, सामने शिवमंगला खड़ा था.मुंह से शराब की बदबू छोड़ता हुआ.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“तो रानीजी पति का इंतजार कर रही हैं—-” वह कमरे में घुस आया. वह एक ओर हट गयी. शिवमंगला निश्चिंततापूर्वक चारपाई पर बैठ गया. उसे अवसर मिल गया था. वह तीर की तरह वहां से भाग निकली . सीधे थाने में जाकर ही दम लिया .&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;खट—खट—-खट—-खट—-&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उसके कान फिर चौकन्ने हो गए। एक सिपाही चला आ रहा था.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“चलो, थानेदार साब बुला रहे हैं।”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वह उसके पीछे हो चली– ठंड से दोहरी होती हुई.&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रात-भर चारों सिपाही एक के बाद एक उसके शरीर को नोचते - झिंझोंड़ते रहे। वह चीखती-चिल्लती और तड़पती रही और वे हिंस्र पशु की भांति उसे चिंचोंड़ते रहे— उसके बेहोश हो जाने तक.—.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जब उसे होश आया, वह एक पार्क में पड़ी थी—– और शिवमंगला और महावीरा उसके पास खड़े थे, उसे घेरे। वह पूरी ताकत के साथ चीख उठी और फिर बेहोश हो गई।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;****&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-8600417381089877811?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/8600417381089877811/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=8600417381089877811&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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type='text'>कहानी-२४</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SgpAGGbZiKI/AAAAAAAAAGw/-en3YxTU1-Q/s1600-h/B"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335147182122698914" style="WIDTH: 129px; CURSOR: hand; HEIGHT: 118px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SgpAGGbZiKI/AAAAAAAAAGw/-en3YxTU1-Q/s200/B%27ful+Pi+1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;यह तो वही है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार का दूसरा पेज खोलते ही पेज के बायीं ओर नीचे ब्लॉक में छपे समाचार और चित्र को देख रवि बाबू बाबू चौंके थे. उन्हे लगा आंखें धोखा खा रही हैं. ’यह उस व्यक्ति का चित्र नहीं हो सकता. एक ही शक्ल के दो या दो से अधिक लोग होते हैं. यह निश्चित ही उसका हमशक्ल होगा. ’ उन्होंने मोटे लेंस के चश्मे को चार बार उतारा, साफ किया, चढ़ाया और ध्यानपूर्वक चित्र देखने लगे. किसी बड़े हॉल में बैठे लगभग पचास लोग, माईक पर झुका जो व्यक्ति बोलता हुआ दिख रहा था उसके वैसी ही लेनिनकट सफेद दाढ़ी थी जैसी उस व्यक्ति के थी, जिसे वे पचीस वर्षों से जानते थे. उसके बाल भी वैसे ही सफ़ेद थे और ऎसी प्रतीति दे रहे थे कि मानो उसने ’विग’ लगा रख था, उससे वे जब भी कहीं मिले, उन्हें उसके बाल कभी स्वाभाविक नहीं लगे थे. उन्हें सदैव यही लगा कि वह निश्चित ही गंजा होगा, जिसकी असलियत उसकी पत्नी और बच्चे ही जानते होंगे. संभव है वह सोए समय भी ’विग’ लगाकर सोता हो, लेकिन दाढ़ी को लेकर वे असमंजस में थे. वे सोचते, संभव है वह दाढ़ी भी नकली चिपका लेता हो, अपने को भीड़ से अलग दिखलाने के लिए. एक बार उसकी पत्नी सुलोचना ने उनसे कहा था, "रवि बाबू, शिव के दाढ़ी-बाल से कोई भी उसकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर तक मंद मुस्कराने के बाद वे बोले थे --"शिव के साथ आपके विवाह का रहस्य आज----" लेकिन कुछ सोच वे चुप रह गये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सुलोचना चुप न रही थी. प्रफुल्लित स्वर में बोली थी, "रवि बाबू, उस दिन बीस दिसंबर का दिन था. कमानी ऑडीटोरियम में बिरजू महाराज का कार्यक्रम था. मैं अपनी सहेली विनीता जिसे हम विनी कहते हैं, उसे आप जानते हैं, के साथ थी . हम कमानी के गेट के पास फुटपाथ पर थे कि सामने से शिव आता दिखा था. पैंट पर काला ओवर कोट, सांवले चेहरे पर दूर से ही चमकती दाढ़ी और सिर पर बलों का टोकरा, सफ़ेद-बिल्कुल भूहा जैसे बाल, कंधे पर लटकता थैला---- आप समझ सकते हैं कि सातवें-आठवें दशक में कैसे थैले लटकाकर चलने का फैशन था युवाओं में---- मैं तो अपलक देखती रह गयी थी उसे. क़द नाटा, लेकिन मुझे लगा था, आप हंसेंगे नहीं रवि बाबू", उसने उनके चेहरे पर नज़रें गड़ा दी थीं, "सच में वह मुझे लेनिन जैसा लगा था और बस----- मैं----" देर तक अतीत सुलोचना की आंखों में फड़फड़ाता रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यू नो रवि बाबू, मैं तो सुध-बुध ही खो बैठी थी. पीछे मुड़-मुड़कर शिव को देखती गेट की ओर खिसक रही थी. गति मंद हो गयी थी. विनी ने शायद यह भांप लिया था, वह रुक गयी और बोली थी, ’सुलोचना मैं तुम्हारा परिचय करवा दूं"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किससे?" मैं नहीं समझ पायी थी कि वह किससे परिचय करवाने की बात कह रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तभी शिव----- पूरा नाम तो आप जानते ही हैं---- शिवमान मोहन--- पास आ पहुंचा था. विनी उसे जानती थी. उसने परिचय करवाया, "मेरे   भइया के मित्र हैं. कबीर पर काम कर रहे हैं. एक कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक हैं." परिचय के दौरान मैं जमीन पर गड़ी जा रही महसूस करती रही थी , फिर भी कनखियों से शिव को देखती रही थी. और उस दिन के बाद----"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद की कहानी रवि बाबू जानते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन माईक पर झुका हुआ व्यक्ति तो सर्वहारा की चर्चा कर रहा है----- समाचार का शीर्षक तो यही कह रहा था. जबकि उन्होंने जितना शिवमान मोहन को जाना था उसके अनुसार उसका सर्वहारा वर्ग से दूर-दूर का रिश्ता नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार सामने फैला रहा और रवि बाबू कुछ देर के लिए अतीत के अंधेरे आकाश में विचरण करने लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालय की पहाड़ियों पर बैठी अपने अस्त्र-शस्त्र तैयार करने में व्यस्त शीत लहर के दिल्ली की ओर प्रस्थान करने में अभी कुछ समय था. वह १९७० नवंबर का एक दिन था. कुछ महीनों की मुलाकातों के बाद सुलोचना शिव के ईस्ट पटेल नगर के किराये के मकान में शिफ्ट हो गयी थी. उससे पहले वह विनी के साथ रहती थी.  विनी भाई के साथ रहती भी थी और  नहीं भी. एक ही मकान में विनी ने भाई से अलग दो कमरे किराये पर ले रखे थे. विनी एक कॉलेज में तीन वर्षों से एडहॉक पढ़ा रही थी, उसने ऎसा इसलिए नहीं किया था कि भाई या भाभी से उसका झगड़ा था. ऎसा दो कारणॊं से था. वह देर रात तक पढ़ती थी. सुबह देर से उठती. कॉलेज सायं का था. वह नहीं चाहती थी कि वह घर के कामों में बिना हाथ बटाये कोई सुविधा स्वीकार करे.भाभी को क्यों कष्ट दे, जिन्हें वह सुबह पांच बजे से भाई -बच्चों की तीमारदारी और दूसरे कामों में थकता देखती थी और उन पर तरस खाती थी. उसने भाई की प्रगतिशीलता का लाभ उठाते हुए स्वयं यह प्रस्ताव किया था कि उस मकान के खाली दो कमरों में, यदि मकान मालिक उन्हें किराये पर देना स्वीकार कर ले तो, वह शिफ्ट हो जाए, जिससे अपना शोध कार्य पूरा करने में उसे सुविधा होगी. उन दो कमरों के साथ किचन भी था. भाई की स्वीकृति तो मिली ही थी, मकान मालिक भी तैयार हो गया था. कुछ दिनों बाद सुलोचना भी उसके साथ आकर रहने लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल दोनों ने लखनऊ विश्वविद्यालय से  साथ में हिन्दी में एम.ए. किया था. सुलोचना का घर अमीनाबाद में था, जबकि विनी का गोलागंज में. एक प्रकार से मिडिल क्लास से वे साथ थीं. सुलोचना भी नौकरी के लिए हाथ पैर मार रही थी कि तभी उसका परिचय शिवमान मोहन से हो गया. विनी सुलोचना के शिव के साथ जा रहने के विरुद्ध थी. ’शादी कर लो, फिर जाकर रहो, तुम्हारे घरवालों को मैं जाकर मना लूंगी. शिव के घरवालों को मैं नहीं जानती. वे शायद बलिया के किसी गांव में रहते हैं. सुलोचना, किसी को समझने के लिए कुछ महीने पर्याप्त नहीं होते...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यही तुम्हारी प्रगतिशीलता है ?" उखड़ गयी थी सुलोचना, "शादी करने के लिए ही साथ रहने जा रही हूं. पहले न सही, दस दिन , दस महीने बाद सही. फिर, किसी को समझने के लिए महीनों की दरकार नहीं होती----- विनी, कुछ क्षण ही पर्याप्त होते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुलोचना के उत्तर से अचंभित थी विनीता. समझ नहीं पा रही थी कि जो कुछ वह संकेत में कहना चाह रही थी उसे स्पष्ट कैसे कहे. वह चिंतित हो उठी थी. विचारों के बवंडर मस्तिष्क में हहराते रहे थे. काफ़ी देर बाद वह बोली थी, "कुछ दिन और प्रतीक्षा कर लेने में क्षति नहीं है सुलोचना, भावुकता में हित कम, अहित ही अधिक होता है. समझ से काम लो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’विनी, तुम मेरे साथ पढ़ी-लिखी. माना कि विद्यार्थियों को पढ़ा रही हो..... कुछ अधिक अक्ल आ गयी होगी, लेकिन-----."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिलमिला उठी थी विनी. संयम टूट गया था. फिर भी सुस्थिर स्वर में बोली थी, "सुलोचना तुम्हारा जीवन है, जैसा चाहो जियो लेकिन मित्रता का तक़ाजा है कि मैं तुम्हें बता दूं---- " क्षण भर के लिए रुकी वह, सुलोचना के चेहरे पर दृष्टि डाली थी, फिर बोली थी, "तुमसे पहले भी शिव के साथ गौरांगी नाम की एक लड़की रहती थी. पहले वह विश्वविद्यालय होस्टल में रहती थी. पैरेंट्स पटना में थे. यह तीन वर्ष पहले की बात है. गौरांगी पी-एच.डी. की छात्रा थी. वह कहानियां भी लिखती थी. सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और धर्मयुग में उसकी कहानियां प्रकाशित हो चुकी थीं. उसकी  कहानियां पढ़कर शिव उसे खोजता उसके होस्टल पहुंचा था. कौन अपनी रचनाओं की प्रशंसा सुनकर प्रमुदित नहीं होता! वह भी नया रचनाकार. शिव की बातों से वह प्रभावित हुई थी और ---- और तुम्हारी तरह कुछ ही महीनों में वह शिव के इसी मकान में रहने जा पहुंची थी उसके साथ. बेचारी गौरांगी"-- भावुक हो उठी थी विनी. लंबी आह भरकर बोली थी, "उसका भाई तब हिन्दू कॉलेज में पढ़ता था. आज वह भी शोध कर रहा है. उसने मां-पिता को बुला लिया था. बड़ा हंगामा हुआ था. गौरांगी को वे समझा नहीं पाये थे. लौट गये थे वे पटना हताश-निराश."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और एक वर्ष शिवमान मोहन के साथ रहने के बाद होस्टल लौट आयी थी गौरांगी. मित्रों में खुस-फुसाहट थी उसके लौटने पर---- शायद झगड़ा---मनमुटाव----’जूठाकर परे खिसका दिया’ जैसे डायलॉग हवा में तैरने लगे थे, लेकिन हर कुचर्चा पर गौरांगी ने विराम लगाते हुए मित्रों से कहा था, "शिव को दो माह के लिए बाहर जाना है. मैं स्वेच्छा से यहां आयी हूं. उसके बिना वहां अकेली रहना नहीं चाहती थी. और यह बताते हुए न वह दुखी थी न भावुक, बिल्कुल तटस्थ थी वह."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"शिव कहीं गया भी था. लेकिन पन्द्रह दिन बाद लौट भी आया था. परन्तु वह गौरांगी से मिलने नहीं आया था. न ही वह विश्वविद्यालय की ओर आया. गौरांगी के किसी मित्र ने उसे कनॉट प्लेस में देखा. गौरांगी को विश्वास नहीं हुआ . वह उसके निवास पर गयी. वह मिला और उसने उसे आश्वस्त किया कि उसे मकान बदलना है. अच्छा मकान किराये पर लेकर वह शीघ्र ही गौरांगी को साथ ले आयेगा और वे किसी मंदिर में शादी कर लेंगे, लेकिन उसका मकान बदलना टलता रहा और गौरांगी की परेशानी बढ़ती गयी थी. और एक दिन------ होस्टल के कमरे के पंखे से लटककर उसने आत्महत्या कर ली थी. उसने जो सुसाइड नोट छोड़ा था, उसमें लिखा था, "अपनी आत्महत्या के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूं." शिव कुछ दिनों तक परेशान तो रहा था. पुलिस उससे बार-बार पूछ-ताछ करती रही थी लेकिन किसी प्रमाण के अभाव में वह बच गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पोस्ट मार्टम रपट में गौरांगी के गर्भवती होने की पुष्टि हुई थी. पांच माह का गर्भ था उसे." बात समाप्त कर विनी ने प्रश्नात्मक भाव से सुलोचना की ओर देखा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"शिव ने यह सब बता दिया है." ठंडे स्वर में सुलोचना बोली थी, "विनी, मैं गौरांगी नहीं हूं. उसने यदि मेरे साथ विश्वासघात किया तो मैं नहीं वही आत्महत्या करेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विनी ने मौन धारण करना ही उचित समझा था और उसी शाम सुलोचना शिवमान मोहन के साथ चली गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसा कि सुलोचना ने कहा था, वह गौरांगी की भांति कमज़ोर नहीं थी. शिव को उससे विवाह करना पड़ा था. और शिव भी जानता था कि उसने कोई गलत निर्णय नहीं किया था. शिव के साथ जाने से पूर्व ही सुलोचना को गृहमंत्रालय में ’असिस्टेंट’ के पद के लिए चयन-पत्र मिल चुका था. उसके लिए दोहरी ख़ुशी थी. शिव के साथ विवाह के निर्णय पर घरवालों ने विरोध किया था. बीस वर्षों तक उनसे संबंध नहीं रहे थे. इस दौरान मां की मृत्यु हुई थी. सुलोचना नौकरी में और दोनों बेटों के पालन-पोषण में व्यस्त रही थी. बीस वर्षों बाद उसके दोनों छोटे भाई उससे मिलने दिल्ली आये थे. तब वह पटेल नगर के बजाय वैशाली अपने मकान में पहुंच चुकी थी. लखनऊ से तार पुनः जुड़ गये थे. शिव के साथ वह पिता से मिल आयी थी और उसने रवि बाबू को बताया था कि शिव से मिलकर उसके पिता प्रसन्न हुए थे. एक सप्ताह दोनों बच्चों के साथ वहां  वहां रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले पंद्रह वर्षों में सुलोचना के पिता की आर्थिक स्थिति खराब होती गयी थी. दोनों भाई बेकार थे. उनकी शादी न कर पाने की चिंता थी पिता को. बेकार और फ्रस्ट्रेटेड भाई प्रायः पिता से झगड़ते रहते थे. पिता की आय का श्रोत उत्तर प्रदेश खाद्य निगम से निदेशक के रूप में अवकाश पाने के बाद मिलनेवाली पेंशन थी और था किरायेदारों से मिलनेवाल पैसा, जो न के बराबर था. घर में कलह का वातावरण था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव और सुलोचना बच्चों की जि़म्मेदारियों से मुक्त हो चुके थे. दोनों बेटे बंगलौर में इंजीनियर थे. दोनों की अपनी नौकरी थी. संपन्नता उनके आगे-पीछे घूमती थी. अचानक पिता बीमार हो गये थे. उनके करुण पत्र से अभिभूत सुलोचना शिव के साथ लखनऊ गयी थी और दोनों पूरे साढ़े तीन महीने वहां रहे थे. नौ मार्च से तेईस जून तक. मुक्तहस्त हो शिव ने ससुर की सेवा में पैसा खर्च किया था. प्रसन्न थे सुलोचना के पिता प्रतापनारायण.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और वे सुलोचना और शिव से इतना प्रसन्न हुए थे कि हवेलीनुमा मकान उन्होंने अपने बाद केवल देखभाल करने के लिए सुलोचना के नाम कर दिया था. भाइयों को पता चला तो गृहकलह ने रौद्र रूप ले लिया. दिनभर युद्ध की सी स्थिति रहने लगी थी. शिव और सुलोचना पिता की ओर से मोर्चा संभाले रहते थे. लेकिन पिता मोर्चा हारते जा रहे थे. वह और अधिक बीमार होते गये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव और सुलोचना चौबीस को दिल्ली लौटे और पचीस को उन्हें प्रतापनारायण की मृत्यु का समाचार मिला था. उसी रात दोनों लखनऊ के लिए रवाना हुए. क्रिया-कर्म काल में दोनों भाइयों के साथ सुलोचना का मोर्चा खुला रहा था. जो कुछ हो रहा था वह किरायेदारों के लिए अनुकूल था. उनके अपने हिस्से पक्के थे. निकाले भी गये तो कुछ लेकर ही जायेंगे यह सभी ने तय कर लिया था. प्रतापनारायण के क्रिया कर्म के लिए ठहरने के दौरान शिव ने लखनऊ के एक बिल्डर से एक करोड़ में मकान का सौदा कर लिया था. लेकिन सुलोचना को बताया नहीं था. दोनों दिल्ली पहुंचे ही थे कि सप्ताह बीतते न बीतते सुलोचना को सूचना मिली कि छोटे भाई ने आत्महत्या कर ली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यह सब क्या हो रहा है शिव?" सुलोचना ने शिवमान मोहन से पूछा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उनका प्रारब्ध ! तुम कर क्या सकती हो!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हमें जाना चाहिए. आखिर, वह मेरा छोटा भाई था."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर तक चुप रहने और सुलोचना के चेहरे पर नज़रें गड़ाये रहने के बाद शिव बोला था, "फिर सोचना क्या?”  कुछ देर के बाद उपयुक्त अवसर पा वह फिर बोला, "सुलोचना बताना भूल गया था. अन्यथा न लेना.  एक बिल्डर से बात हुई थी. उसने मकान देखा था. कल उसका फोन आया था. खरीदना चाहता है. शायद शॉपिंग कॉंप्लेक्स बनाना चाहता है. जल्दी ही रजिस्ट्री करवाना चाहता है. हम चल तो रहे ही हैं. तुम चाहो तो----."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"शिव, पिता जी ने मकान मेरे नाम इसलिए नहीं किया था कि हम उसे बेच दें. बेच तो वे भी सकते थे-----."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव चुप रहा था. ऎसे अवसरों पर वह चुप ही रहता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"गौरव चला गया. बेवकूफ था. आत्महत्या करने की क्या आवश्यकता थी. लेकिन रघु है अभी. मकान मैं उसे दे दूंगी. उसका विवाह करूंगी. वही तो बचा है......"फूटफूटकर रोने लगी थी सुलोचना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकान रघु को देने और उसका विवाह करने की सुलोचना की बात से हिल उठा था शिव. "भावुक मत हो सुलोचना. तुम्हें बताना उचित समझता हूं. बिल्डर ने बताया है कि रघु का कहीं अता-पता नहीं है. क्या पता उसने भी----."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीख उठी थी सुलोचना और देर तक शिवमान मोहन के चेहरे की ओर टुकुर-टुकुर देखती रही थी. अचानक उसके सामने विनीता का चेहरा घूम गया था. लेकिन कुछ बोल नहीं पायी थी. अपने को बहुत बोल्ड समझने वाली वह प्रायः शिव के सामने हथियार डाल देती रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्डर को मकान बेचने के दो महीने बाद ही सुलोचना की भी मृत्यु हो गयी थी. रवि बाबू को शिव ने बताया था कि सुलोचना दो वर्षों से ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थी. धूमधाम से उसका क्रिया-कर्म किया था शिव ने. उसकी तेहरवीं के दिन गांधी भवन में दिनभर साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. सुलोचना कविताएं लिखती थी जिसकी जानकारी भी उसी दिन रवि बाबू को हुई थी. उसके दो कविता संग्रह दस दिनों के अंदर प्रकाशित करवाये गये थे. दोनों का विमोचन उस दिन हिन्दी के दो वरिष्ठ कवियों ने किया था. कई बड़े आलोचकों, कवियों और प्रगतिशील लोगों ने सुलोचना को महान कवियत्री, और पति-पत्नी को ग़रीबों के लिए जीनेवाला संघर्षशील-क्रान्तिकारी दंपति बताया था. उन पर बनाया गया एक वृत्तचित्र भी वहां दिखाया गया था, जिसमें साक्षात्कार में एक प्रश्न के उत्तर में शिव के बगल में बैठी सुलोचना कह रही थी, "मैं शिव को कबीर के रूप में देखना चाहती थी.लेकिन------."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कबूतर खुले दरवाज़े से घुस आया था और पर फड़फड़ाता बाहर निकलने के लिए पंखे के चारों ओर चक्कर काटने लगा था. रविबाबू की चेतना लौट आयी थी और वे अख़बार में समाचार पढ़ने लगे थे, "बीस नवंबर , नयी दिल्ली, ’भारतीय सर्वहारा संघर्ष समिति’ के महासचिव शिवमान मोहन ने भरत के सर्वहारा वर्ग का आह्वान करते हुए कहा कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शक्तियों को कुचलने के लिए उन्हें एकजुट होने की आवश्यकता है. पूंजीवादी शक्तियां उदारीकरण के नाम पर -----" और रविबाबू सोचने लगे कि यह तो वही है----- वही शिवमान मोहन, सुलोचना का पति----- जिससे वे वर्षों से परिचित हैं-- लेकिन पहचान नहीं पाये---- शायद इसलिए कि उनकी आंखों पर बड़े फ्रेम का मोटे लेंसवाला चश्मा चढ़ा हुआ था. ’कैसी कायापलट है यह’ उन्होंने सोचा था.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविबाबू का मन कसैला हो उठा. उन्होंने अखबार उठाकर एक ओर फेंक दिया और सोचने लगे कि इस देश में आज ऎसे छद्मवेशी ही सब प्रकार से सफल हैं. उन्होम्ने दीर्घ निश्वास ली और आंखें बंद कर लीं. उन्हें एक दैत्याकार आकृति उभरती हुई प्रतीत हुई. वे उसे पहचानने का प्रयत्न करने लगे . वह शिवमान मोहन की थी---- नहीं किसी अंडरवर्ल्ड डॉन की----- किसी राजनेता की----- बुश की ---- ब्लेयर की----- और तभी उन्हें लगा कि उसमें वे सभी समाहित थे----- आकृति फैलती जा रही थी,  सुलोचना के पिता, भाई----- गौरांगी---- गुजरात---- बिहार---- मऊ---- ईराक और-------.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-353591351836376859?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/353591351836376859/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=353591351836376859&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/353591351836376859'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/353591351836376859'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='कहानी-२४'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SgpAGGbZiKI/AAAAAAAAAGw/-en3YxTU1-Q/s72-c/B%27ful+Pi+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8859532507029122699.post-3148955162536237486</id><published>2009-04-18T01:53:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T02:03:50.899-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी-२३</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SemV0_5vJGI/AAAAAAAAAE0/O8jPp5BHFCg/s1600-h/Leopard-4035.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325952772081656930" style="WIDTH: 200px; 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'गुजराती एण्ड सन्स' की शाखा ही थी पटेलनगर---- दिल्ली में. उसका हेडक्वार्टर अमेरिका के 'ज्यू जर्सी' में था, जहां से वह पूरे अमेरिका में उन पुस्तकों की सप्लाई करता था. न केवल धार्मिक पुस्तकें वहां बेचता था, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों से संबन्धित सामग्री , यहां तक कि कफन तक का अमेरिका में एक मात्र बिक्रेता था 'गुजराती एण्ड सन्स' का मालिक शंभूभाई पटेल. &lt;br /&gt;शंभूभाई पटेल की एक बार दिल्ली यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात उससे हुई थी और उन्होंने हिन्दी प्रकाशकों के काम छोड़कर उसका काम स्वीकार कर लिया था, क्योंकि वहां दूसरों की अपेक्षा उचित पारिश्रमिक मिलता और समय से मिलता था. शंभूभाई पटेल ने पहली मुलाकात में ही शर्त रखी थी, "जनार्दन भाई" वह सभी को गुजराती समझकर बात करता, "आप किसी भी प्रकाशक को यह नहीं बताएगें कि आप मेरे लिए काम कर रहे हैं. आपको पटेलनगर आने की आवश्यकता न होगी. मेरा बंदा आपसे काम ले आया करेगा और भुगतान का चेक भी दे आया करेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कोई परेशानी नहीं."&lt;br /&gt;इस प्रकार जनार्दन शाह न केवल दूसरे प्रकाशकों से कटते गये थे, बल्कि - मित्रों-परिचितों से भी दूर होते गये थे. शक्तिनगर जैसे पॉश इलाके को छोड़ वह वाणी विहार चले गये और परिचितों से बिल्कुल ही अलग-थलग हो गये.&lt;br /&gt;'लेकिन यह मंगतराम झूठ बोल रहा है. इस जैसे इंसान ने मुझे खोजने की कोशिश की होगी?---असंभव----." उन्होंने सोचा.&lt;br /&gt;********** &lt;br /&gt;मंगतराम जनार्दन शाह के गांव का था. नौकरी की तलाश में वह दिल्ली आया तो सीधे उनके यहां पहुंचा. गांव में उनके विषय में चर्चा थी कि दिल्ली में उनका बड़ा कारोबार है------ किताबें छापने का. हालांकि उनके पिता ने गांव वालों से कई बार कहा भी कि वह किताबें नहीं छापते बल्कि किताबें छापने वालों के लिए काम करते हैं . लेकिन गांववाले उनकी बातों को हवा में उड़ा देते, "चाचा, यही तो आपका बड़प्पन है. जनार्दन भइया बड़े आदमी बन गये हैं. सुना है बड़े-बड़े लोगन ते उनकी पहचान है----- मंत्री -संत्री तक जानते हैं."&lt;br /&gt;जनार्दन के पिता जानते थे कि वह गांव वालों को कितना भी क्यों न समझायें लेकिन वे जनार्दन के विषय में अपनी धारणा बदलने वाले नहीं. और तभी एक दिन दरियागंज के एक प्रकाशक के पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम को टेलीविजन में दिखाया गया. प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने पुस्तक का लोकार्पण किया था और जनार्दन प्रधानमंत्री के पास खड़े गांववालों को दिख गये थे.&lt;br /&gt;"अरे, यो निरंजनशाह का बेटा जनार्दनवा है रे." ग्राम प्रधान की चौपाल पर टी.वी. देख रहे ग्रामीणों में से एक चीखा था, "हां रे भइया ----- कैसे हंसि-हंसि कै बातैं करि रहा है-----!"&lt;br /&gt;"वाह भइया, मानि गये. किस्मत चमकि गै निरंजन शाह की."&lt;br /&gt;गांव में ग्राम प्रधान के यहां ही टी.वी. था----- ग्राम पंचायत का. रात सोने से पहले घर-घर जनार्दन की ही चर्चा रही थी और सुबह निरंजन शाह के दरवाजे लोग उन्हें बधाई देने पहुंचने लगे थे. भौंचक थे निरंजन शाह. उन्हें भी लगने लगा था कि जनार्दन उनसे अवश्य कुछ छुपाता है. निश्चित ही उसके संबन्ध बड़े लोगों से हैं----- लेकिन जब भी उन्होंने उससे अपने गठिया के इलाज के लिए दिल्ली ले जाने का प्रस्ताव किया उसने यह कहकर उनकी बात टाल दी थी, "पिता जी , एक कमरा है किराये का----- छत पर. बाथरूम और टॉयलेट कमरे से दूर छत के दूसरे छोर पर हैं. बरसात में छत पारकर वहां तक जाना होता है और सीमेंट के चादरों की उनकी छतें टपकती हैं."&lt;br /&gt;गांववालों की बधाई ने बेटे के विषय में निरंजन शाह के मन में आशंका उत्पन्न कर दी थी. और उन्हीं दिनों टी.वी. समाचार से प्रेरित मंगतराम उनके पास एक दिन गया और बोला, "चाचा , वैष्णों देवी जाना चाहता हूं. लौटते हुए दिल्ली घूमने की इच्छा है. जनार्दन भइया के हाल भी लेता आऊंगा----- पता-----."&lt;br /&gt;निरजंन शाह को बेटे की वास्तविक स्थिति जानने का इससे अच्छा अवसर अन्य क्या हो सकता था. जनार्दन का पता मंगतराम को देते हुए कहा था, "लौटते समय जनार्दन को भी सथ लेते आना बेटा. दो साल हो गये उसे गांव आए."&lt;br /&gt;जनार्दन को साथ ले आने का वायदा करके दिल्ली घूमने गया मंगतराम स्वयं लौटकर गांव नहीं गया. दरअसल वह वैष्णों देवी नही, दिल्ली ही गया था नौकरी की खोज में और सीधे जनार्दन के यहां पहुंचा था. उसने जनार्दन से अपने आने का उद्देश्य स्पष्ट कर दिया था और यह भी कि उन्हीं के भरोसे वह दिल्ली आया था और उनके अतिरिक्त उसका कोई अन्य ठिकाना भी नहीं. अंदर से परेशान जनार्दन ऊपर से सामान्य बने रहे थे. गर्मी के दिन थे. दिन में पत्नी, बेटी, और मंगतराम के साथ जनार्दन कमरे में सिमटे रहते और प्रकाशकों से लाये प्रूफ पढ़ते रहते, जबकि मंगतराम बीच-बीच में गांव में उनके विषय में होने वाली चर्चा छेड़ उनके काम में बाधा पहुंचाता रहता. स्वभाववश वह उसे कुछ कह नहीं पाते. रात में सोने के लिए खुली छत थी. कोई परेशानी न होती. यह सिलसिला एक महीना से अधिक चला, लेकिन इसी मध्य उन्होंने एक परिचित के माध्यम से मंगतराम को कमलानगर के एक बैंक के कर्मचारियों के लिए चाय सप्लाई करने का काम दिलवा दिया. चाय बनाने के लिए बैंक में छोटी-सी जगह भी उसे मिल गयी थी. स्टोव खरीदने से लेकर चाय-चीनी - बिस्कुट आदि के लिए जनार्दन ने उसकी सहायता की. मंगतराम का काम चल निकला तो दो महीने के बाद उन्होंने उसे शास्त्रीनगर में रहने के लिए एक सस्ता कमरा किराये पर दिलवा दिया. लगभग दो वर्षों तक मंगतराम प्रतिदिन शाम बैंक से लौटते हुए रात में उनके यहां आता और प्रायः उन्हीं के साथ भोजन करके जाता. लेकिन उसके बाद यह सिलसिला कम होकर एक दिन बंद हो गया था. कुछ दिनों बाद उसके विषय में उन्हें जो सूचना मिली वह चौंकाने वाली थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंगतराम बैंक में चाय बनाने का काम बंद कर कहीं चला गया था.बैंक के कई कर्मचारी परेशान थे उसके अचानक गायब हो जाने से. उन्होंने जिस परिचित के माध्यम से उसे वहां रखवाया था उसने उन्हें उन बैंक-कर्मियों की परेशानी का कारण जब बताया तब वह और अधिक परेशान हो उठे थे.&lt;br /&gt;रचनाकार परिचय:-&lt;br /&gt;१२ मार्च, १९५१ को कानपुर के गाँव नौगवां (गौतम) में जन्मे वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल कानपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. हैं। अब तक उनकी ३८ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ६ उपन्यास जिसमें से 'रमला बहू', 'पाथरटीला', 'नटसार' और 'शहर गवाह है' - अधिक चर्चित रहे हैं, १० कहानी संग्रह, ३ किशोर उपन्यास, १० बाल कहानी संग्रह, २ लघु-कहानी संग्रह, यात्रा संस्मरण, आलोचना, अपराध विज्ञान, २ संपादित पुस्तकें सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त बहुचर्चित पुस्तक 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' (जीवनी) संवाद प्रकाशन, मेरठ से प्रकाशित से प्रकाशित हुई है।उन्होंने रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय के अंतिम उपन्यास 'हाजी मुराद' का हिन्दी में पहली बार अनुवाद किया है जो २००८ में 'संवाद प्रकाशन' मेरठ से प्रकाशित हुआ है।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो चिट्ठे- रचना समय और वातायन&lt;br /&gt;मंगतराम कई कर्मियों से दस-दस हजार रुपये लेकर गायब हुआ था.उसने बहुत ही कौशल का प्रदर्शन किया था. एक से इस शर्त पर रुपये उधार लिए कि एक माह में पांच प्रतिशत ब्याज सहित रुपये वह उन्हें लौटा देगा. लेने वाले से उसने अनुरोध किया कि वह इस बात की चर्चा किसी अन्य से नहीं करेगा-----"साहब, इज्जत का सवाल है." उसने हाथ जोड़कर कहा था. एक महीना बाद दूसरे से उसी शर्त पर उधार लेकर उसने पहले वाले को लौटा दिया था ब्याज सहित. इस प्रकार वह एक से लेता, फिर दूसरे से लेकर पहले का चुकता कर देता. ऎसा उसने कई महीनों तक किया और सभी कर्मियों का विश्वास जीत लिया. और एक दिन उसने एक साथ दस या ग्यारह कर्मियों से उधार लिए और एक सप्ताह बाद शास्त्रीनगर का कमरा छोड़ कहीं चला गया. जब पन्द्रह दिनों तक वह बैंक नहीं पहुंचा तब उनके परिचित उसके विषय में जानकारी लेने उनके घर पहुंचे थे. उसे उधार देने वाले उसके विरुद्ध पुलिस में इसलिए रपट नहीं लिखा सकते थे, क्योंकि उनके पास उधार देने का कोई प्रमाण न था और एक अनजान व्यक्ति को बैंक की जगह पर चाय बानाने के लिए जगह देना भी गैर कानूनी था. उधार देने वाले अपने स्तर पर उसकी तलाश करते रहे . उन्होंने भी गांव में पिता को लिख जानना चाहा, लेकिन मंगतराम गांव नहीं गया था.&lt;br /&gt;********&lt;br /&gt;मंगतराम दिल्ली में ही था. उसने दक्षिण दिल्ली के एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान की कैण्टीन का ठेका ले लिया था. स्वयं गांव नहीं गया, लेकिन घरवालों को अपनी सूचना दे दी थी. घर से तार जुड़ गये थे, लेकिन उसने घर वालों को मना कर दिया था कि वे गांववालों को उसके विषय में कुछ नहीं बतायेगें ----- और न ही किसी रिश्तेदार को. एक दिन वह स्वयं गांव आकर सबको चैंका देगा. मायके जाने के बहाने उसने पत्नी को दिल्ली बुला लिया था. पत्नी भी कैण्टीन में उसका हाथ बटाने लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;********&lt;br /&gt;गांव से जाने के लगभग आठ वर्ष बाद मंगतराम गांव में प्रकट हुआ. तब तक उसने एक सरकारी दफ्तर की कैण्टीन का ठेका भी ले लिया था. एक को पत्नी देखती और दूसरे को वह स्वयं संभालता .&lt;br /&gt;जब वह गांव पहुंचा तब तक गांव में जनार्दन की 'बड़ा व्यक्ति' होने की छवि धूमिल पड़ चुकी थी. गांव वालों को उनसे गांव में जिस करिश्मे की आशा थी वह कुछ भी न दिखा था. अब मंगतराम उनका हीरो था. उसने वांववालों को अपने व्यवसाय की जानकारी नहीं दी, जबकि उसके रहन-सहन और खेत खरीदने की उसकी चर्चा से सभी ने अनुमान लगाया कि उसने इतने दिनों में खासा पैसा कमा लिया था. गांव के उसके साथी दिनभर उसके आगे-पीछे और उसके लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते. शाम उसकी चौपाल में जमघट होता और पास के कस्बे से मंगवाई गयी कच्ची की बोतलें खाली होती रहतीं.&lt;br /&gt;वह एक सप्ताह गांव में ठहरा और उसने तीन गरीब किसानों के दस बीघा खेतों का सौदा तय कर लिया. बयाना दे दिया. चार महीने में रजिस्ट्री का निश्चय कर वह दिल्ली लौट गया. खेतों की रजिस्ट्री के दौरान उसकी दृष्टि पड़ोसी अनंत मिश्र के एक बीघा के उस घेर पर टिक गयी जो उसके घर के बायीं ओर था. घेर में अनंत के जानवर बांधे जाते थे और मंगतराम का छोटा-सा घर अनंत के घर और घेर के बीच में था.&lt;br /&gt;मंगतराम के घर की भी एक कहानी है.&lt;br /&gt;अनंत के पिता और मंगतराम के पिता अच्छे मित्र थे. मंगतराम के पिता संतराम शुक्ल पुरोहिती का काम करते थे. कठिनाई से गुजर होती. परिवार में बेटा मंगतराम, एक बेटी और पत्नी थे. रहने के लिए छोटी-सी झोपड़ी थी. झोपड़ी के नाम पर एक कोठरी . कोठरी के बाहर फूस का छप्पर, जो प्रतिवर्ष बरसात से पहले बदला जाता था. कोठरी के साथ एक और दीवार खड़ी करके छप्पर के नीचे रसोई बनाई गयी थी. दिनभर परिवार छप्पर के नीचे पड़ा रहता. बरसात और जाड़े में ही वे कोठरी में सोते. अनंत के पिता से मित्र का कष्ट देखा नहीं गया. गांव के घेर का लगभग साठ वर्ग गज का टुकड़ा उन्होंने संतराम को दे दिया. गांव के कुछ जजमानों और अनंत के पिता की सहायता से संतराम ने उसमें कच्ची ईटों की दो कोठरियां और रसोई बना ली. संतराम को घेर का हिस्सा देने के लगभग दो वर्ष बाद अनंत के पिता का देहांत हो गया था.&lt;br /&gt;अपनी दूसरी यात्रा के दौरान मंगतराम ने एक दिन अनंत से घेर खरीदने की अपनी इच्छा व्यक्त की. उसमें वह बड़ा मकान बनाना चाहता था. अनंत के लिए यह अचम्भित करने वाला प्रस्ताव था. उसने इंकार कर दिया. मंगतराम ने इसे चुनौती के रूप में लिया. उसने निश्चय किया कि वह उस घेर पर कब्जा करके ही रहेगा. और इसका अवसर उसे तब मिला जब उसके पिता की मृत्यु हुई.&lt;br /&gt;हुआ यह कि उसके पिता अकस्मात बीमार पड़े. उसकी मां की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी और बहन ससुराल जा चुकी थी. पिता अकेले थे. सामान्य-सी सर्दी-जुकाम ने जब एक दिन गंभीर रूप धारण कर लिया तब संतराम ने बेटे को सूचना दी. मंतगराम पत्नी के साथ दौड़ा आया. उसने घर में ही कस्बे के डाक्टर से पिता का इलाज करवाया, लेकिन वह स्वस्थ नहीं हुए. मंगतराम के गांव पहुंचने के तीसरे दिन रात में उसके पिता ने अंतिम सांसे लीं. जैसे ही पिता ने आंखें बंद कीं और उनकी सांस थमी, मंगतराम ने पत्नी के सहयोग से उन्हें ठीक घर में प्रवेश करनेवाले दरवाजे के सामने आंगन में जमीन पर बिना कुछ बिछाये लेटा दिया. पत्नी कुछ समझती उससे पहले ही दरवाजे की ओट में रखी लाठी उठा ली और पत्नी को धमकाते हुए कहा, "खबरदार जो रोयी------." हिचकियां लेती पत्नी को उसका दूसरा आदेश था, "जब मैं कहूंगा तब बुक्का फाड़कर रोना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी भौंचक आंखे फाड़ उसे देख रही थी और मंगतराम के हाथों की लाठी पर पकड़ मजबूत होती जा रही थी. उसने मृत पिता के हाथ-पैरों पर कई प्रहार किये. हाथ-पैरों की हड्डियां तोड़ उसने लाठी अनंत के घेर में फेंक दी और लाठी पकड़ने के लिए प्रयुक्त दस्तानों को गैस चूले में जला दिया. फिर घुटी आवाज में रोती पत्नी को चीखकर रोने का आदेश दे स्वयं चीखकर रोने लगा, "मार डाला रे------अरे मेरे बापू को मार डाला ------ दौड़ो----- बचाओ-----गांव वालों----संज्जू, रत्ते-----."&lt;br /&gt;पांच मिनट में गांव एकत्र हो गया था. आंगन में संतराम की लाश देख अड़ोस-पड़ोस की औरतें भी दहाड़ मारकर रोने लगीं. "किसने मारा------ किसने?"&lt;br /&gt;"अरे कौन मारता----- पड़ोसी ही दुश्मन बन बैठा. मैंने इस अनंत से घेर की बात आज शाम फिर चलाई थी----- कुछ देर पहले वह लाठी लेकर धमकाने आ गया. बापू उस समय पेशाब करने जाने के लिए उठा था. मैंने अनंता को कहा भी कि आगे चर्चा नहीं करूंगा, लेकिन वह मेरी आवाज सुनते ही भड़क उठा. उसने मुझे निशाना साध लाठी चलाई. मैं हट गया और बाहर सड़क पर आ गया. पत्नी कोठरी मे जा घुसी. अरे मुझे क्या पता था कि वह मेरे बीमार बापू पर टूट पड़ेगा. उसने ताबड़-तोड़ लाठियां उन पर भांज डालीं----- हाथ पैर तोड़ दिये उनके." मंगतराम पिता की लाश से चिपक गया. देर तक रोता रहा, फिर लड़खड़ाता-सा खड़ा हो बोला, "आप सबको यकीन न हो तो उसके घेर में देख लें ----- जाते हुए उसने लाठी घेर में फेक दी थी." वह फिर रोने लगा, "हाय मेरे बापू---- मैं तुम्हें बचा न पाया. एक राक्षस ने तुम्हारी जान ले ली------ बापू जब तक उसे फांसी के फंदे तक न पहुंचाया मुझे चैन नहीं मिलेगी." वह चीख रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;पुलिस आयी. अनंत मिश्र गिरफ्तार हुआ. मंगतराम ने थानेदर को चालीस हजार रुपये दिये थे. पोस्ट मार्टम रेपोर्ट में लिखा गया कि लाठी के प्रहार से ही हाथ-पैर टूटे थे, लेकिन संतराम की मृत्यु प्रहार से पहले हुई थी या बाद में इस विषय में कुछ नहीं कहा गया था. इसके बाद की कहानी छोटी है. छोटी इसलिए कि मंगतराम ने अनंत के सामने फिर एक प्रस्ताव भेजा था-------समझौते का. मुकदमा वापस ले लेने का और भयभीत अनंत ने समझौता करना उचित समझा था. समझौता गुप्त था, जिसमें केवल थानेदार शामिल हुआ था. थानेदार ने अनंत से चालीस हजार लेकर मामले को कमजोर बनाया था, पोस्ट मार्टम रेपोर्ट का कोई उल्लेख नहीं था उसमें और मंगतराम ------ उसने जैसा जाहा था वही करना पड़ा था अनंत को. चार बीघा खेत और घेर की मुफ्त रजिस्ट्री शामिल थी उसमें.&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;"चाच्चा------- कभी आप मेरे गरीबखाने में आयें." मंगतराम बोला तो वह चौंकें थे.&lt;br /&gt;"हुंह-----." जनार्दन शाह इतना ही बोल पाये.&lt;br /&gt;"यह रहा मेरा पता------ सेक्टर बासठ में है कोठी, "उसने विजिटिगं कार्ड निकालकर देते हुए कहा, "नोएडा, दूर नहीं है चाच्चा------ आप आदेश देगें तो गाड़ी भेजवा दूंगा."&lt;br /&gt;जनार्दन ने उसके 'कोठी' शब्द पर गौर किया था.&lt;br /&gt;"बताउंगा." बुदबुदाए थे जनार्दन.&lt;br /&gt;"फिर मिलते हैं ------चाच्चा." गाड़ी में धंसता हुआ मंगतराम बोला और सर्र की आवाज के साथ गाड़ी दौड़ गयी थी. वह कुछ देर तक ट्रैफिक के बीच गुम होती उसकी गाड़ी को देखते रहे, फिर 'पिच्च' से सड़क पर थूक फुटपाथ पर चढ़ गये थे.&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8859532507029122699-3148955162536237486?l=wwwrachanaroop.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/feeds/3148955162536237486/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8859532507029122699&amp;postID=3148955162536237486&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3148955162536237486'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8859532507029122699/posts/default/3148955162536237486'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanaroop.blogspot.com/2009/04/blog-post_18.html' title='कहानी-२३'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/SemV0_5vJGI/AAAAAAAAAE0/O8jPp5BHFCg/s72-c/Leopard-4035.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
